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Author: Dr.Pushpendra Dubey Published On: 2017-06-14 23:04:00
परस्परावलंबन से दूर होगा गांव और शहर का संघर्ष
डाॅ.पुष्पेंद्र दुबे
इन दिनों देश के विभिन्न प्रदेशों में किसान आंदोलन चल रहे हैं। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। मौसम की मार, सरकार के सही-गलत निर्णय, बैंक तथा महाजन से लिए गए कर्ज और व्यापारियों के शिकंजे में फंसा किसान कई सालों से छटपटा रहा है। प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को अनेक सपने दिखाए गए। उसमें 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वादा सबसे हसीन सपना है। किसान आज डूब रहा है और उससे कहा जा रहा है कि तुम अपनी गर्दन थोड़े दिन और ऊपर रखकर सांस लेते रहो, हम तुम्हें बचाने आ रहे हैं। आज हमारे अन्नदाताओं का उग्र रूप नजर आ रहा है। इसे हम शहर और गांव के संघर्ष की शुरुआत कह सकते हैं, जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है। यदि शहर और गांव का संघर्ष टालना है तो विज्ञान के जमाने में परस्परावलंबन ही काम देगा। किसान आंदोलन यह दर्शाता है कि ग्राम पंचायत असफल सिद्ध हो रही हैं। पंचायतीराज व्यवस्था में राजनीतिक दलों की घुसपैठ ने इस व्यवस्था को दूषित कर दिया है। वास्तव में गांव आज भी गुलाम हैं। शहर ने गांवों की चिंता कभी नहीं की। शहर को यह बात ध्यान में नहीं आ रही है कि गांव टिकेंगे तभी शहर टिकेंगे और तभी देश टिकेगा। एक किसान अपना अनाज लेकर बेचने के लिए शहर में आता है। उसके लिए सरकार ने समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। किसान अनाज बेचकर कार के शोरूम पर जाता है। तब कार का मूल्य किसान नहीं बल्कि कंपनी तय करती है। किसान को अपने किसी भी उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार ही नहीं है। यह व्यवस्था विचित्र किंतु सत्य है। किसान कितने सालों से कह रहा है कि हमारी उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन हमें अपने उत्पाद का मूल्य नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर अनुत्पादक नौकरशाही का वेतन कहां से कहां पहुंच गया है। आज किसान यदि सरकार की ओर आशाभरी निगाह से देख रहा है तो वह बड़ी भूल कर रहा है। गांव को अपने उद्धार के लिए स्वयं कमर कसना होगी। ठीक वैसे ही जैसे कभी भगवान कृष्ण ने पराक्रम किया था। वृंदावनवासी इंद्र की पूजा किया करते थे। तब बालकृष्ण ने ग्रामवासियों से इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा करने का आह्वान किया। इससे अनेक ग्रामवासी घबरा गए। उन्होंने बालकृष्ण से कहा कि इंद्र हमारे गांव में तबाही मचा देंगे। जब बालकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा प्रारंभ की, तब वास्तव में इंद्र ने उस गांव को बाढ़ में डुबाने का प्रयत्न किया। तब अवतारी बालकृष्ण ने अपने हाथ की छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया और गोकुलवासियों की रक्षा की। इस कहानी का आशय यही है कि ग्रामीणों को अपने गांव को गोकुल खुद बनाना होगा। उन्हें शहर पर निर्भरता कम करना होगी। आज बीज, खाद, चारा, पेट्रोल, डीजल, टैªक्टर, हार्वेस्टर से लगाकर एक-एक चीज के लिए किसान और गांव शहर पर निर्भर है। ग्राम-निर्माण सरकार के भरोसे नहीं, बल्कि गांव के लोगों से होगा। सरकार ने अब तक गांवों के उद्धार के लिए अरबों रुपये खर्च किए, फिर भी गांव का उत्थान नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यही है कि योजना गांव वालों ने नहीं बनायी। आज तो सरकार हवा में ताली बजाने का प्रयास कर रही है। किसान कपास लगाता है, कपड़ा शहर से खरीदकर ले जाता है, किसान मूंगफली लगाता है, तेल शहर से ले जाता है, किसान पशु पालन करता है, चारा लेने शहर आता है, किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदता है, बीज पर भी उसका अधिकार खत्म, खाद ब्लैक में लेता है, दूध का उत्पादन गांव में करता है, भाव व्यापारी तय करते हैं। किसान हाड़्तो्ड़ मेहनत कर फसल उत्पादन करता है, पुरस्कार और वाहवाही सरकार के खाते में जमा होती है। गांव की जमीन गांववालों के हाथ से निकलती जा रही है। जमीन के मालिक शहर में हैं और मजदूर गांव में। इस स्थिति के लिए ग्रामवासी स्वयं जिम्मेदार हैं। ग्राम को एक परिवार माने बिना उनका रक्षण दिनोंदिन कठिन होता जाएगा। गांवों में जो कच्चा माल पैदा होता है, उसका वहीं पक्का माल बनना चाहिए। तभी गांव टिक सकते हैं। कच्चा माल खेत में तैयार करना और उससे पक्का माल शहरों में बनाना, यह योजना गांव के लिए मारक सिद्ध हो रही है। आज ऐसा कोई नहीं सोच रहा है कि ‘मेरा गांव’ है।  विज्ञान के जमाने में पूरे गांव की योजना स्वयं ग्रामीणों को करना होगी। अत्यंत जरूरी ऐसी चीज जो गांव में बन सकती है, गांव में ही बनायी जाएगी। गांव के उद्योग गांव में चलें, और विदेश से जो माल आता है, उसे रोकने के लिए वह माल शहरों में बने। अगर गांव के उद्योग खत्म होंगे, तो न सिर्फ गांव पर, बल्कि शहरों पर भी संकट आएगा। फिर गांव के बेकार लोगों का शहरों पर हमला होगा और ऊपर से विदेशी माल का हमला तो होता ही रहेगा। इस तरह दोनों हमलों के बीच शहरवाले पिस जाएंगे। इसलिए हमारी योजना में गांव और शहरों के बीच इस प्रकार का सहयोग होगा कि गांववाले अपने उद्योग गांव में चलाएंगे और शहरवाले विदेश से आने वाली चीजें शहर में बनाएंगे। इस तरह प्रत्येक गांव पूर्ण होगा।
 
Author: Published On: 2017-06-11 20:18:45

बौद्ध साहित्य और गोरक्षण

अक्सर यह कहा जाता है कि बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ और यहीं फला-फूला, यहीं से वह संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक फैला, फिर भी उसमें बहुत-सी बातें आर्य सभ्यता तथा संस्कृति के प्रतिकूल मालूम पड़ती हैं। इसमें मुख्य बात गोमांस भक्षण की है। लेकिन बौद्ध साहित्य में - विशेष रूप से बुद्ध की दृष्टि में गाय का स्थान क्या है ? यह इस निबंध से स्पष्ट हो जाएगा।

भगवान बुद्ध करुणा के अवतार थे। उनके हृदय में संसार के समस्त प्राणियों के लिए समान दया थी। वे किसी भी प्राणी के कष्ट को देखकर चुप नहीं बैठ सकते थे। उनका स्नेह सीमाबद्ध नहीं था। फिर गाय जैसे उपयोगी और मनुष्य मात्र को बिना किसी भेदभाव के, एक समान सुख देने वाले प्राणी की वे कैसे उपेक्षा कर सकते थे। भगवान बुद्ध की इस सहृदयता को देखकर महाकवि जयदेव ने गाया -

निंदसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्

सदयहृदय दर्शितपशुघातम्

केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे।

भगवान बुद्ध ने यज्ञ हिंसा की बड़ी निंदा की। वे 45 वर्ष तक एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमते रहे और लोगों को अन्यान्य बातों के साथ-साथ गोहत्या के विरुद्ध भी उपदेश देते रहे। उनके समकालीन भगवान महावीर भी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। इन दोनों प्रचारकों को अपने उद्देश्य की सिद्धि में पूर्ण सफलता मिली। उन्होंने आज की तरह गोरक्षा के लिए न कहीं सांप्रदायिक दंगे करवाये और न गोरक्षा को धार्मिक रूप ही दिया। बल्कि उन्होंने जनता को गाय की और गोवंश की उपयोगिता बतलाकर गोवध न करने की शिक्षा दी। कुछ लोगों ने उनका प्रबल विरोध किया, किंतु उन्होंने धैर्यपूर्वक सब सहन करने में ही अपने उद्देश्य की सफलता देखी।

आज प्रत्येक हिंदू गोसेवा और गोरक्षा में ही अपना गौरव समझता है, किंतु भगवान बुद्ध की गोरक्षा की भावना से लोग बहुत कम परिचित हैं। भगवान बुद्ध ने एक जगह कहा है-

माता यथा नियं पुत्तं आयुसा एक पुत्तमनुरक्खे।

एवम्पि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं॥

‘माता जिस प्रकार अपने इकलौते बेटे के प्रति स्नेह रखती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में अपरिमित प्रेम रखना चाहिए। जीवदया की यह प्रवृत्ति धर्मराज अशोक के विचारों में पूर्णता को प्राप्त हुई। भगवान बुद्ध गाय की उपयोगिता को सर्वोपरि स्थान देते थे। वे गाय की निर्दोषता पर मुग्ध थे। इसीलिए उन्होंने कहा है -

न पादा न विसाणेन नास्सु हिस्सन्ति केनचि।

गावो एलक समाना सोरता कुम्भदूहना॥

गायें न पैर से, न सींग से न किसी अंग से ही मारती हैं। भेड़ के समान प्रिय और घड़ेभर दूध देने वाली हैं।

मनुष्य को अनेक वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ता है, किंतु कुछ वस्तुओं की उपयोगिता इतनी अधिक है कि उनके बिना हमारा जीवनयापन कठिन हो जाता है। आज के वैज्ञानिक युग में संभव है हम अपनी आवश्यकता की पूर्ति भिन्न तरीके से कर लें, पर वह तरीका सर्वव्यापी नहीं हो सकता। भारत सदा से कृषिप्रधान देश रहा है। खेती के लिए यहां प्राचीन काल से आज तक बैल का उपयोग होता है। गाय बचपन में हमें अपने दूध से और बड़े होने पर उसका पुत्र बैल अन्न उपजाकर हमारा भरणपोषण करता है। भगवान बुद्ध जैसे दयालु पुरुष गाय के इस महत्व को कैसे भूल सकते थे ? उन्होंने गाय को माता-पिता के समान उपकारी     बतलाया है-

यथा माता पिता भाता अंचे वापि च जातका।

गावो नो परमा मित्ता यासु जायंति ओसधा॥

‘जैसे माता, पिता, भाई और दूसरे कुटुम्ब परिवार के लोग हैं, वैसे ही गायें भी हमारी परम मित्र (हितकारिणी) हैं, जिससे (अर्थात जिनके दूध से) दवा बनती है।’

ऊपर की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि गाय के प्रति भगवान बुद्ध के हृदय में कितनी करुणा थी। वे गाय को सुख का मूल स्रोत मानते थे। इसीलिए तो उन्होंने कहा है :

अन्नदा बलदा चेता वण्णदा सुखदा तथा।

एतमत्थवसं मत्वा नास्सु गावो हनिंसु ते॥

गाय इतनी चीजों को देने वाली है - अन्न, बल, वर्ण तथा सुख। इन बातों को जानकर ही (पहले) वे (लोग) गाय को नहीं मारते थे।’

सरल और हृदयस्पर्शी भाषा में किसी वस्तु की उपयोगिता बताकर दूसरों की नजर में भी उस वस्तु के प्रति श्रद्धा और आदर पैदा करना बुद्ध का ही काम था। बुद्ध किसी पर अपना विचार बलपूर्वक लादना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि बलपूर्वक मनवाने का अर्थ है ‘परस्पर द्वेष पैदा करना।’ किंतु बुद्ध तो कहते थे कि वैर से कभी भी वैर शांत नहीं हो सकता। मित्रता से ही वैर मिट सकता है।’

गाय के प्रति भगवान बुद्ध की यह भावना देख उनके अनुयायियों में भी गाय की बड़ी कद्र रही। बर्मा में विशेष प्रचलित पाली भाषा की एक छोटी-सी पुस्तक है ‘लोकनीति’, इसमें लिखा है -

ये च खादन्ति गोमंसं, मातुमंसं व खादये।

मतेसु तेसु गिज्झानं ददे स्रोते व वाहये॥

‘जो गाय के मांस को खाते हैं, वे अपनी माता के मांस को ही खाते हैं। गाय के मर जाने पर उसे गृद्धों को दे दें या नदी में बहा दें।’

आगे चलकर इसी पुस्तक में कहा है-

गोणाहि सब्ब गिहीनं पोसका भोगदायका।

तस्मा हि माता पितू व मानये सकरेय्य च॥

‘बैल सब गृहस्थों के पोषण और भोगदायक हैं। इसलिए उनका माता-पिता की तरह आदर-सत्कार करें।’

अंत में बुद्ध के इस वचन के साथ लेख समाप्त करता हूं कि एवमेसो अनुधम्मो, पोराणो विन्नुगरहितो। अर्थात यह गोहत्या प्राचीन विद्वानों द्वारा निंदित कर्म है।

भगवान बुद्ध और गोमाता

मूल वैदिक समाज मांस भक्षक नहीं था। उसके यज्ञकर्म मांसयुक्त नहीं होते थे अर्थात प्राचीन वैदिक समाज में गो की हिंसा नहीं होती थी। यह बात मंत्रसंति से स्पष्ट सिद्ध होती है। महाभारत के शांतिपर्व में कहा है कि सतयुग में हिंसा नहीं होती थी। महाभारत का प्रमाण कालत: अधिक प्राचीन और स्थितितया निकटस्थ होने से यूरोपीय पंडितों की बातों की अपेक्षा, प्रमाण की दृष्टि से अधिक प्रबल अत: अधिक स्वीकार्य है। परंतु परायी संस्कृति का ऐनक लगाकर ही अपनी ओर देखने वाले नवीन विद्वानों की दृष्टि में बेचारे पुराने व्यास का महत्व ही क्या! फिर यह भी शंका उठायी जा सकती है कि व्यास ब्राह्मणत्व के अभिमानी थे, अत: उनके कथन में पक्षपात हो सकता है। कोई यह भी कह सकते हैं कि शांति अनुशासनादि पर्वों का बहुत-सा अंश प्रक्षिप्त होने से महाभारत का प्रमाण विश्‍वसनीय नहीं माना जा सकता। इसलिए थोड़ी देर हम व्यास और भारत को अलग ही रक्खें और भगवान बुद्ध ने क्या कहा है देखें। ‘ब्राह्मण धम्मिय सुत्त’ में भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘पूर्व के ॠषि संयमी और तपस्वी थे। ब्रह्मचर्य, शील, सरलता, नम्रता, तप, मृदुता, करुणा और क्षमा - इन गुणों की वे प्रशंसा करते थे। चावल, शय्या, वस्त्र, घी, तेल की याचना करके धर्म के अनुसार विभाग निकालकर वे यज्ञ करते थे। यज्ञ के उपस्थित होने पर वे गो को मारते नहीं थे। माता, पिता, भाई और अन्य बांधवों के समान ही गौओं को वे अपना परम मित्र जानते थे, उनसे औषधि निर्माण होती है, वे अन्न, बल, रूप और सुख देती हैं यह जानकर वे गौओं को मारते नहीं थे। वे सुकुमार, महाकाय, वर्णवान और यशस्वी ब्राह्मण कर्तव्याकर्तव्य का विचार रखते हुए धर्म का ही आचरण करते थे। जब तक ऐसे ब्राह्मण संसार में थे तब तक प्रजा सुखी थी।

अनंतर ब्राह्मण धर्म का ह्यास हुआ और निरपराध गौओं की इस प्रकार हत्या होती देख -

देव, पितर, असुर, राक्षस आदि सभी चिल्ला उठे कि गौ पर शस्त्र चला, यह बड़ा भारी अधर्म हुआ। पहले इच्छा, भूख और जरा - ये तीन ही रोग मनुष्यों में थे। पशु हिंसा से अंठानवे हो गये। इस प्रकार पूर्व के ज्ञानियों ने गोहत्या की निंदा की है। गोहत्या नीच कर्म है।

‘ब्राह्मणधम्मिय सुत्त’ के उपर्युक्त वचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरातन ब्राह्मण धर्म के संबंध में भगवान बुद्धदेव के क्या मत थे। ‘नास्सु गावो हनिसु ते’ वे गौओं को नहीं मारते थे। पूर्वकालीन ब्राह्मणों की यह प्रशंसा दो-ढाई हजार वर्ष पहले जो भगवान बुद्धदेव ने की, उसे सच माना जाय या पूर्वग्रह-दूषित अर्वाचीन यूरोपीय पण्डितों ने उन पर जो यह दोष आरोपित किया है कि वे गो-मांस भक्षक थे, उसे सच माना जाय, इस प्रश्‍न का उत्तर कोई भी दे   सकता है।

विदेशों में आज जो सर्वभक्षक बौद्धधर्मावलम्बी लोग देख पड़ते हैं उन्हें देखकर हम लोग यह समझ लेते हैं कि बौद्धधर्मावलम्बी लोग पहले से ही गोमांस भक्षक रहे होंगे, परंतु यह कल्पना सही नहीं है। इतिहासप्रसिद्ध बौद्ध सम्राट अशोक के शिलालेखों में गाय-बैल आदि प्राणियों की हत्या न होने देने की आज्ञाएं मिलती हैं। उत्तर ब्रह्मदेश (बर्मा) के अंतर्गत विजयपुर में सन् 1950 के लगभग सीहसूर नामक राजा राज करते थे। उनके प्रधानमंत्री महाचतुरंगबल का बनाया हुआ ‘लोकनीति’ नामक ग्रंथ है। इसमें कहा है -

गोणाहि सब्ब गिहीनं पोसका भोगदायका।

तस्मा हि माता पितू व, मानये सकरेय्य च॥14॥

सब गृहस्थों को भोग (योग्य पदार्थ) देने वाले और पोसने वाले गौ-बैल ही हैं। इसलिए माता-पिता के समान उन्हें पूज्य माने और उनका सत्कार करे। जो गोमांस खाते हैं वे अपनी माता का मांस खाते हैं। तात्पर्य यह है कि आजकल बौद्धों का आचरण चाहे जैसा हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि भगवान गौतम बुद्ध और उनके निष्ठावान अनुयायी गोहिंसा और गोमांस भक्षण के अत्यंत विरोधी थे, यह उपर्युक्त वचनों से सिद्ध है। बौद्धकाल में यह देश गोधन से कितना समृद्ध था यह दर्शाने के लिए एक ही दृष्टांत पर्याप्त होगा।

भगवान बुद्ध के एक शिष्य थे धनंजय सेठ। उन्होंने  अपनी कन्या के विवाहोपलक्ष्य में इतनी गौएं दहेज मेें दी थीं कि उन गौओं के खड़े होने के लिए लगभग डेढ़ सौ हाथ चौड़े और तीन कोस लंबे मैदा की आवश्यकता हुई। प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ईसा की 8वीं शताब्दी में होने वाले सम्राट हषवर्द्धन के संबंध में लिखा है -

‘उनके राज्य में प्राणिहिंसा करने वाले के लिए कठोर दण्ड था। उन्होंने अपने राज्य में मांस-भक्षण ही बंद कर दिया था।’ गोहत्या और गोमांस भक्षण की तो बात ही क्या।! संकलित- कल्याण

Author: Shankar rao Mahale Published On: 2017-06-11 20:12:08

बायो गैस सयंत्र का घर-घर निर्माण करें

शंकरराव महाले

(1) बायो गैस सयंत्र क्या है ?

बायो गैस सयंत्र ईंट, सीमेंट, रेत, गिट्टी की सहायता से जमीन के अन्दर 6 से 8 फीट की गहराई में एक डायजेस्टर का निर्माण किया जाता है। बोलचाल की भाषा में इसे गोबर गैस भी कहा जाता है। इस संयंत्र से हमें मिथेन गैस की प्राप्ति होती है, जो गोबर, गोमूत्र, मानव मल, मूत्र एवं अन्य कार्बनिक पदार्थों से तैयार होती है।

(2) गोबर गैस सयंत्र क्या ?

भारतीय अर्थ व्यवस्था में कृषि और गोपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। महात्मा गाँधी ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ‘‘यदि हम पशुधन का ठीक से उपयोग न कर सके तो भारत का विनाश हो जाएगा’’, पश्‍चिमी देशों में जैसा पशुधन बोझ है। वैसे ही यहाँ हो जाएगा और उसे मार डालने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रहेगा।

यह दृश्य हमें आज दिखाई दे रहा है, रासायनिक खाद, निंदा नाशक केमिकल्स एवं कीटनाशकों के अंधाधुँध उपयोग से हमारी खेती बर्बादी के कगार पर पहुँच गई है। आर्थिक दृष्टि से किसान परेशान है। खेती की लागत बढ़ गई हैऔर उत्पादन दिनोदिन कम होता जा रहा है। परिस्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि किसानों को आत्महत्या के लिए प्रेरित होना पड़ रहा है। हजारों हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्या यह विषय शोचनीय नहीं है?

जिस देश में रोज लाखों की संख्या में पशुओं का वध हो, हमारी शस्य श्यामला धरती रासायनिक खाद कीटनाशक आदि रसायनों के प्रभाव से विषाक्त हो, जिसका प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा हो, कत्लखानों के लिए सरकारी संरक्षण हो, जन भावना की कोई कद्र न हो, भूमि में जहर छोड़ा जा रहा हो हमारी मूल परम्परा एवं संस्कृति पर कुठाराघात हो तो भारतवासियों को जाग्रत करने का प्रयत्न करना चाहिए। गौमाता को कत्लखानों से मुक्त करें, अपनी संस्कृति और परम्परा को पहचानें, गौमाता गोबर देती है, जिसमें लक्ष्मी का वास है गोबर से अपनी खेती के लिए उत्तम खाद बनाएं। पशुधन को बचाएं और खेती को विषाक्त न होने दें।  घर-घर बायो गैस सयंत्र (गोबर गैस) का निर्माण करना, यह आज का स्वधर्म है।

(3) बायो गैस सयंत्र निर्माण हेतु स्थल का चुनाव

बायो गैस सयंत्र निर्माण हेतु योग्य स्थल का चुनाव सर्वप्रथम आवश्यक है, जहाँ अधिक समय तक धूप रहती हो, ऊँचा स्थान हो, पशुओं के कोठे से नजदीक हो, रसोई घर से उसकी दूरी 20 से 25 मीटर तक हो, यदि संयंत्र निर्माण स्थल पर कुआँ हो तो उसकी दूरी 20 से 25 मीटर हो।

सयंत्र निर्माण हेतु आवश्यकता

बायो गैस संयंत्र निर्माण में आवश्यक मात्रा में पशुधन होना आवश्यक है। पारिवारिक गैस संयंत्र हेतु आवश्यक पशुओं की संख्या गोबर की मात्रा एवं कितने लोगों के लिए खाना बन सकता है, उसका विवरण नीचे लिखी तालिका में दर्शाया गया है ˆ

तालिका क्र. (1)

क्र.    संयंत्र आवश्यक     ताजे गोबर    कितने लोगों के

      क्षमता पशुओं की      की मात्रा     लिए खाना बनेगा

      घ.मी.  संख्या

1.    1     2/3   25 किलो     3 से 4

2.    2     4/6   50 किलो     4 से 6

3.    3     7/9   75 किलो     8 से 12

4.    4     10/12 100 किलो    12 से 16

बायो गैसे सयंत्र निर्माण लागत एवं मॉडल

बायो गैस संयंत्र की लागत उसके मॉडल एवं साईज के अनुसार कम ज्यादा होती है, अनुमानित लागत ˆ

2 घ.मी. संयंत्र में     16 से 17 हजार

3 घ.मी. संयंत्र में     18 से 20 हजार

4 घ.मी. संयंत्र में     20 से 24 हजार रु. तक लागत आ सकती है। 

तीन तरह के मॉडल वर्तमान में प्रचलित हैˆ

(1) के.वी.आई.सी. मॉडल ः इस संयंत्र में सभी संयंत्रों से लागत अधिक आती है। क्योंकि इस संयंत्र के मुँह पर गैस संग्रहक टंकी लोहे की चादर की बनी होती है। इसकी लागत 30 से 35 हजार तक हो सकती है।

(2) जनता मॉडल : यह रेत, ईंट, सीमेंट, गिट्टी की सहायता से तैयार होता है। जमीन के अन्दर 7 से 8 फीट (साईज के अनुसार) गहराई से इसका निर्माण किया जाता है। इसकी लागत 17 से 24 हजार तक इसके साईज के अनुसार आती है।

(3) दीनबँधु : यह सयंत्र जमीन के अन्दर 6 फीट की गहराई पर बनाया जाता है। इसकी लागत दोनों मॉडलों से भी कम आती है, यह रेत, ईट, सीमेंट, गिट्टी की सहायता से बनाया जाता है।

गैस उत्पादन एवं गैस खपत : गैस उत्पादन

1 किलो ताजे गोबर से 1.30 घ.फीट गैस बनेगी

प्रति व्यक्ति मानव मल से 1 घ.फीट गैस बनेगी

गैस खपत

प्रति व्यक्ति दोनों समय भोजन बनाने हेतु 8 घ.फीट गैस की आवश्यकता होगी।  यदि घर में 5 व्यक्ति हैं तो 40 घ.फीट गैस लगेगी, जो 35 से 40 किलो गोबर से प्राप्त होगी। यदि सयंत्र के साथ शौचालय जोड़े तो प्रति व्यक्ति 1 घ.फीट गैस अतिरिक्त मिलेगी।

प्रकाश व्यवस्था हेतु

4.50 घ.फीट गैस प्रति घंटा, प्रति लेम्प लगेगी, जो 5 से 6 किलो गोबर से प्राप्त होगी।

गैस इंजिन चलाने हेतु इंजिन चलाने हेतु बड़े आकार के सयंत्र का निर्माण करना होगा.

इस्लाम में बकरीद पर गोकुशी जरूरी नहीं

नरेंद्र दुबे

भारत में गोरक्षा जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न को भी सांप्रदायिक और राजनैतिक रंग दिया जा रहा है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वास्तव में जैसे पश्चिम के देशों में आधुनिक विज्ञान और यंत्र-शास्त्र, टेक्नालाजी आदि का विकास हुआ वैसे ही भारत में बहुत प्राचीनकाल में गोविज्ञान का विकास हुआ था। भारत से यह गोविज्ञान सारी दुनिया में गया। पश्चिम में गौ को काउ, बैल को बुल और पूर्व में जापान में गौ को ‘ग्यू’ कहा जाता है। ये शब्द संस्कृत के ही अपभ्रंश हैं।

भारत की और पश्चिम की सांस्कृतिक परंपरा में यही बुनियादी भेद है कि भारत में संपूर्ण गोवंश का पूरा-पूरा उपयोग किया गया। दूध, खेती, खाद, परिवहन, ग्र्रामोद्योगों के लिए चालक शक्ति के उपयोग और चर्मोद्योग आदि का जैसा विकास भारत में हुआ वैसा पश्चिम में नहीं हो सका। पश्चिम में गाय दूध के लिए तथा बैल मांस के लिए और घोड़ा खेती के लिए पाले गए।

भारत में जैसा गोवंश रक्षणीय माना गया और उसे परिवार का अंग माना गया वैसा पश्चिम देशों में नहीं हुआ।

भारत में लगभग दस हजार सालों से गोसेवा गोरक्षा की परंपरा है जबकि ऐसी परंपरा पश्चिम के किसी देश में नहीं है। इसलिए भारत में गाय-बैल के प्रति जैसा पूज्य भाव है, वैसा वहां नहीं है।

भारत में दूध और मांसाहार के लिए बकरी-बकरे का पालन होता है वैसा ही वहां दूध और मांस के लिए गाय-बैल पाले जाते हैं। ऐसे उपयोगितावादी दृष्टिकोण के कारण जब तक गाय दूध देती है तब तक तो उसका बहुत अच्छा पालन होता है और जब वह दूध देना कम कर देती है या बंद कर देती है तो उसका कतल कर दिया जाता है।

पश्चिमी देशों में खेती, परिवहन और ग्रामोद्योगों में घोड़े का प्रयोग होता था। इसलिए वहां हार्स पावर शब्द चला। वहां अश्व संस्कृति का अच्छा विकास हुआ। इसलिए वहां घोड़ा कतल परंपरा से प्रतिबंधित रहा। इतना ही नहीं यहूदी धर्मग्रंथ में घोड़े के कतल को प्रतिबंधित किया गया है। इस परंपरा के ही परिणामस्वरूप आज भी संपूर्ण इस्लामिक जगत में घोड़े का कतल नहीं किया जाता है।

बलि या कुर्बानी प्रथा

प्राचीन काल में मांसाहार प्रचलित था। वह स्वाभाविक आहार था। शिकार की बजाय पशुपालन करके मांसाहार प्राप्त करना सरल था। ऐसा आहार भी परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है इसलिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना चाहिए यह विचार दृढ़ हुआ और मंत्र पढ़कर कतल करने की प्रथा प्रचलित हुई। भारत में यद्यपि गोमांस वर्जित था, गाय-बैल अवध्य थे किंतु अनेक अवसरों पर बकरे और भैंसे की बलि देने की प्रथा प्रचलित थी। लेकिन जैसे-जैसे शाकाहार का प्रचलन बढ़ा वैसे-वैसे मांसाहार निवृत्ति के प्रयास होने लगे। भारत में मांसाहार को नियंत्रित और मर्यादित करने के लिए उसे यज्ञों से जोड़ा गया और केवल यज्ञ-प्रसाद के रूप में ही मांसाहार करने की इजाजत थी। इस प्रकार साल में एकाध बार ही लोग मांस सेवन कर सकते थे और वह भी यज्ञ प्रसाद रूप में अत्यंत कम मात्रा में। किंतु भगवान महावीर, गौतम बुद्ध और वैष्णव संतों ने ऐसी यज्ञ हिंसा और बलि प्रथा का भी निषेध किया और उनके सद्प्रयासों से यह कुप्रथा भी समाप्त हुई। यद्यपि अपवाद रूप में पूर्वी भारत के कुछ देवी मंदिरों में यह आज भी प्रचलित है।

अरब देशों में कुर्बानी की प्रथा हजरत मोहम्मद साहब के भी बहुत पहले से प्रचलित थी। पवित्र कुरान ने कुर्बानी के लिए केवल छः पालतु पशु निर्धारित किए उनमें से किसी भी एक की कुर्बानी दी जा सकती है। इसकी पृष्ठभूमि में हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के संकेत पर अपने प्रिय पुत्र हजरत इस्माइल की कुर्बानी की धर्मकथा प्रचलित है। ऐसी ही धर्मकथा भारत में भी राजा मोरध्वज की प्रचलित है। अंतर केवल इतना ही है कि इस्लामी जगत में हजरत इब्राहिम के त्याग और अल्लाह के प्रति समर्पण की स्मृति में प्रचलित कुर्बानी की प्रथा आज भी प्रचलित है और प्रतिवर्ष इदुज्जुहा पर कुर्बानी देकर लोग यह पर्व मनाते हैं।

पवित्र कुरान में जिन छः पालतु पशुओं की कुर्बानी की इजाजत है उनमें बकरा, बकरी, उंट, उंटनी, भेड़-भेड़ा, दुंबा-दुंबी, भैंस-भैंसा तथा गाय-बैल हैं।

अरब देश में गाय-बैल केवल दूध और मांस के लिए ही पाले जाते थे जैसा कि भारत में बकरी दूध के लिए और बकरा मांस के लिए आज भी पाले जाते हैं। वहां के बैल में और भारत के बकरे में मांसाहार की दृष्टि से अंतर नहीं है।

दुनिया के सभी देशों में पहले वस्तु-विनिमय की ही प्रथा थी और एक गाय के बदले में सात भेड़ें मिलती थीं। इसलिए कुर्बानी के लिए सात भेड़ के बदले एक गाय मान्य की गई। इसका यह आशय कदापि नहीं है जैसा कि कुछ अंधविश्वासी मानते हैं कि एक गाय की कुर्बानी से सात भेड़ों की कुर्बानी के बराबर पुण्य मिलेगा।

अरबी भाषा में गाय को ‘बकर’ कहते हैं। इसे आधार बनाकर यह भी प्रचारित किया गया है कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी देनी चाहिए। किंतु ऐसा है नहीं। क्योंकि यदि अरबी भाषा में ऐसा कहना होता तो इसे इदे-बकर’ कहते न कि बकरीद।

यद्यपि कुरान-शरीफ में इदुज्जुहा पर कुर्बानी को सम्मति दी गई है लेकिन इसे धार्मिक फर्ज नहीं माना है। इस्लाम में कलमा, जकात, रोजा और हज धार्मिक फर्ज हैं कुर्बानी धार्मिक फर्ज नहीं है और ना ही मांसाहार धार्मिक फर्ज है। कोई भी मुसलमान कुर्बानी न देकर और मांसाहार न करके भी मुसलमान रह सकता है।

भारत में इस्लाम

भारत में आधुनिक इस्लाम का प्रवेश हजार-बारह सौ वर्ष पहले ही हुआ है। प्रारंभ में सांस्कृतिक टकराव हुआ लेकिन जल्दी ही वह बात ध्यान में आ गई कि भारत का सारा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ग्रामीण जीवन खेती, ग्रामोद्योग, परिवहन, आहार आदि गाय-बैल पर आधारित है। इसलिए यहां गोमांस और गाय, बैल की कुर्बानी नहीं चलेगी। इस प्रकार भारत में इदुज्जुहा पर बकरे की कुर्बानी प्रचलित हुई और इदुज्जुहा को बकरीद माना गया। भारत में पहले से ही अनेक पंथों में बकरे की बलि देने की प्रथा थी इसलए यहां इसे स्वीकार करने में भी कठिनाई नहीं हुई।

मुस्लिम शासकों की देन

भारत में इस्लाम के प्रवेश से बहुत पहले से परंपरा से ही गोहत्या बंद थी। लेकिन मुस्लिम शासकों को लगा कि मुस्लिम नागरिक कुरान में इजाजत होने से गाय-बैल की कुर्बानी भी दे सकते हैं और मांस के चमड़े के लिए इनका कतल भी कर सकते हैं। इसलिए मुस्लिम शासकों ने गोहत्याबंदी कानून बनाये। इसका बहुत अच्छा विवरण डा.सैयद मसूद ने अपनी पुस्तक ‘काउ प्रोटेक्षन इन इण्डिया अंडर मुस्लिम रूल’ में किया है। बादशाह अकबर से लेकर बहादुरशाह जफर तक संपूर्ण मुगलिया सल्तनतों में गोहत्या प्रतिबंधित रही।

जम्मू-कश्मीर में जेनुअल आबदीन ने गोहत्याबंदी का जो कानून बनाया वह कुछ संशोधनों के साथ वहां आज तक प्रचलित है। शेख अब्दुल्ला ने भी उसे कायम रखा और डॉ.फारुख अब्दुल्ला ने तो राज्य के बाहर से गोमांस मंगाकर बेचना भी प्रतिबंधित किया।

कुरान शरीफ में गाय

कुरान शरीफ में जगह-जगह दूध की महिमा का वर्णन है। खासकर पारा - 14 रुकअ -7 की दूसरी आयत में गाय की नियामतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है।

हजरत मोहम्मद साहब का जीवन सभी के लिए आदर्श अनुकरणीय जीवन है। उन्होंने कुरान शरीफ की हिदायतों के अनुसार जीवन जीकर दिखाया है। इसलिए उनके वचनों का विशेष महत्व है। उनके वचन जो हदीस में प्रकट हैं वे स्पष्टतः गोरक्षा को पुष्ट करने वाले हैं। उनका एक वचन है, “अकरमल बकर काइलहा सैय्युदल बहाइम” अर्थात गाय की इज्जत करो क्योंकि वह चौपायों की सरदार है।” हजरत इमाम आजम अबु अनीफा ने अपनी पुस्तक में हदीस क्रमांक 494.4 में लिखा है “अल्लाह ने नहीं उतारी कोई बीमारी जिसकी उसने दवा नहीं उतारी सिवाय बुढ़ापा और मौत के। तुम गाय का दूध पीने के पाबंद हो जाओ, चूंकि गाय अपने दूध के अंदर सभी तरह के पौधों के सत्व को रखती है।” इसी पुस्तक में दूसरी एक हदीस है, “इब्नेसनी और हाकिम अबू नईम रखायत लाए हैं कि नबी अलैहि सलेल्लाहि वस्सलम, मोहम्मद साहब ने फरमाया है कि “लाजिम कर लो गाय का दूध पीना क्योंकि वह दवा है, गाय का घी शिफा है और बचो गाय के गोश्त से चूंकि वह बीमारी पैदा करता है।”

कुरान शरीफ में मनुष्यों के लिए खाने की चीजों के बारे में लिखा है :

मनुष्य अपने अन्न की ओर देखे

कि हमने उपर से खूब पानी बरसाया,

फिर हमने विशेष प्रकार से जमीन चीरी,

उसमें अनाज उगाया

और अंगूर और सब्जियां

और जैतून और खजूरें

और घने बाग

और फल तथा चारा उगाया

तुम्हारे और पशुओं के लाभ के लिए - कुरान शरीफ 80.24.32

गोहत्या का कारण ब्रिटिश राज :

भारत में अंग्रेजों ने अपनी फौज के लिए गोमांस की आपूर्ति के लिए मुस्लिम कसाइयों को कतल के धंधे में लगाया। चमड़े का निर्यात शुरू किया। इस प्रकार मांस और चमड़े का व्यापार और कतल का धंधा अंग्रेजी राज की देन है। उन्होंने इसका उपयोग हिन्दू-मुस्लिम द्वेष बढ़ाने में भी किया।

अंग्रेजों की इस चाल को नाकाम करने का प्रयास खिलाफत आंदोलन के समय मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली ने गोहत्याबंदी के समर्थन में मस्जिदों में जा-जाकर अपनी तकरीरों में किया।

भारतीय संविधान में गोहत्याबंदी :

आजादी के बाद भारत की संविधान सभा में मौलाना अबुलकलाम आजाद,  डॉ.जाकिर हुसैन, शेख अब्दुल्ला सहित अनेक मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने सर्वसम्मति से संविधान की धारा 48 में गोहत्याबंदी को राज्यों का नीति निर्देशक सिद्धांत बनाया। इसके आधार पर जिस किसी राज्य में भी गोहत्याबंदी कानून बने वहां मुस्लिम विधायकों ने उसका समर्थन किया और ऐसे कानून सर्वसम्मति से ही बने।

गोहत्या के जिम्मेदार पूंजीपति उद्योगपति  

भारत में चल रही गोहत्या की जिम्मेदारी पूंजीपतियों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और निर्यातकों की है। इसके लिए न मुस्लिम जिम्मेदार हैं और न गरीब कसाई। मुस्लिम कसाई बहुत गरीब बेजुबान मजदूर हैं जो मांस-चमड़े के व्यापारियों और निर्यातकों के लिए मजदूरी के लिए कतल करते हैं। ऐेसे पूंजीपतियों में सभी धर्मों और जातियों के लोग हैं। गोहत्याबंद होने से मजदूर कसाइयों को कोई नुकसान होने वाला नहीं है और न उनका धंधा ही खतम होने वाला है। क्योंकि वे बकरा, बकरी, पाड़ा, भैंसा, भेड़ आदि के कतल से अपनी आजीविका चला ही सकते हैं। कानून से गोहत्या बंद होने से गोमांस और कतली चमड़ा व्यापारियों और उद्योगपतियों को वह नहीं मिलेगा। गाय-बैल की स्वाभाविक मृत्यु के पश्चात मृत चर्म उन्हें मिलेगा लेकिन वह भी उन्हें गांव से खरीदना पड़ेगा क्योंकि तब कतलखानों में गाय-बैल कतल नहीं हो सकेंगे। आज तो शहरों के बड़े-बड़े कतलखानों से उन्हें अपने उद्योगों के लिए चमड़ा आदि मिल जाता है।

इसीलिए ये सारे निहित स्वार्थी संगठित होकर कसाइयों के नाम पर सारी उठापटक करते हैं, अफवाहें फैलाते हैं, दंगा-फिसाद कराते हैं और धार्मिक अंधविश्वास भी फैलाते हैं। ये ही लोग राजनैतिक नेताओं और संचार माध्यमों को पैसा देकर प्रभावित कर ऐसा वातावरण बनाते हैं कि गोहत्याबंदी से मुसलमानों का हित और धर्म प्रभावित होगा और इससे इसलाम ही खतरे में पड़ जाएगा। ऐसे ही प्रचार का यह परिणाम हुआ कि पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ वर्षों पूर्व इदुज्जुहा पर वहां आधा-अधूरा गोहत्याबंदी कानून भी लागू न करने का आदेश जारी किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर खारिज कर दिया कि,  “इस्लाम में गाय-बैल की कुर्बानी देना धार्मिक अनिवार्यता नहीं है।”

हम आशा कर सकते हैं कि भारत में मुसलमान समन्वित भारतीय संस्कृति, संविधान के निर्देश और इस्लाम की भावना के अनुरूप इदुज्जुहा जैसे पवित्र त्यौहार पर गाय-बैल की कुर्बानी से बचेंगे। उनके ऐसा करने से भारत में अन्य धर्मवालों में इस्लाम के प्रति प्रेम और आदर बढ़ेगा जिससे अंततः सभी को लाभ होगा। (गोविभा अक्टूबर 2012)

गोहत्या और मांस निर्यात के दोषी

गोविभा के संपादक श्री नरेंद्र दुबे ने यह आलेख ‘गोरक्षा सत्याग्रह: पच्चीस वर्ष’ में लिखा था। इसका प्रकाशन 5 जून 2001 को शांतिसेवक के विषेषांक के रूप में हुआ था। आज यह आलेख अचानक से प्रासंगिक हो गया है। इसलिए यहां उसे ज्यों का त्यों दिया जा रहा है। 

कृषि प्रधान भारत में किसी भी उम्र के गाय-बैल का कत्ल केंद्रीय कानून से बंद किया जाए और मांस निर्यात बंद किया जाए। इस मांग को लेकर विनोबा जी ने 11 जनवरी 1982 से देवनार मुम्बई में गोरक्षा सत्याग्रह प्रारंभ किया। भारत भर में गोहत्याबंदी की मांग को लेकर जब वे आमरण अनशन कर रहे थे तब भारत सरकार ने संसद में वचन दिया था कि संविधान में संशोधन करके इस विषय को समवर्ती सूची में ले लिया जाएगा और गोहत्याबंदी का केंद्रीय कानून बना दिया जाएगा। इस अभिवचन के कारण ही विनोबा जी ने पांच दिन बाद अनशन छोड़ा था। लेकिन भारत सरकार ने वचन तोड़ा इसलिए विनोबा जी ने देवनार में सत्याग्रह शुरू किया। मुम्बई में सत्याग्रह का संयोजन विनोबा जी के आश्रम के अंतेवासी स्व.श्री अच्युत भाई देशपांडे आजीवन करते रहे। उनके निर्वाण के पष्चात् आज भी वहां गोरक्षा सत्याग्रह जारी है।

विनोबा जी के निर्वाण के मात्र सोलह दिन पहले 30 अक्टूबर 1982 को श्री अटलबिहारी वाजपेयी, राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के साथ विनोबा जी से पवनार आश्रम में मिलने आए थे। उस समय उनके बीच जो वार्तालाप हुआ, वह यहां प्रस्तुत है:

विनोबा जी: भारत में और दुनियाभर में भी किसी भी उम्र के गाय, बैल और बछड़े का कतल न हो इसके लिए प्रयत्न किया जाए।

वाजपेयी जी: अभी तो भारत में भी गाय कट रही है। कुछ लोग कहते हैं कि हम इंसान को नहीं बचा सकते हैं तो गाय को कैसे बचा सकते हैं ?

विनोबा जी: गाय इनसान से बड़ी है। मां बहुत हुआ तो दस महीने दूध पिलाती है। उसके बाद का काम कौन करेगा, आप करेंगे ?

वाजपेयी जी: अब आंदोलन का सरकार पर कोई असर नहीं होता।

विनोबा जी: असर हो इसके लिए क्या उपाय किया जाए ?

वाजपेयी जी: यह आप ही बताइए। इसीलिए मैं आया हूं।

विनोबा जी: इंदिरा जी को ‘राजी’ करना चाहिए। इंदिरा जी इसमें से ‘इंदि’ निकालो। ‘राजी’ करो।

वाजपेयी जी: ‘आप उन्हें राजी करें’ यह कहने के लिए और ‘हम उन्हें राजी कर सकें’ इसकी शक्ति हमें मिले इसके लिए हमें आपका आशीर्वाद मिले इसलिए हम आए हैं।

विनोबा जी: आप ‘वाजपेयी’ हैं न ?  ‘वा’ निकाल दीजिए। ‘जप’ करें। ‘जपे, जपे’।

वाजपेयी जी: भारतीय जनसंघ ने गोवंश की हत्या पर पूर्ण नियंत्रण करने के लिए आंदोलन किया था। तब हम उसमें शरीक हुए थे। लेकिन फिर लोकशाही का प्रश्न आगे आया और जनसंघ जनता पार्टी में विलीन हुआ तो गाय का प्रश्न पीछे पड़ गया। लोकषाही का प्रष्न आगे आया। अब दिसम्बर में भोपाल में अधिवेशन होगा। उसमें यह प्रश्न लेंगे। कठिनाई यह है कि गोरक्षा के पक्ष के लोग बंटे हुए हैं। मिलकर कभी आंदोलन नहीं चलता।

विनोबा जी: भोपाल में तय करेंगे, ठीक है।

विजयाराजे: देश में गोहत्याबंदी के पक्ष में कुछ मुस्लिम लोग हैं। ऐेसे अनुकूल मुस्लिमों का एक संगठन बने और वह संगठन देश में मुस्लिम जनमत खड़ा करे ताकि सरकार को यह बहाना नहीं मिलेगा कि मुस्लिम गोहत्याबंदी के पक्ष में नहीं हैं।

विनोबा जी: ठीक बात कहती हैं।

वाजपेयी जी: बंबई कार्पोरेशन में एक मुस्लिम सदस्य ने कहा कि 7 बकरे को काटने से जो पुण्य मिलता है वह एक गाय को काटने से मिलता है। क्या यह बात कुरआन में है ?

विनोबा जी: कुरआन में यह बात नहीं है। बल्कि मुहम्मदसाहब ने कहा है, गाय का गोश्त बीमारी पैदा करता है और गाय का दूध दवा है। बाबा ने कुरआन शरीफ के सब सूरों के नाम बताए और कुरआन-सार दिखाया। उसमें ‘मनुष्य का अन्न क्या है’ यह हिस्सा दिखाया।

वाजपेयी जी: अब तो बड़े पैमाने पर गोमांस निर्यात हो रहा है। सरकार ही उसे बंद कर सकती है। विदेशी मुद्रा के लोभ में यह हो रहा है। इसके लिए बैल भी कट रहे हैं।

विनोबा जी: इसीलिए बंबई में सत्याग्रह चल रहा है।

विजयाराजे: यदि इंदिराजी सारे भारत भर में गोवंश हत्याबंदी कानून बनाएगी, तो बड़े पुण्य की भागी होंगी ओर देश की सभी समस्याओं का हल निकाल सकेंगी। यह करने के लिए नैतिक साहस उनमें आएगा।

विनोबा जी: इंदिराजी से मिलकर आप लोग बातें करिए। उनकी अड़चनें क्या हैं, यह वे आपको बतायेंगी। इंदिराजी बाबा के पास आयी थीं। तब बाबा ने उन्हें सलाह दी थी कि रात को सोते समय ‘राम हरि’, ‘राम हरि’ का जप करो। इंदिराजी ने कबूल किया था कि वे ‘राम हरि’ का जप करेंगी।

विजयाराजे: बहुत अच्छी सलाह आपने उन्हें दी। फिर हमें आशा है।

विनोबा जी: हमेशा आशा रखें। निराश कभी नहीं होना चाहिए।

शांतिस्वरूप जी: आप अटलबिहारी वाजपेयी को और राजमाताजी को संपूर्ण गोवंश रक्षा के लिए हृदयपूर्वक आशीर्वाद दें, यही हमारी प्रार्थना है।

विनोबा जी: ठीक है। आशीर्वाद है। आप लोग बंबई जाइए, अपने खर्चे से जाएं और वहां अच्युतभाई को मदद करिए।

वाजपेयी जी: संसद सदस्य के नाते सरकार ने मुझे पास दे रखा है, इसलिए खर्चा नहीं लगता।

विनोबा जी: ठीक है।

(मैत्री से साभार)

इस चर्चा के बाद अटलजी बंबई आए थे। गोरक्षा सत्याग्रह के संचालक श्री अच्युतभाई उनसे मिले और देवनार सत्याग्रह में सम्मिलित होने का निवेदन किया। वे उस समय भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। तब उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वे पार्टी के अध्यक्ष हैं और जब तक पार्टी अनुमति नहीं देती वे सत्याग्रह में सम्मिलित नहीं हो सकते।

अब अटलजी प्रधानमंत्री हैं। लेकिन गोहत्याबंदी का केंद्रीय कानून बनाना तो दूर की बात लेकिन मांस निर्यात जो उनकी सरकार बिना कोई कानून बनाए भी बंद कर सकती है वह भी नहीं कर रही है। ऐसा क्यों है ? यह गंभीर चिंतन का विषय है।

लोकसभा में गोरखपुर के भाजपा सांसद श्री आदित्यनाथ ने गोहत्याबंदी कानून बनाने के संबंध में संसद के विचारार्थ एक प्रस्ताव रखा, जिसे विचार के लिए तो स्वीकार कर लिया गया, लेकिन इस संदर्भ में प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भाजपा सांसदों की बैठक में कहा कि “भाजपा सांसदों को बिना हाईकमान की अनुमति के कोई गैर सरकारी प्रस्ताव नहीं रखना चाहिए।” इससे यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी की पहली प्राथमिकता न गाय-बैल हैं और न ही देश के गरीब लोग। उनकी पहली प्राथमिकता तो अपनी सत्ता बचाने की और किसी भी तरह से उसे चलाने की ही है।

यह कहा जा रहा है कि जब तक भारतीय जनता पार्टी को अकेले दो तिहाई बहुमत नहीं मिलेगा, तब तक वह गोहत्याबंदी नहीं कर सकेगी। इसलिए जो लोग देश में संपूर्ण गोहत्याबंदी चाहते हैं वे भाजपा को दो तिहाई बहुमत दिलाने का प्रयत्न करें। इसका अर्थ यह हुआ कि भाजपा को दो तिहाई बहुमत मिलने तक देश में गोहत्या चलती रहेगी। इसके विपरीत गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री श्री बाबू भाई पटेल का उदाहरण है। वे जब मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने गुजरात में संपूर्ण गोहत्याबंदी कानून बनाने का प्रयत्न किया लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सन् 1958 के निर्णय के कारण नहीं बना सके। जब वे मुख्यमंत्री नहीं रहे तब देवनार सत्याग्रह में भाग लिया और अपनी गिरफ्तारी दी। बाद में उन्हीं के प्रयास से स्व.चिमनभाई पटेल ने गुजरात में संपूर्ण गोहत्याबंदी कानून बनाया, जिसे गुजरात उच्च न्यायालय ने संविधानसम्मत न मानकर रद्द कर दिया।

सारे देश को यह समझ लेना चाहिए कि गोरक्षा का प्रश्न दलीय राजनीति से या सत्ता की राजनीति से हल नहीं होगा। यह प्रश्न संप्रदायवाद से भी हल नहीं होगा। यद्यपि गोसेवा में निष्ठावान हिंदू गोभक्तों ने महान योगदान दिया है, किंतु गोहत्या के लिए संप्रदायवादी हिंदू ही ज्यादा जिम्मेदार हैं, क्योंकि गोहत्याबंदी आंदोलन को मुसलमानों के प्रति घृणा और द्वेष भड़काने का आंदोलन बनाते हैं और उसकी प्रतिक्रिया में मुस्लिम मानस ज्यादा से ज्यादा गो-विरोधी और हिंदू विरोधी बन जाता है।

विनोबाजी ने जो गोरक्षा सत्याग्रह शुरू किया है उसका आधार ही सत्य, प्रेम और करुणा है। जैसे गांधीजी चरखे को अहिंसा का प्रतीक मानते थे और ‘सूत्र यज्ञ’ में सबको सम्मिलित करते थे वैसे ही विनोबाजी गाय को प्रेम और करुणा का प्रतीक मानते हैं और मुसलमान, ईसाई आदि सभी को गोरक्षा के महान यज्ञ में सम्मिलित करना चाहते थे। भारत में गोरक्षा भारतीय संस्कृति का प्रतीक है, जो हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि सभी की समन्वित साझा संस्कृति है। भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि यहां मुगल बादशाहों ने कानून बनाकर गोहत्याबंदी की थी। यदि भारत में सभी समुदाय के लोग मिलकर प्रेम से गोरक्षा करें और सभी राजनीतिक दल मिलर गोहत्याबंदी कानून बनाएं तो सारे विश्व पर उसका वैसा ही जबर्दस्त असर होगा जैसा भारत की आजादी का हुआ था। जब कांग्रेस और भाजपा मिलकर कई सारे विधेयक पास कर सकते हैं तो गोहत्याबंदी विधेयक क्यों नहीं ?

विज्ञान और टेक्नालाजी के संदर्भ को ध्यान में रखकर और देश की विकट आर्थिक स्थिति को देखकर ही हम यह मांग कर रहे हैं। गोहत्याबंदी से ही अपना देश आर्थिक गुलामी से बच सकता है। भारत में गोरक्षा से ही अहिंसक आर्थिक क्रांति हो सकती है। इसी से जैविक खाद, दूध उर्जा, जलावन गैस, परिवहन, बेरोजगारी जैसे कठिन प्रष्न हल हो सकते हैं और हिंसा केा मिटाया जा सकता है।

Author: mahamana pandti madanmohan malviya Published On: 2017-04-05 21:20:40

गोरक्षा के साधन

महामना पं.मदनमोहन मालवीय

दूध के उत्पादन में वृद्धि की आवश्यकता

भारत सरकार द्वारा दूध के व्यवसाय पर प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा है, “मनुष्य के भोजन में दूध का व्यवहार तभी से चला आता है, जब से मानव इस जगत में आया है। जितने ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जो अकेले आहार के काम में आ सकते हैं, दूध सबसे अधिक पूर्ण है। इसीलिए वह सदा बड़ा आदरणीय समझा जाता रहा है। इसके अंदर जीवन केो स्थिर खने तथा बढ़ाने के लिए आवष्यक सभी तत्व सुपाच्य रूप में विद्यमान हैं। आज तक किसी ऐसे दूसरे स्वतंत्र आहार का पता नहीं चला, जिसका प्रयोग दूध के स्थान पर किया जा सके।

इसी रिपोर्ट के अंतर्गत ‘दूध के उत्पादन को बढ़ज्ने की संभावनाएं’’ शीर्षक में लिखा है,  “उचित भोजन और व्यवस्था के द्वारा भारतीय पषुओं के दूध का उत्पादन जल्दी ही पचास प्रतिषत के लगभग बढ़ाया जा सकता हैं इस कथन की पुष्टि इस बात से होती है कि देहाती गायें जब सरकारी फार्मों में लायी जाती हैं, तो आगे के ब्यानों में पहले की अपेक्षा साठ प्रतिषत अधिक दूध देती हैं। इन गायों की पहली संतानों के दूध में उनकी माताआं की अपेक्षा भी दस-पंद्रह प्रतिशत तक और अधिक वृद्धि देखी जाती है। गांवों में गौएं अधिक समय तक दूध नहीं देतीं, छुटी रहती हैं, फार्मों में पहुंच जाने पर उनके छुटे रहने का समय भी बहुत घट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप् उसी अनुपात में दूध के उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है। इन आशाजनक लक्षणों से तथा इस बात से कि गौओं के बहुत से टोलों के दूध का उत्पादन बीस वर्ष से कम में वस्तुतः तिगुना हो गया है, यह बात सूचित होती है कि भारतीय गौओं को यदि अच्छा भोजन दिया जाय, चुने हुए सांडों से उन्हें गाभिन कराया जाए तथा रखने का उचित प्रबंध हो तो उनका दूध बहुत अधिक बढ़ सकता है।

प्रतिव्यक्ति दूध की खपत

किसी समय इस देश में दूध बहुत अधिक मात्रा में मिलता था। किंतु अब यह सोचकर बड़ा खेद होता है कि मनुष्य के आहार के ऐसे आवश्यक पदार्थ की खपत प्रतिव्यक्ति इस देश में शायद अन्य सभी सभ्य देशों की अपेक्षा कम है। भारत के पशु व्यवसाय की वृद्धि तथा भारत में दूध के व्यवसाय के संबंध में प्रकाशित हुई रिपोर्टों में अनेक परामर्ष दिए गए हैं, जो विचार करने योग्य हैं तथा जिन्हें ऐसे परिवर्तनों के साथ जो स्थानीय परिस्थिति के अनुसार आवश्यक हो, व्यवहार में लाना चाहिए।

‘भारत के दूध व्यवसाय पर जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है -

‘व्यवसाय की दृष्टि से दूध तथा दूध से बने हुए पदार्थों की मांग केवल शहरों में ही अधिक है। यद्यपि दूध देने वाले पशुओं  में पंचानवे प्रतिषत से अधिक गांवों में ही पाये जाते हैं तथा भारत की नब्बे प्रतिशत जनता (अब साठ प्रतिशत) गांवों में रहती है तो भी गांवों में दूध की मांग अपेक्षाकृत बहुत कम है अर्थात गांवों में दूध के ग्राहक अधिक नहीं हैं। इसके कई कारणों में से एक तो यह है कि दूध खाने वालों में से बहुतों के घर में दूध होता है, दूसरे नगरवासियों की अपेक्षा गांवों के किसानों में दूध खरीदने की सामथ्र्य कम होती है। उनमें से अधिकांष दूध या दूध से बने हुए पदार्थ खरीदकर नहीं खा सकते। वहां बहुत से लोगों को तो, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, कभी दूध मिलता ही नहीं। यहां तक कि ऐसे इलाकों में भी जहां दूध का व्यवसाय होता है और जहां बहुत अधिक मात्रा में दूध होता है, सोलह प्रतिशत परिवार दूध या दूध से बने पदार्थों का बिलकुल उपयोग नहीं करते। ऐसी दषा में जहां दूध बहुत कम होता है, ऐसे भारतीय देहातों में तो दूध या दूध से बने पदार्थों को खरीद कर खाने की सामथ्र्य और भी कम होनी चहिए।’

भारत में पशुओं तथा दूध के व्यवसाय की वृद्धि के संबंध में जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है -

‘यदि भारतीय जनता यह चाहती है कि उसे भोजन में दूध पर्याप्त मात्रा में मिले तो सबसे पहले यह आवष्यक है कि देश में दूध का उत्पादन बहुत अधिक मात्रा में बढ़ाया जाय। यह भी अनुमान किया गया है कि न्यूनतम आवष्यकतापूर्ति के लिए भी दूध का उत्पादन कम से कम दुगुना करना पड़ेगा। किंतु उत्पादन की इस वृद्धि से तब तक उद्देष्य सिद्धि न होगी जब तक कि दूध का भाव न घटा दिया जाए अथवा जनता की औसत आय में वृद्धि न हो। दूसरा उद्देष्य जिसे सदा ध्यान में रखना हेागा, यह है कि दूध का भाव इतना मंदा रहे कि उसे अधिकांश जनता खरीद सके।

खपत में वृद्धि की गुंजाइश

पर्याप्त गोचर भूमि की व्यवस्था, अच्छी नस्ल पैदा करने के लिए सांडों संख्या में वृद्धि तथा दूध की बिक्री का प्रबंध - इन तीनों बातों की इस समय सबसे अधिक आवश्यकता और उत्सुकतापूर्वक यह आषा की जाती है कि यथासंभव शीघ्र ही इन आवष्यकताओं की पूर्ति के लिए विषेश प्रयत्न किए जाएंगे।

गोचर भूमि

जैसा कि बार-बार बताया जा चुका है, पशुओं के ह्यस का एक मुख्य कारण पर्याप्त गोचर भूमि का न होना है। एक तो गोचर भूमि यों ही पर्याप्त नहीं है, उस पर अधिक शोचनीय बात यह है कि प्रतिदिन जमींदार एवं किसानों के लोभ के कारण इनका क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। कई वर्ष पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल रेमंड ने कहा था कि बंगाल के सभी जिलाधीषों की रिपोर्ट बतलाती है कि बंगाल प्रांत के प्रायः सभी जिलों में गोचर भूमियों की संख्या कम कर दी गयी है, जिसके परिणामस्वरूप पषुओं की संख्या घट गयी है। श्रीयुत ब्लैकवुड ने कहा था कि निस्संदेह बंगाल में पशुओं की वृद्धि में सबसे मुख्य बाधा गोचरभूमियों की कमी है।’

ऐस कहा जाता है कि यूरोप के किसी भी देश की अपेक्षा भारत में भूमि का मूल्य सस्ता है। ऐसी दषा में आषा यह होनी चाहिए थी कि यहां पशुओं के चरने के लिए और देषों की अपेक्षा भूमि का अधिक भाग सुरक्षित रखा जाता पर बात ऐसी नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व गोचरभूमि और जोती हुई भूमि का अनुपात संयुक्त राज्य अमेरिका में 1ः16, जर्मनी में 1:6, इंग्लैंड में 1:3 तथा जापान में 1:6 था, किंतु भारत में केवल 1:27 था। भारत में गोचर भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाने की आवष्यकता पर जितना अधिक जोर दिया जाए, उतना थोड़ा है।

सन 1913 में कृषि बोर्ड के सम्मुख गोचरभूमि न्यूनता का प्रश्न  विचार के लिए उपस्थित हुआ था। उक्त बोर्ड ने श्रीयुत एच.आर.सी.हेली की अध्यक्षता में विषेशज्ञों की एक समिति नियुक्त की। उस समिति ने निम्नांकित परामर्ष दिए -

1 गोचर भूमि के छोड़ने की व्यवस्था कानून द्वारा होनी चाहिए। पशु चारण के अधिकार पर सभी प्रकार से नियंत्रण अवांछनीय समझे जाना चाहिए। स्थानीय अधिकारियों तथा म्युनिसपल एवं जिला बोर्डों को चाहिए कि वे गोचर भूमियों की सीमा बांध दें तथा उन पर किसी का अधिकार न होने दें।

2 अनुपयोगी भूमि को खेती के योग्य बनाना। यह कार्य कृषि विभाग के निकट सहयोग से जंगल विभाग द्वारा व्यवस्थित रूप में होना चाहिए। और इस प्रकार खेती के योग्य बनायी हुई भूमि को गोचर भूमि के रूप में खुली छोड़ देना चाहिए।

3 वर्तमान गोचरभूमियों पर किसी का अधिकार न हो, इसके लिए कानून बनने चाहिए और ऐसे कानूनों द्वारा म्युनिसिपल एवं जिला बोर्डों को अधिकार दिए जाने चाहिए कि वे अपनी आय का एक भाग गोचर भूमियों को अधिकृत करने में व्यय करें।

4 सरकार तथा स्थानीय बोर्डों के खर्च से गोचरभूमियों को अधिकृत करना चाहिए।

कृषि के संबंध में सम्राट की ओर से एक कमीशन (जांच समिति) बैठा था, जिसने इस विशय पर विचार करके सन् 1928 में अपनी रिपोर्ट दी थी। कमषीन ने लिखा था -

‘पशुओं की रक्षा के संबंध में सबसे आवष्यक बात है - उनके भोजन की व्यवस्था। भारत में, जहां कि पशुओं को बांध कर खिलाने की प्रथा नहीं सी है, चराने की सुविधाओं पर ही मुख्य रूप् से विचार करना चाहिए। ऐसा कहा जा सकता है कि भारत के प्रायः प्रत्येक भाग में गांव के समीप की सार्वजनिक गोचरभूमि तथा घास के मैदानों में सामान्यतः आवष्यकता से अधिक प्षु चराये जाते हैं।’ कमीशन ने आगे चलकर लिखा है -

‘प्षुओं की उन्नति के लिए मुख्यतः दो बातों पर ध्यान देना आवष्यक है - खुराक और नस्ल। इनमें भी हम खुराक को प्रथम स्थान देते हैं क्योंकि जब तक प्षुओं को अच्छी तरह खिलाया-पिलाया नहीं जाएगा, तब तक संतानोत्पादन के तरीकों में कोई विषेश सुधार नहीं हो सकता। यह कोई आष्चर्यजनक बात नहीं है कि कमीशन के सामने के बयान देने वालों में से बहुतों ने गोचर भूमियों को बढ़ाने की सम्मति दी है। किंतु इस संबंध में जो कुछ हो सकता है, उसकी पूरी छानबीन करने के प्ष्चात हम लोगों ने यह मत स्थिर किया है कि वर्तमान गोचरभूमियों में अधिक वृद्धि की गुंजाइश नहीं है। अत हम लोगों को चाहिए कि जितनी भूमि मेें इस समय घास पैदा होती है, उसीकी उत्पादन शक्ति को बढ़ाने में अपना सारा प्रयत्न लगा दें। ऐसे प्रयत्नों के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र उपस्थित है।

मुक्तेसर में स्थित पशु चिकित्सा संबंधी राजकीय अनुसंधानशाला के डायरेक्टर श्री एफ.वेयर ने भारत की पशु चारण समस्या पर एक वक्तव्य तैयार किया थ, जिसे उन्होंने बोर्ड आफ एग्रिकल्चर एंड ऐनिमल हसबेंड्री की पशु प्रबंध शाखा की द्वितीय वार्षिक बैठक में उपस्थित किया था। उसमें उन्होंने लिखा है -

‘कृषि के संबंध में बैठाये गये शाही कमीशन की सन् 1928 की रिपोर्ट निकलने के बाद उस रिपोर्ट में विचारित कई बातों में अच्छी उन्नति हुई है, किंतु गो चारण ही एक ऐसा विषय है, जिसके संबंध में यह बात लागू नहीं होती। सन् 1929 में पुराने कृषि बोर्ड की अंतिम बैठक में इस विशय पर संक्षेप में विचार हुआ था। उसमें दो सामान्य प्रस्ताव ऐसे पास हुए थे, जिनमें वर्तमान गोचरभूमियों की रक्षा एवं उनके समुचित उपयोग पर जोर दिया गया था। किंतु अब तक बहुत ही कम स्थानों में गोचर भूमियों के सुधार के लिए कोई स्थायी प्रयत्न किया गया है।’

पशु चारण के लिए जंगली इलाकों के समुचित उपयोग के संबंध में जो प्राथमिक परामर्श सभा हुई थी, उसमें इस विषय पर विचार गया था। इस सभा की रिपोर्ट सन् 1936 में ‘बोर्ड आफ एग्रिकल्चर एंड एनिमल हसबेंड्री के सम्मुख उपस्थित हुई थी। उस पर बोर्ड ने अपनी निम्नलिखित सम्मति प्रकट की थी - अनुपयोगी भू भागों की उन्नति की संभावनाओं पर विष्वास करते हुए हमारा यह निश्चित मत है कि रायल कमीशन की कल्पना के अनुसार इन अनुपयोगी भूभागों का पुनर्वर्गीकरण किसी प्रांतीय सरकार के किसी एक विभाग पर नहीं छोड़ा जा सकता। हम सिफारिश करते हैं कि प्रत्येक प्रांत में एक स्थायी ‘चारा तथा पशु-चारण-समिति का निर्माण हो और उसके सदस्य वे अफसर हों, जो जंगल तथा माल (रेवेन्यू) के महकमों द्वारा इस काम के लिए नियुक्त किए जाएं तथा एक पशु प्रबंध विभाग अफसर हो। प्रत्येक प्रांत की यह स्थायी समिति इम्पीरियल कौसिंल आफ एग्रिकल्चरल रिसर्च की एक नवीन पशु चारण उपसमिति की प्रांतीय समिति के रूप् में काम करेगी। और तब यह उप समिति सारे भारतवर्ष के लिए सुव्यवस्थित रूप् में काम कर सकेगी। यद्यपि यह समस्या भारतभर की समस्या है तथापि इसे हल करने का तरीका प्रत्येक प्रांत के लिए अलग-अलग होगा। प्रांतीय चारा तथा पशुचारण समिति का कर्तव्य है कि वह सरकारी जंगलों के बाहर अनुपयोगी भूभागों के पुनर्वर्गीकरण की जांच करे तथा ऐसे भूभागों को चुने, जिनमें चारा उग सकता हो अथवा जिनकी गोचरभूमि के रूप् में व्यवस्था की जा सके। समिति को ऐसे भूभागों के अधिकार तथा प्रबंध के विषय में प्रस्ताव भी उपस्थित करने चाहिए। डाक्टर एन.सी.राइट ने भारत में पशुओं के व्यवसाय तथा दुग्ध व्यवसाय की उन्नति पर सन् 1937 में जो रिपोर्ट उपस्थित की थी, उसमें चारा तथा पशुचारण समितियों के निर्माण के प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया है। यह अत्यधिक वांछनीय है। ऐसी समितियां प्रत्येक जिले में बनें, जिनमें कुछ गैर सरकारी, स्थानीय कृषिकार, जमींदार तथा आसामी अपने-अपने हल्कों में काम करने के लिए सम्मिलित कर लिए जाया करे। सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि भिन्न-भिन्न प्रांतों तथा राज्यों के सरकारी अफसरों और कृषि से संबंध रखने वाली साधारण जनता के मस्तिष्क में यह विष्वास बैठा दिया जाए कि कृषि प्रधान भारत की आर्थिक समस्याएं हल ‘मिश्रित खेती’ की प्रणाली को ग्रहण करने पर निर्भर करता है। इस प्रणाली के अनुसार किसान अपनी साधारण खेती चालू रखते हुए साथ-साथ गाय बैल भी पालेंगे तथा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देशभर में गोचरभूमियों की पर्याप्त वृद्धि हो और पर्याप्त मात्रा में चारे की खेती हो।

नस्ल

अब हमें नस्ल के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। एक सामान्य कहावत है कि भोजन से अधिक प्रभाव नस्ल का पड़ता है। अच्छी नस्ल का मूल्य आंका नहीं जा सकता। श्री नीलानंद चटर्जी कहते हैं कि अच्छी जाति के सांडों से नस्ल पैदा कराने में दो लाभ हैं। पहला लाभ तो यह है कि हमें बछड़े उत्तम श्रेणी के मिलते हैं। दूसरा लाभ, जो सबसे अधिक महत्व का है और जिसका फल तुरंत मिलता है, यह है कि गाय का दूध बढ़ जाता है। स्थायी लाभ इसमें है कि नस्ल की उन्नति के लिए उसी जाति के उत्तम सांड द्वारा गाय को बरधारया जाय। नस्ल का वास्तविक सुधार उत्तम से उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्लों की उन्नति करने में है न कि एक जाति की गौ को दूसरी जाति के सांड से बरधाने में अथवा विदेशी रक्त का मिश्रण कराने में। इंग्लैंउ तथा आस्ट्रेलिया सांडों से नस्ल उत्पन्न कराने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं।

सरकारी फार्मों से उत्तम जाति वाले सांडों के वितरण के संबंध में शाही कमीशन ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि देश के पशुओं की आवश्यकता को देखते हुए सन 1926 तक इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है। कमीशन ने गणना करके बताया कि प्रतिवर्ष दो लाख सांडों को वितरित करने की आवश्यकता थी, किंतु बड़े-बड़े प्रांतों में वास्तव में 500 से कुछ ही अधिक सांड प्रतिवर्ष बांटे गए। यद्यपि प्रतिवर्ष सरकारी फार्मों से बांटे जाने वाले सांडों की संख्या लगभग दुगुनी कर दी गयी है, फिर भी भारत को जितने सांडों की आवश्यकता है, कुल मिलाकर उनका एक क्षुद्र अंश ही अब तक बांटा गया है।

सूरज सांड

भारत में गायों को बरधाने की कोई व्यवस्थित प्रणाली न होने के कारण उसके अभाव की पूर्ति अति प्राचीनकाल से सूरज सांड से की जाती रही है। हिंदूलोग इन सांडों को अपने संबंधी की मृत्यु के ग्यारहवें दिन छोड़ा करते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए सांडों का कार्य केवल गोवंश की वृद्धि करना है। धर्मशास्त्रों में यह विधान किया गया है कि ऐसे सांडों को जिस काम के लिए छोड़ा जाता है उसके अतिरिक्त न तो उनसे हल चलाने का काम लिया जा सकता है और गाड़ी में जोतने का और न कोई अन्य काम ही लिया जा सकता है। उन्हें खूब अच्छी तरह खिला-पिलाकर स्वतंत्र घूमने के लिए छोड़ देना चाहिए, जिससे उन्हें पर्याप्त व्यायाम मिले और वे स्वस्थ्य तथा बलवान बने रहें। यह प्रथा अब तक कई स्थानों में प्रचलित है। किंतु बंगाल के कृषि विभाग के डायरेक्टर श्री टी.आर.ब्लैकवुड, आईसीएस ने यह लिखा है कि प्रांतभर में ऐसा एक भी जिला नहीं है, जिसमें गोवंश की वृद्धि के लिए अच्छे सांड पर्याप्त संख्या में उपलबध हों। उनका यह विचार ठीक ही है कि पवित्र समझे जाने वाले सूरज सांडों द्वारा नस्ल पैदा करने की हिंदुओं की पुरानी प्रथा स्वयं पशुओं के दृष्टिकोण से बहुत अच्छी थी, क्योंकि इसका परिणाम यह होता था कि उन्हें खुला छोड़ देने का परिणाम भी यह होता था कि लोग उन्हें अच्छी तरह खिलाते-पिलाते थे तथा उन्हें पर्याप्त व्यायाम भी मिल जाता था।

श्री नीलानंद चटर्जी का कहना है - पशुओं के नस्ल सुधार के विशय पर ‘इम्पीरियल बोर्ड आफ एग्रिकल्चर’ द्वारा कई बार विशेषकर 1913 तथा 1917 में विचार हो चुका है तथा भारत के विभिन्न प्रांतों के पशु चिकित्सा विभाग के डायरेक्टरों तथा सुपरिंटेंडेंटों ने भी इस विषय पर मननपूर्वक विचार किया है। संक्षेप में उन लोगों के परामर्श निम्नांकित हैं।

1 सूरज सांड किसी की संपत्ति नहीं हैं, अदालतों द्वारा दिए हुए इस प्रकार के निर्णय के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए कानून द्वारा सूरज सांडों का अधिकार म्युनिसिपल्टी, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड तथा स्थानीय सभाओं को सौंपकर उन्हें इस बात के लिए बाध्य करना चाहिए कि वे अपनी-अपनी सीमा के भीतर पशु संख्या तथा आय के अनुपात से नस्ल वृद्धि के लिए कम से कम थोड़े से उत्तम सांडों को अपने खर्च से रखें अथवा एक उचित रकम सहायता के रूप् में देकर किसी सार्वजनिक या व्यक्तिगत संस्था द्वारा उनके भरणपोषण की व्यवस्था करायें।

2 विशेषकर नस्ल बढ़ाने के उद्देष्य से सांड रखने के विचार को प्रोत्साहन देने के लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए तथा डिस्ट्रिक्ट बोर्डों को चाहिए कि वे जितने सांड चाहें रख सकें।

3 इस बात को बार-बार दुहराया जा चुका है कि नस्ल में वास्तविक सुधार उत्तम से उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्ल के सुधार से ही संभव है। संकर जाति की नस्ल उत्पन्न करके या विदेशी रक्त का मिश्रण करने से नहीं। इंग्लैंड तथा आस्ट्रेलिया के सांडों से नस्ल उत्पन्न करने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं। मेजर वाल्डे का कहना है कि मुख्यतया आसपास की सभी नस्लों का ह्रास हुआ है तथा कर्नल एच.ईवंस के कथनानुसार बर्मियों की संकर जाति की संतान पैदा न करने की नीति ही बर्मी पशुओं के अत्युत्तम गुणों को बनाये रखने में सहायक हुई है।

4 भारत के कृषि बोर्ड के सन् 1919 के कार्य विवरण में कर्नल जी.के.वाकर तथा सर्वश्री जैकब, वुड, मेकेंजी, नाइट एवं टेलर ने कहा है कि पूर्ण शक्ति के साथ पशु वृद्धि के व्यवसाय को प्रोत्साहन देना तथा उसकी वृद्धि करना सरकार का मुख्य कर्तव्य है।

(क) सरकारी पशु पालन शालाओं की संख्या में वृद्धि करना।

(ख) सरकार को चाहिए की वह उत्तम से उत्तम नस्ल के देशी पशुओं का पालन करे तथा इन नस्लों की रक्त शुद्धि बनाये रखे।

(ग) पशु-वृद्धि के लिए भूखण्डो को निर्धारित करना तथा उनकी रक्षा करना।

(घ) सरकारी या दूसरे प्रमाणित फार्मों से उत्तम श्रेणी के पशुओं का विरण।

सूरज सांड किसी की भी संपत्ति नहीं है

हाईकोर्ट के द्वारा दिए हुए इस प्रकार के निर्णयों के दुष्परिणामों को रोकने के लिए अब तक कोई कानून नहीं बना। इस प्रकार का कानून यथासंभव शीघ्र बन जाना चाहिए। अन्य प्रस्तावित उपायों को भी समूचे भारत वर्ष की आवश्यकता के अनुसार थोड़े या अधिक पैमाने पर अमल में लाना चाहिए।

पशुवध की रोक

किंतु सबसे महत्व का प्रश्न, सब प्रश्नों का एक प्रश्न है - पशुओं की निर्बाध हत्या। ऐसा केवल भारत में ही संभव है। संसार के अन्य किसी सभ्य देश में इस प्रथा को एक दिन के लिए भी प्रोत्साहन नहीं मिल सकता। श्रीनीलानंद चटर्जी लिखते हैं - क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक अच्छी स्वस्थ, जवान गाय का भी, जो छुटाने के समय तक प्रतिदिनि लगभग ढाई सेर दूध देती है, बेखटके वध कर दिया जाता है ? कलकत्ते की एक म्युनिसिपल पशुवध शाला में मैंने अपनी आंखों ऐसा होते देखा है। इस प्रकार का केवल यही एक उदाहरण नहीं है। कलकत्ते की म्नुनिसिपल पशु वधशाला में ऐसी-ऐसी पांच सौ (आजकल तो ज्यादा) गायों का वध प्रतिदिनि होता है। सोचिये, कलकत्ते में कई पशुवध शालाएं हैं तथा भारत में कई ऐसे नगर और कस्बे हैं, जहां बारह महीनों गोवध का कार्य चालू रहता है। खोज करने से पता चला है कि मारे जाने वाले पशुओं में से सत्तर से नब्बे प्रतिशत तक पशु छोटी अवस्था में ही मार दिए जाते हैं और बजाय इसके कि वे दस या बारह वर्ष तक और जीकर मनुष्य को लाभ पहुंचाते, पहले या दूसरे ब्यान के बाद ही मार डाले जाते हैं। इस प्रकार जो थोड़े से उत्तम श्रेणी के पशु बचे रहते हैं, वे भी समय से पहले ही मार दिए जाते हैं।

पशुओं के ह्रास विषय पर लिखने वाले कई विद्वानों का कहना है कि दूध देने वाले पशुओं का वध इस ह्रास का मुख्य कारण है। इस विषय पर भी श्री नीलानंद चटर्जी के निम्नांकित कथन की ओर ध्यान देना चाहिए। वे लिखते हैं -

इस देश में अंग्रेजों के आने के पूर्व गोवध प्रायः नहीं था। यह सच है कि मुसलमानी राज्य में कुछ मुसलमालन गोमांस खाते रहे होंगे, किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी तथा वध न किए जाने वाले पशुओं की संख्या तो बिलकुल नगण्य थी। यहां तक कि आज भी जो अच्छे और उच्च वर्ग के मुसलमान हैं वे गोमांस को छूने तक में अपनी हतक तथा अपमान समझते हैं। वे मुख्यतः मेढ़े अथवा बकरे का मांस खाते हैं। भारत का जलवायु गोमांस भक्षण के अनुकूल नहीं पड़ता। मुसलमानों के गोमांस से परहेज करने में यह एक मुख्य कारण है,  दूसरा कारण है, जो इससे कम महत्व का नहीं है, हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति आदर का भाव था। इस भाव की प्रतिध्वनि हमें इस बीसवीं सदी में सुनायी पड़ी थी। जबकि अफगानिस्तान के स्वर्गीय अमीर हबीबुल्लाह साहब भारत में पधारे थे तथा ईद के अवसर पर दिल्ली में इस विषय पर उन्होंने भाषण दिया था। उन्होंने मुसलमानों से कहा था, “यद्यपि परंपरा के अनुसार मेरे सत्कार में आप लोगों को सौ गायों की कुर्बानी करनी चाहिए, किंतु एक भी गाय की कुर्बानी मत कीजिए। आप लोगों को दिल्ली या भारत के किसी भी भाग में मेरे नाम पर गाय की कुर्बानी या और कोई ऐसा धार्मिक कृत्य नहीं करना चाहिए जिससे सम्राट एडवर्ड के साम्राज्य की हिंदू प्रजा को पीड़ा या दुःख हो। क्यों ? क्या बकरे पर्याप्त नहीं हैं ? क्या दिल्ली की जुमा मस्जिद में कुर्बानी करने के लिए पर्याप्त ऊंट नहीं हैं ? मैं आप लोगों के साथ ईद का महत्वपूर्ण त्योहार मनाने जा रहा हूं। यदि आप लोगों की इच्छा हो तो बकरों की कुर्बानी कर सकते हैं। किंतु यदि एक भी गाय का वध हुआ तो मैं सदा के लिए आप लोगों से तथा दिल्ली से मुंह फेर लूंगा। यदि मैं आज्ञा दे सकता हूं तो मेरी बात मानिये, नहीं तो कम से कम मेरी प्रार्थना पर अवष्य ध्यान दीजिए।

कुछ ही दिनों से अंग्रेज सैनिकों तथा अपेक्षाकृत निम्नवर्ग की यूरोपियन तथा यूरेशियन जनता द्वारा अधिक मात्रा में गोमांस की खपत होने लगी। पिछला महायुद्ध छिड़ने के समय तक यह पशु वध बराबर बढ़ता ही गया। उस समय युद्ध के लिए बहुत से सिपाही भारत से बुला लिए गये, जिसके परिणामस्वरूप पशुवध में थोड़ी-सी कमी आ गयी। किंतु यह कमी थोड़े ही समय के लिए थी, क्योंकि पशुवध की संख्या फिर बढ़ती पर है। युद्धकाल में कितना गोवध हुआ, यह बताना बहुत ही कठिन है।

आगे चलकर चमड़े का व्यवसाय तथा सूखे मांस के व्यापार के लिए गौओं का वध होने लगा। इन सब कारणों ने मिलकर इस देश में वध होने वाले पशुओं की संख्या में भीषण वृद्धि कर दी।

गोवध के विरुद्ध हिंदूमात्र की प्रबल धार्मिक भावना प्रसिद्ध है। अतः उसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। खेद की बात है कि हिंदुओं की इस धार्मिक भावना तथा विरोध पर कोई धान न दिया जाकर गोवध बराबर जारी है। बड़े नगरों तथा कस्बों में हिंदुओं को प्रतिदिन प्रातःकाल छाती पर पत्थर रखकर बहुसंख्यक गौओं को वधशाला की ओरे ले जायी जाती हुई देखना पड़ता है। गाय से मनुष्य जाति को इतने महान लाभ होते हैं कि उनकी गणना नहीं हो सकती, उन्हें सभी जानते हैं, अतः उन्हें दुहराने की आवश्यकता नहीं है। गाय हमें वह दूध देती है, जो मनुष्य को प्राप्त होने वाले आहारों में सबसे पूर्ण है - यह बात वैज्ञानिक खोजों द्वारा सिद्ध हो चुकी है। ऊपर बतलाया जा चुका है कि दूध मनुष्य के भोजन का एक आवश्यक अंग है। यह दूसरे आहारों की त्रुटियों को पूर्ण कर देता है। दूध के अभाव की पूर्ति करने वाला कोई दूसरा आहार नहीं है। राष्ट्र के शारीरिक विकास के बनाये रखने के लिए तथा राष्ट्र के स्वास्थ की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि धनी-निर्धन सबको पर्याप्त मात्रा में दूध मिले। गाय देश को बैल भी देती है, जो हमारे खेत जोतते और हमारे छकड़े खींचते हैं। भारत की खेती में पशुओं से जो सहायता मिलती है, उसका सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग उनकी शारीरिक सेवा है। भारत में कृषि संबंधी जो शाही कमीशन बैठा था, उसके कथनानुसार बिना बैल के खेती नहीं हो सकती। बिना बैलों के पैदावार एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं पहुंचायी जा सकती। बैलों की रक्षा इसीलिए की जाती है कि वे कृषि के लिए अनिवार्य हैं। यूरोप के देशों में लोग दूध देने वाले पशुओं के वध की बात सहन नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो कानून द्वारा उसे दण्ड दिया जाता है अथवा वह समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। किंतु यहां इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां के सबसे अधिक दूध देने वाले पशु नगरों में भेजे जा रहे हैं और वहां जब उनका दूध कम हो जाता है, तो उनका बड़ी संख्या में वध कर दिया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि उत्तम गायों की संख्या घट रही है। श्रीनीलानंद चटर्जी ने उपर्युक्त बातें कई वर्ष पूर्व लिखी थीं। तब से आज की स्थिति और भी अधिक शोचनीय एवं भयानक हो गयी है।

बम्बई सरकार ने एक ‘पशु विशेषज्ञ समिति’ नियुक्त की थी, जिसने सन् 1939 में अपनी रिपोर्ट लिखी थी। समिति ने लिखा है -

‘समिति का यह मत है कि वर्तमान परिस्थिति में, जिसके कारण दूध के लिए पशु नगरों की सीमा के भीतर रखे जाते हैं, उपयोगी पशुओं के वध को रोकने के लिए कानून बनना आवश्यक है। किंतु समिति इस बात पर जोर देती है कि यदि नगरों की सीमा के बाहर सरकार या म्युनिसिपल्टी आदि के द्वारा दूध की पैदावार के हल्कों की स्थापना का उचित प्रबंध हो जाय, जहां दूध का व्यवसाय करने वाले दूध इकट्ठा कर सकें, दूध देने वाले पशुओं का पालन एवं वृद्धि कर सकें तथा छूटे पशुओं का तब तक पालन कर सकें जब तक कि वे फिर दूध न देने लगें, तो उपयोगी पशुओं के वध की समस्या बहुत कुछ हल्की हो जाएगी तथा यह भी संभव है कि यथासमय यह समस्या रह ही न जाय। दूसरे शब्दों में समिति का यह मत है कि दूध देने वाले उपयोगी पशुओं का वध नगर के भीतर दूध का व्यवसाय चलाने की प्रचलित प्रथा का प्रत्यक्ष परिणाम है। समिति बड़े जोरदार शब्दों में यह बतलाना चाहती है कि दूध देने वाले पशुओं की रक्षा तथा प्रांत में संतोषजनक स्थानीय दुग्ध व्यवसाय की वृद्धि के लिए बरती जाने वाली नीति में सबसे प्रथम और अत्यंत आवश्यक बात यह होनी चाहिए कि प्रचलित प्रणाली में परिवर्तन करके दूध का व्यवसाय क्षेत्र नगर की सीमा से बाहर कर दिया जाए।’

सन 1917 में अखिल भारतवर्षीय गो सम्मेलन संघ कलकत्ता के प्रमुख श्री सर जान वुडरफ की प्रेरणा से कई म्युनिसिपल्टियों ने उपयोगी पशुओं के वध में नियंत्रण लगाने का निश्चय किया था। किंतु सरकार ने उनके प्रस्तावों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि वर्तमान कानून के अनुसार ऐसे प्रस्तावों को कार्यरूप में लाना न्याययुक्त नहीं है।

जब कलकत्ता म्युनिसिपल्टी का बिल धारा सभा के सम्मुख उपस्थित हुआ, तब नीलानंद चटर्जी तथा कुछ अन्य मित्रों ने उस बिल में एक धारा बढ़ाकर इस कानूनी त्रुटी को दूर करने की चेष्टा की। उस धारा के द्वारा कलकत्ते के कारपोरेशन को यह अधिकार दिया गया था कि आवश्यकतानुसार वह उपयोगी पशुओं के वध पर रोक लगा सके। किंतु यूरोपीयन और मुसलमान सदस्यों द्वारा उस प्रस्ताव का समर्थन न होने से वह प्रस्ताव गिर गया। गाय तथा बछड़ों को उनके जीवन के प्रारंभ में ही वध कर देने की बुरी प्रथा बिना किसी रोकथाम के जारी है!

हिंदुओं की धार्मिक भावना को मार्मिक चोट पहुंचाने के साथ-साथ गोवध की प्रथा ने सारे भारतवर्ष तथा इसमें रहने वाली सभी जातियों को अतुल आर्थिक क्षति पहुचायी है। राष्ट्रहित के लिए यह आवश्यक है कि समस्या की गंभीरता का अच्छी प्रकार अनुभव किया जाय तथा दूध देने वाली गाय और उसकी संतान - बैलों एवं सांडों की रक्षा के लिए सरकार या उसके द्वारा नियुक्त अन्य कमेटियों द्वारा आमंत्रित विशेषज्ञों  के बताये हुए उपायो अथवा अन्य उपयुक्त समझे जाने वाले साधनों को काम में लाया जाय। अवश्य ही शांतिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार का कार्य तो प्रचुर मात्रा में बराबर चलता रहना चाहिए। प्रजा के सभी वर्गों के समर्थन से जीवदया संबंधी आवष्यक कानून बन जाय - इसके लिए शांतिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार कार्य प्रचुर मात्रा में निरंतर चालू रखने की आवष्यकता है।

जिन तथ्यों की ओर मैंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है, उनको दृष्टि में रखते हुए मैं निम्नलिखित परामर्श उनके सामने प्रस्तुत करता हूं:

उपाय:

1 सारे देश में खेती एवं गोपालन की सम्मिलित प्रणाली को प्रचलित करने के लिए देशव्यापी प्रयत्न होना चाहिए।

2 प्रत्येक किसान को एक या एक से अधिक गाय अपने घर में रखने तथा गाय और बैलों की नस्ल बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन तथा सहायता दी जानी चाहिए। अधिक जनसंख्या वाले नगरों में लोगों को सामुदायिक प्रयत्न से गोशाला अथवा डेरियां स्थापित करने के लिए उत्साहित करना चाहिए।

3 प्रत्येक जिले में ‘चारा तथा पशु-चारण-समितियों  की स्थापना होनी चाहिए।

4 गांव के पशुओं के चरने के लिए यथेष्ट गोचर भूमि कानूनन अलग छूटी रहनी चाहिए।

5 सूरज सांड किसी की संपत्ति नहीं है - इस विषय में दिए हुए हाई कोर्ट के निर्णयों केा व्यर्थ करने के लिए कानून बनाना चाहिए।

6 काफी बड़े परिणाम में अच्छे सांडों की नस्ल बढ़ाने के कार्य को प्रोत्साहन देना चाहिए।

7 जवान गायों के वध को रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि बूढ़ी गाय, सांड और बैलों के वध को भी रोकने के लिए कानून बनना चाहिए।

8 बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, लाहौर तथा दूसरे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की मांग पूरी करने के लिए नगरों की सीमा के बाहर दूध व्यवसाय के क्षेत्रों की स्थापना होनी चाहिए।

9 पशु चिकित्सा शाला तथा दातव्य औषधालयों का प्रबंध पर्याप्त संख्या में होना चाहिए।

10 अधिक दूध उत्पन्न करो और खूब दूध पियो का आंदोलन सारे देश में चलना चाहिए।

11 अधिक दूध उत्पन्न करने, खपत करने और गोवध को बंद करने की आवश्यकता के विषय में सरकारी महकमों तथा गैरसरकारी संस्थाओं को परस्पर मिलकर शिक्षात्मक प्रचार करना चाहिए।

12 सरकार तथा सार्वजनिक संस्थाओं को चाहिए कि वे वर्तमान या भावी गोशालाओं के उपयोग के लिए निःशुल्क गोचर भूमि प्रदान करें।

यदि ये उपाय काम में लाये गये तो राष्ट्र के स्वास्थ्य तथा भारतीय जनता की आर्थिक उन्नति के लिए एक नया युग उत्पन्न हो जाएगा।

भूदान मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक-क्रांति : एक सिंहावलोकन

नरेन्द्र दुबे

विनोबाजी ने एक बार कहा था गांधी युग की मुख्य देन हैं: सर्वोदय, सत्याग्रह, समन्वय और साम्ययोग। रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ का गांधीजीने भावानुवाद किया था और उसे नाम दिया था - सर्वोदय। उसका नाम तो होना चाहिए था ‘अन्त्योदय’ किंतु उसे गांधीजी ने ‘सर्वोदय’ नाम दिया। इस कृति में तीन तत्वों का उल्लेख है: समाज के हित में ही व्यक्ति का हित है, समाज के लिए किए जाने वाले सभी काम का समान महत्व है, सभी को आजीविका का समान हक है इसलिए उनके पारिश्रमिक में भी समानता होनी चाहिए और किसान, मजदूर का जीवन ही सच्चा जीवन है। इन तत्वों के अनुपालन से ही वे ‘मोहन’ से ‘महात्मा’ बने। दक्षिण अफ्रीका में व्याप्त काले-गोरे के वर्णभेद के अज्ञान के निवारण के लिए ‘सत्याग्रह’ का संशोधन किया। वहां उन्होंने अपने धर्म पर दृढ़ रहते हुए मुसलमान, ईसाई, सिख आदि सभी धर्म वालों को साथ लेकर ‘समन्वय’ की शक्ति भी प्रकट की और वहीं फिनिक्स आश्रम में ‘साम्ययोग’ का प्रयोग किया। इस प्रकार उन्होंने सर्वोदय, सत्याग्रह, समन्वय और साम्ययोग के आयामों से समृद्ध ‘अहिंसक-क्रांति’ का सूत्रपात किया। भारत में स्वतंत्रता संग्राम में इसी ‘अहिंसक-क्राति’ का आरोहण जारी रहा। भारत में अहिंसक-असहयोग, बहिष्कार, सविनय अवज्ञा, करेंगे या मरेंगे और षांतिरक्षा के लिए आमरण-उपवास जैसी इसकी अनेक पद्धतियां विकसित हुई। आजादी के बाद अहिंसक-क्रांति की यही प्रक्रिया निये संदर्भ में भूदानयज्ञ, ग्रामदान और गोरक्षा-सत्याग्रह के रूप में सतत आगे बढ़ रही है।

सत्य-अहिंसा से समाज की समस्या का समाधान

सदियों से माना जाता रहा है कि सत्य, प्रेम, करूणा, अहिंसा आदि आध्यात्मिक तत्वों का व्यक्ति के आंतरिक विकास और उन्नति के लिए महत्व हैं किंतु खेती में, व्यापार में, उद्योग में, राजकाज में सत्य-अहिंसा जैसे तत्वों का पालन करना संभव नहीं है। किंतु गांधीजी ने इन तत्वों का प्रयोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में करने का तरीका निकाला और संसारी जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए भी इनका प्रयोग कर यह सिद्ध कर दिया कि समाज की कठिन से कठिन समस्या का समाधान भी सत्य-अहिंसा जैसे तत्वों के प्रयोग से किया जा सकता है। इतना ही नहीं समाज की नवरचना भी सत्य-अहिंसा की बुनियाद पर की जा सकती है। समाज में ऐसी भी मान्यता रूढ़ रही है कि मानव के विकास में हिंसा, संघर्ष, स्पद्र्धा आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। एक पूरा का पूरा दर्षन ही इस मान्यता पर खड़ा है। लेकिन इतिहास के गंभीर अध्ययन से यह प्रकट हुआ है कि जाने-अनजाने ही क्यों न हो सत्य और अहिंसा के सतत पालन से ही समाज उत्तरोत्तर ऊंचा उठा है।

शब्द-शक्ति के उपासक विनोबा

विनोबाजी शब्द-शक्ति के उपासक थे। वे कहते थे, ‘पुराने शब्दों में नया अर्थ भरना अहिंसक-क्रांति की प्रक्रिया है’। उन्होंने ‘भूदानयज्ञ’ में गीता के तत्वज्ञान - दान, तप और यज्ञ - तीनों का समन्वय तो किया ही है किंतु उसके साथ-साथ इन शब्दों में नये अर्थ भी भरे हैं। ‘दान’ शब्द गिर गया था उसे उन्होंने उठाया और श्रमदान, समय-दान, बुद्धि-दान, सम्पत्ति-दान, साधन-दान के साथ श्री जयप्रकाशजी ने ‘जीवन-दान’ से एक नया शब्द जोडा। इस प्रकार उन्होंने दान-प्रक्रिया से न्यास-व्यवस्था (ट्रस्टीशिप) कायम करने की प्रक्रिया भी समझाई। उन्होंने एक ओर वेद के सूत्र - ‘माता भूमिः पुत्रोहम पृथिव्याः’ अर्थात् भूमि हमारी माता है उसके हम पुत्र हैं इस भावना का प्रसार कर मानसिक धरातल पर ‘उत्पादन-सम्बन्धों’ में परिवर्तन की और स्वामित्व-विसर्जन की नई भूमिका प्रस्तुत की तो साथ ही शंकराचार्य के ‘दानं संविभाग‘ सूत्र का भी सामयिक उपयोग कर दान शब्द का नया अर्थ उद्धाटित किया। ‘सबै भूमि गोपाल की और सब सम्पत्ति रघुपति कै आही के पुराने आध्यात्मिक सूत्र में मालकियत-विसर्जन का क्रांतिकारी तत्व भी दाखिल कर दिया।

भूदान आन्दोलन

हम लोग  भूदानयज्ञ आन्दोलन को ‘आन्दोलन’ कहते थे वे बार-बार समझाते थे कि यह आन्दोलन नहीं ‘आरोहण’ है। ‘आन्दोलन’ शब्द में एक ही स्तर पर हलचल का भाव है जबकि ‘आरोहण’ शब्द में निरंतर ऊपर चढ़ने का भाव हैं। हम लोग नारा लगाते थे ‘भूखी जनता अब न सहेगी, धन और धरती बंट’ के रहेगी। वे उसमें सुधार कर कहते थे, ‘सुखी जनता अब न सहेगी धन और धरती प्रेम से बटेगी।’ इस प्रकार वे हमारे जोष को होष में तब्दील कर देते थे।

सत्याग्रह : जीवन शैली

वस्तुतः सत्याग्रह सम्पूर्ण जीवन-शैली है परंतु विशेष प्रसंग पर अन्याय-निवारण केलिए अहिंसक-प्रतिकार की पद्धति भी है। विश्व ने अभी तक सत्याग्रह को जीवन-शैली के रूप में स्वीकार नहीं किया है। इसे प्रतिकार-पद्धति के रूप में ही ज्यादा मान्यता मिली है। इसलिए आजादी के बाद भारत में वेतन-भत्ते बढ़ाने या अपनी छोटी-मोटी मांगों की पूर्ति के लिए प्रदर्शन, हड़ताल, भूख हड़ताल, धरने आदि को ही ‘सत्याग्रह’ कहा जाने लगा। इस प्रकार हृदय-परिवर्तन और विचार-परिवर्तन के बजाय ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग डराने, धमकाने के लिए होने लगा। इस कारण सत्याग्रह शब्द के सहचारी भाव बदल गए और उसकी पूर्व प्रतिष्ठा को धक्का लगा। जबकि सत्याग्रह का विचार और दर्शन विश्व को गांधीजी की मौलिक और महान देन है। दक्षिण अफ्रीका और भारत में गांधीजी ने जिस प्रकार ‘सत्याग्रह’ के विविध आयाम प्रकट किए वे विश्व इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हैं।

भूदान यज्ञ : सत्याग्रह

यद्यपि विनोबाजी पर यह आक्षेप किया जाता रहा कि उन्होंने गांधी के सत्याग्रह को छोड़ दिया है। जबकि उनका भूदानयज्ञ सही अर्थ में सत्याग्रह था। विनोबाजी ने आंतरिक चर्चा में जब-तब उसका ऐसा उल्लेख किया है किंतु उसे प्रचलित विकृत अर्थ में सत्याग्रह न समझ लिया जाय इसलिए भी सार्वजनिक स्तर पर उसे सत्याग्रह के रूप में प्रचारित नहीं किया। भारत के आजादी के आन्दोलन में ही यह विचार पक्का हो गया था कि जमींदारी, जागीरदारी, राजाशाही जैसी सामंती-व्यवस्था अन्यायपूर्ण है और यह समाप्त होनी ही चाहिए। ऐसा जनमानस भी बन चुका था। सरदार पटेल ने इस मानस का उपयोग कर कुषलता से राजाओं की सहमति से उनके राज्यों को भारत संघ में विलय कराया। देश ने कानून बना कर जमींदारी और जागीरदारी समाप्त की। किंतु भूमि का व्यक्तिगत-स्वामित्व ही अन्यायपूर्ण है ऐसी मान्यता उस समय नहीं बनी थी। इसलिए जमीदार, जागीरदार, मालगुजार भी किसान बन कर भूमि के मालिक बन गए। खेती न करते हुए भी वकील, डाक्टर, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी और उद्योगपति भी जमीन के मालिक बने रहे। खेतों पर काम करने वाला, जोतने वाला खेत-मजदूर, मजदूर ही बना रहा। समाज के ढ़ाचे में ही अंतर्निहित यह ऐसा अन्याय था जिसे सामान्यजन अन्याय ही नहीं मानता था। जबकि जमीन तो प्रकृति की देन है और उस पर रहने वाले और उससे अपनी आजीविका प्राप्त करने वाले प्राणी मात्र का उस पर हक है। यह ऐसा कठिन प्रश्न है जिसका समाधान करना शेष है। विनोबाजी कार्लमाक्र्स को महामुनि कहते थे क्योंकि उन्होंने अपने तथ्यान्वेषण से ‘व्यक्तिगत-स्वामित्व’ को शोषण और विषमता का प्रमुख कारण सिद्ध किया था। महर्षि टाल्स्टाय ने व्यक्तिगत-स्वामित्व की जड़ मानव मन में है इसलिए मानस-परिवर्तन के बिना स्वामित्ववृत्ति का शमन नहीं होगा इस तत्व को रेखांकित किया था। गांधीजी ने व्यक्तिगत-स्वामित्व की वृत्ति से उत्पन्न साम्राज्यवादी-व्यवस्था को सत्याग्रह द्वारा समाप्त करने का प्रयोग सिद्ध किया। जापान में अमेरिकी कब्जे के बाद जनरल मेकार्थर ने कानून बना कर सामंती प्रथा समाप्त की और भूमि हद बन्दी कानून लागू किया। रूस में हिंसक-क्रांति के बाद भूमि की व्यक्तिगत मालकियत समाप्त कर राज्य की मालकियत कायम की। चीन जैसे कृषि-प्रधान और ग्राम-प्रधान देश में माओत्से तुंग को भी जमीन की व्यक्तिगत मालकियत मिटाने के लिए हिंसा का सहारा लेना प़ड़ा, उस व्यवस्था को टिकाए रखने के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबन्धित कर एक दलीय तानाशाही व्यवस्था कायम करनी पड़ी और जिसे आज तक सेना की मदद से कायम रखा जा रहा है। इस एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भूदानयज्ञ और ग्रामदान को देखना चाहिए जिसमें सत्य, प्रेम और करूणा की शक्ति से बेजमीन खेत मजदूरों को जमीन देने और स्वेच्छा से स्वामित्व के विसर्जन का तत्व निहित है। गांधीजी कहते थे, ‘वन स्टेप इज इनफ फॉर मी’ - ‘मेरे लिए एक कदम काफी है’। अहिंसक-क्रांति की देशा में भूदानयज्ञ ऐसा ही एक कदम था।

जयप्रकाश जी और भूदान आन्दोलन

श्री जयप्रकाशजी भारत में समाजवादी विचारधारा के प्रवर्तकों मे से थे। हजारीबाग जेल तोड़कर भागने वाले क्रातिकारी थे। उन्होंने उनके मित्र श्री ब्रह्मदत्त बाजपेयी द्वारा भेजे गए विनोबा के भूदानयज्ञ के साहित्य को पढ़ा और सिताबदियारा में अपनी जमीन का वितरण कर वे उत्तर प्रदेश के बांदा नगर में विनोबाजी से मिलने आए। उन्होंने विनोबाजी से कहा कि ‘वे अपने गांव में साठ बेजमीनों को मालिक बना कर आए है।’ इस पर विनोबा ने हंसते हुए कहा,‘आप मेरा काम कठिन बना कर आए हैं। क्योंकि अभी तो मेरे सामने एक मालिक की ही मालकियत मिटाने का सवाल था। अब तो साठ मालिकों की मालकियत मिटाने का बड़ा सवाल है।’ इस पर जयप्रकाशजी ने कहा था,‘आप महान क्रांतिकारी हैं।’ इसी प्रकार जब श्री जयप्रकाशजी ने सर्वोदय सम्मेलन के अवसर पर अपने जीवनदान की घोषण की तब विनाबाजी ने उनके हाथ में अपने जीवनदान की पर्ची में लिखा, ‘‘भूदानयज्ञ मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक-क्रांति केलिए मेरा जीवन समर्पित है।’’ इस प्रकार विनोबाजी ने भूदानयज्ञ को परिभाषित किया।

क्रांति अहिंसक ही हो सकती है

हिंसा से राज्य-परिवर्तन केलिए क्रांति शब्द का प्रयोग फ्रान्स की राज्यक्रांति के बाद होने लगा। किंतु दुनिया में ‘‘क्राति’’ शब्द को प्रचलित करने का श्रेय साम्यवादी आन्दोलन को है। गांधीजी ने ‘क्राति’ शब्द का उच्चारण नहीं किया। सन् 1942 के भारत-छोड़ो आन्दोलन में तोड़-फोड़ हुई थी संभवतः इसी कारण से उसे लोगों ने ‘42 की क्राति’ कहा। क्योंकि ‘क्रांति’ शब्द के साथ ऐसे ही सहचारी भाव हैं। किंतु विनोबा ने भूदानयज्ञ के साथ विचारपूर्वक ‘अहिंसक-क्रांति’ शब्द को जोड़ा है। इस प्रकार उन्होंने ‘क्रांति’ शब्द को परिभाषित कर उसमें में एक नया अर्थ भरा है। बाद में तो उन्होंने कहा कि क्रांति तो अहिंसा से ही हो सकती है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाने की ‘संक्राति’ से क्राति शब्द को जोड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने हृदय-परिवर्तन, विचार-परिवर्तन और व्यवस्था-परिवर्तन की त्रिसूत्री के साथ समाज के जीवनमूल्यों में परिवर्तन को जोड़ कर ‘अहिंसक-क्रांति’ का समग्र दर्शन प्रस्तुत किया।

कांग्रेस की जगह ‘लोक सेवक संघ’

गांधीजी ने आजादी के बाद कांग्रेस को ‘लोक सेवक संघ’ में रूपांतरित करने का एक विधान अपने हाथ से ही बनाया था। उसमें लिखा था, ‘शहरों और कस्बों से भिन्न उसके सात लाख गांवों की दृष्टि से हिन्दुस्तान की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी हांसिल करना अभी बाकी है। लोकशाही के मकसद की तरफ हिन्दुस्तान की प्रगति के दरमियान सैनिक सत्ता पर नागरिक सत्ता को प्रधानता देने की लड़ाई अनिवार्य है।’ जब विनोबाजी पंचवर्षीय योजना के प्रारूप पर चर्चा के लिए पंडित नेहरू के निमंत्रण पर उनसे मिलने गए तब उन्होंने नेहरूजी का ध्यान गांधीजी की इस अंतिम वसीयत पर आकर्षित किया। इस पर नेहरूजी ने नम्रतापूर्वक कहा कि ‘गांधीजी होते तो यह कर सकते थे। मेरी वैसी हस्ती नहीं है। देश में अनेक शक्तियां काम कर रही हैं। देश की एकता, अखंडता और स्थिरता कायम रखने का बड़ा सवाल है। कांग्रेस देश व्यापी संगठन है। वह नहीं रहेगा तो कठिनाई होगी।’ इस चर्चा के बाद विनोबाजी अपनी भूदान पदयात्रा पर निकल पड़े।

नेहरु जी के लिए जान हाजिर पर वोट नहीं

सन् 1952 में पहले आम चुनाव हुए। उस समय विनोबाजी उत्तर प्रदेश में नेहरूजी के चुनाव क्षेत्र के पास पदयात्रा करके पहुंचे थे। वह पत्रकारों ने उनसे पूछा कि नेहरूजी गांधीजी के राजनैतिक उत्तराधिकारी हैं, आपके मित्र है क्या आप उनके समर्थन में अपील जारी नहीं करेंगे?’  विनोबाजी ने जवाब दिया, ‘पंडित नेहरू के लिए जान हाजिर है, वोट नहीं।’ इससे जाहिर है कि चुनाव और वोट की राजनीति से विनोबाजी किस हद तक असहमत थे।

शासन-मुक्ति, निधि मुक्ति, तंत्र मुक्ति

भूदानयज्ञ आरोहण में अहिंसक-क्राति की प्रक्रिया को तीव्र और व्यापक करने के लिए उन्होंने शासन-मुक्ति, ‘निधि-मुक्ति’ और ‘तंत्र-मुक्ति’ के सूत्र विकसित किए। भूदान के कार्यकर्ताओं केलिए शासन से आर्थिक या अन्य सहायता लेने का तो प्रश्न ही नहीं था। किंतु उसमें ‘शासन-विरोध’ का भी तत्व नहीं था। शासन-मुक्ति का अर्थ है न तो शासन आश्रय और न शासन-विरोध। इसके साथ ही उन्होंने समझाया कि संचित-निधि से और बनी बनाई संस्थाओं से क्रांति नहीं हो सकती। उस समय भूदानयज्ञ के कार्यकर्ताओं को गांधी स्मारक निधि से किंचित मानधन दिया जाता था। भूदान प्राप्ति और वितरण की व्यवस्था के लिए जगह-जगह राज्यों में भूदानयज्ञ समितियां बनाई गई थी। इन भूदान समितियों में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता और सार्वजनिक कार्यकर्ता भी सदस्य और पदाधिकारी थे। 1957 के आमचुनाव का समय था। स्वाभाविक ही उसके पदाधिकारियों के द्वारा भूदानयज्ञ से उत्पन्न नैतिक शक्ति का राजनैतिक उपयोग करने की संभावना भी थी। विनोबाजी ने भूदानयज्ञ समितियों के तंत्र को विसर्जित कर इस संभावना को ही समाप्त कर दिया। दूसरी ओर गांधी निधि आदि के पदाधिकारी पदाधिकारी राजनैतिक नेता भी थे और वे अर्थ-सहायता के बल पर भूदान कार्यकर्ताओं पर प्रशासनिक नियंत्रण भी कर सकते थे उस संभावना को भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार उन्होंने भूदान कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता और अभिक्रम को भी कायम रखा। कार्ल मार्क्स ने कहा था ‘साम्यवादी कार्यकर्ताओं को मानव-सागर में मछली की तरह रहना चाहिए’। विनोबाजी ने इसी तर्ज पर सर्वोदस सेवकों के समक्ष जनाधार का विचार रखा और सर्वोदय कार्यकर्ताओं को जनाधारित जीवन जीने का आह्वान किया। इससे न केवल कार्यकर्ताओं को जनता से मदद मिली वरन् सर्वोदय विचार को भी व्यापक जनसमर्थन भी मिला।

सर्वोदय पात्र

इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए विनोबा ने ‘सर्वोदय-पात्र’ का विचार और कार्यक्रम देश के सामने रखा। वे कहते थे कि सर्वोदय पात्र भिक्षा नहीं, सर्वोदय का पात्र बनने के लिए दीक्षा है और सर्वोदय विचार के लिए लोक-सम्मति का प्रतीक है। विनोबा ने अपने लिए कहा था ‘सर्वोदय-पात्र का विचार देकर वे ऋषि बन गए।’

हिंसा में विश्वास रखने वाले क्रांतिकारी ‘राहतकार्य’ और ‘क्रांतिकार्य’ में विरोध  मान कर राहतकार्य को क्रान्ति का विरोधी मानकर समान्य राहत-कार्य का तत्वतः विरोध करते रहे हैं। किंतु गांधीजी ने खादी जैसे राहत कार्य को आजादी के अहिंसक-क्रातिकारी आन्दोलन से जोड़ा था। इसी परंपरा में विनोबा ने भूदानयज्ञ में इन दोनों का समन्वय किया। भूदान से भूमिहीनों को तत्काल राहत मिलती थी और इसमें स्वामित्व-विसर्जन का क्रांतिकारी तत्व भी था। भूदानयज्ञ ऐसा राहत कार्य था जिसमें क्रांति के बीज छिपे थे।

दुनिया में गुणात्मक परिवर्तन

हिन्दुस्तान की आजादी और चीन की क्रांति ने विश्व-परिस्थिति में गुणात्मक परिवर्तन कर दिया। भारत न केवल आजाद हुआ बल्कि उसने सैंकड़ों सालों की नवाबी, राजाशाही, जमीदारी, जागीरदारी, मालगुजारी जैसी सामंती परंपराओं का परित्याग कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता, धर्म-निरपेक्षता, स्वतंत्र न्यायपालिका जैसे सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों के साथ बहुदलीय संसदीय-लोकतंत्र को अपनाया और शान्तिपूर्ण उपायों से समाजवादी-समाज की रचना का लक्ष्य सामने रखा। उसी समय चीन ने हिसक-क्रांति द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बलिदान देकर सैन्यशक्ति आधारित एक दलीय प्रणाली द्वारा साम्यवादी-समाज बनाने का लक्ष्य सामने रखा है। रूस की हिंसक क्रांति पर गांधीजी ने यह टिप्पणी की थी कि ‘हिसक साधनों से प्राप्त कोई भी उपलब्धि टिकाउ नहीं हो सकती’। दुनिया को हिला देने वाली हिंसक-क्राति के साठ साल में ही सोवियत-संघ छोटे-छोटे राष्ट्रों में विभक्त हो कर बिखर गया है। इसलिए इसमें कोई शक नहीं रहना चाहिए कि यदि समय रहते चीन ने भी अपनी नीतियां नहीं बदली तो उसका हाल भी सोवियत-संघ जैसा ही होगा। आज तो विचारों की दृष्टि से भारत और चीन दोनों पड़ौसी देश वर्तुल के दो सिरों की तरह आमने-सामने खड़े हैं।

विवेकशील लोग हिंसा पर प्रतिबन्ध लगाएं

अमेरिका द्वारा हीरोशिमा और नगासाकी पर गिराए गए अणुबम ने हिंसा की पराकाष्ठा का भान लोगों को करा दिया है। हिंसा-शक्ति का ऐसा विकास सैंकड़ों, हजारों वर्षों की ‘साधना’ और ‘तपस्या’ का ही फल है। दुनिया भर के अनेक बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और वैज्ञानिकों ने संहारक शस्त्रों के संशोधन में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है और आज भी विश्वभर की अनेक संस्थाएं, संगठन और सरकारें की शस्त्र-शक्ति के विकास में लगी है। इसके परिणामस्वरूप आज सामान्य मनुष्य के हाथ में प्रलय करने की ‘ईश्वरीय-शक्ति’ आ गई है। यदि अमेरिका, रूस, चीन, पाकिस्तान या भारत जैसे अणुआयुध सम्पन्न देश के किसी राजनेता का दीमाग खराब हो जाए या ओसामा बिन लादेन जैसे आतंककारी के हाथ में ये विनाशकारी हथियार पहुंच जाएं और वह इन आयुधों का इस्तेमाल करे तो कुल दुनिया का विनाश हो सकता है। इसलिए दुनिया भर के विवेकशील लोगों को इस बात का तेजी से अहसास हो रहा है कि हिंसा-शक्ति पर प्रभावी अुंकुश लगाने की जरूरत है। इसके लिए अणुआयुधों पर बन्दिश लगाने केलिए पारस्परिक संधियां करने पर जोर दिया जा रहा है। किंतु ऐसे तात्कालिक प्रयत्नों से सामाजिक ढांचे में अंतर्निहित हिंसा का शमन नहीं हो सकता। इसके लिए जीवन शैली में और जीवन मूल्यों में ही परिवर्तन करने की जरूर है। यदि दुनिया में शोशणमुक्त, वर्गविहीन और शासनमुक्त समाज की रचना करनी हो, पारस्परिक प्रेम और सद्भाव का विकास करना हो तो वह ‘अहिंसक-लोकशक्ति’ से ही किया जा सकता है। इसलिए ऐसी अहिंसक-लोकशक्ति खड़ी करना हमारे जमाने की मांग है। अहिंसक-लोकशक्ति से ही ‘अहिंसक-समाज’ की रचना की जा सकती है।

भारत दुनिया की तीसरी शक्ति

गांधीजी के जमाने में राजनैतिक गुलामी एक वैश्विक समस्या थी। दुनिया के अधिकांश राष्ट्र साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की गुलामी में फंस गए थे। भारत की आजादी के आन्दोलन से उन्हें प्रेरणा मिली और भारत के आजाद होते ही एक-एक कर दुनिया के सारे देश राजनैतिक गुलामी से मुक्त हो गए। किंतु दुनिया दो ध्रुवों में विभाजित थी। एक था अमेरिका-केन्द्रित और दूसरा था रूस-केन्द्रित। दुनिया के लगभग सभी देश इन दो ध्रुवों मे विभाजित थे जिनके बीच ’शीतयुद्ध’ चल रहा था। दोनों ध्रुव शस्त्र-सज्जित थे। इनके कारण हिंसा का शक्ति-संतुलन बना था। किंतु भारत की आजादी और उसकी सक्रिय तटस्थता और गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण दुनिया मे ‘तीसरी-शक्ति’ का उदय हुआ। सैनिक गुटों से अलग रह कर विश्व शान्ति केलिए भारत ने दुनिया में तीसरी शक्ति - नैतिक-शक्ति - खड़ी करने का प्रयास प्रारंभ किया। विश्व राजनीति को यह पंडित नेहरू की देन थी। इसके कारण ही स्वेज-संकट टला, वियेतनाम और कोरिया में युद्ध बन्द हुआ और रूस तथा पष्चिमी देश नजदीक आए। विनोबा ने भारत में हिसा-शक्ति की विरोधी और दण्ड-शक्ति से भिन्न अहिंसक-लोकशक्ति को ‘तीसरी-शक्ति’ के रूप में खड़ा करने का प्रयास किया। राजनैतिक क्षेत्र में गुट-निरपेक्षता की, तटस्थता की नीति का कुछ अनुभव उस समय दुनिया को हुआ। सर्वोदय की अहिंसक-शक्ति का किंचित अनुभव भी भारत सहित कुल दुनिया को हुआ था। किंतु गांधीजी के शब्दों ‘सैनिक-सत्ता पर नागरिक-सत्ता कायम करने’ का महान कार्य करना अभी बाकी है।

यद्यपि मानव समाज शनैः-शनैः हिंसा से अहिंसा की ओर बढ़ रहा है। किंतु उस ओर बढ़ने की उसकी गति अत्यंत धीमी है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से इस मंथर गति को तीव्र किया जा सकता है। विनोबाजी द्वारा प्रवर्तित भूदानयज्ञ को इस दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए। (संपादक : डॉ.पुष्पेन्द्र दुबे) 

Author: जयदयाल गोयन्दका Published On: 2017-02-21 01:19:09

गोरक्षा की आवश्यकता

जयदयाल गोयन्दका

वे दिन अब चले गये। हिंदू जाति आज निर्बल हो गयी है। हम अपनी स्वतंतत्रा अपना पुरुषत्व, अपनी धर्मप्राणता, ईष्वर और ईष्वरीय कानून में विष्वा, शास्त्रों के प्रति आदर बुद्धि, विचार स्वातंत्र्य, अपनी संस्कृति एवं मर्यादा के प्रति आस्था - सब कुछ खो बैठे हैं। आज हम आपसी फू2 एवं कलह के कारण छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। हम अपनी संस्कृति एवं धर्म पर किए गए प्रहारों एवं आक्रमणों को व्यर्थ करने के लिए संगठित नही हो सकते। हम अपनी जीवनी शक्ति को खो बैठे हैं। मूक पशुओं की भांति दूसरों के द्वारा हांके जा रहे हैं। राजनीतिक गुलामी ही नहीं, अपितु मानसिक गुलामी के भी शिकार हो रहे हैं। आज हम सभी बातों पर पाष्चात्य दृष्टिकोण से ही विचार करने लगे हैं। यही कारण है कि हमारी इस पवित्र भूमि में प्रतिवर्ष लाखों की संख्यार में गाय और बैल काटे जाते हैं औश्र हम इसके विरोध में उंगली तक नहीं उठाते। आज हम दिलीप और अर्जुन का केवल इतिहास पढ़ते हैं और सुनते हैं, उनसे हमारी नसों में जोश नहीं भरता।

दूसरी जातियां अपने गोधन की वृद्धि में बड़ी तेजी से अग्रसर हो रही हैं। दूसरे देशों में क्षेत्रफल के हिसाब से गौओं की संख्या भारत की अपेक्षा कहीं अधिक है और प्रति मनुष्य दूध की खपत भी अधिक है। वहां की गौएं हमारी गौओं की अपेक्षा दूध भी अधिक देती हैं। कारण यही है कि वे गौओं को भरपेट भोजन देते हैं, अधिक आराम से रखते हैं, उनकी अधिक संभाल करते हैं और उनके साथ अधिक प्रेम और कोमलता का बर्ताव करते हैं। अन्य देषों में गोचरभूमियों का अनुपात भी खेती के उपयोग में आने वाली भूमि की तुलना में कहीं अधिक है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हम अपने को गोपूजक और गोरक्षक कहते हैं, वस्तुतः आज हम गोरक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। गोजाति के प्रति हमारे इस अनादर एवं उपेक्षा का परिणाम भी प्रत्यक्ष ही है। अन्य देषों की अपेक्षा हम भारतीयों की औसमत आयु बहुत कम है और अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां के बच्चे बहुत अधिक संख्या में मरते हैं। यही नहीं, अन्य लोगों की अपेक्षा हम लोगों में जीवट भी बहुत कम हैं। कहना न होगा कि दूध और दूध से बने हुए पदार्थों की कमी ही हमारी इस शोचनीय अवस्था का मुख्य हेतु है। इससे यह बात प्रत्यक्ष हो जाती है कि किसी जाति के स्वास्थ्य एवं आयु मान के साथ गोधन का कितना घनिष्ठ संबंध है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देष में आर्थिक दृष्टि से भी गाय का महत्व स्पष्ट ही है। जिन लोगों ने हमारे ग्रामीण जीवन का विशेष मनोयोगपूर्वक अध्ययन किया है, उन सबने एक स्वर से हमारे जीवन के लिए गौ की परमावष्यकता बतायी है। गोधन ही हमारा प्रधान बल है। गोधन की उपेक्षा करके हम जीवित नहीं रह सकते। अतः हमारे गोवंष का संख्या एवं गुणों की दृष्टि से जो भयानक ह्रास हो रहा है,  उसका बहुत शीघ्र प्रतीकार करना चाहिए और हमारी गौओं की दशा सुधारने, उनकी नस्ल की उन्नति करने और उनका दूध बढ़ाने तथा इस प्रकार देश के दुग्धोत्पादन में वृद्धि करने का भी पूरा प्रयत्न करना चाहिए। गायों, बछड़ों एवं बैलों का वध रोकने तथा उन पर किए जाने वाले अत्याचारों को बंद करने के लिए कानून बनाने होंगे और विधर्मियों को भी गौ की परमोपयोगिता बतलाकर गोजाति के प्रति उनकी सहानुभूति एवं सद्भाव का अर्जन करना चाहिए। जिस देष में कभी दूध और दही की एक प्रकार से नदी बहती थी, उस देष में असली दूध मिलने में कठिनाई हो रही है। यह कैसी विडम्बना है!

 

 

 

<p style="\\\\&quot;text-align:" justify;\\\\"=""> आध्यात्मिक दृष्टि से भी गाय का महत्व कम नहीं है। गाय के दर्शन एवं स्पर्श से पवित्रता आती है, पापों का नाश होता है, गाय के शरीर में तैंतीस करोड़ देवताओं का निवास माना गया है। गाय के खुरों से उड़ने वाली धूलि भी पवित्र मानी गयी है। महाभारत में महिर्ष च्यवन राजा नहुष से कहते हैं, ‘‘मैं इस संसार में गौओं के समान दूसरा कोई धन नहीं समझता। गौओं के नाम और गुणों का कीर्तन करना-सुनना, गौओं का दान देना और उनका दर्शन करना - इनकी शास्त्रों में बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य संपूर्ण पापों को दूर करके परम कल्याण देने वाले हैं। गौएं लक्ष्मी की जड़ हैं, उनमें पाप का लेष भी नहीं है। गौएं ही मनुष्य को अन्न और देवताओं को हविष्य देने वाली हैं। स्वाहा और वषट्कार सदा गौओं में ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएं ही यज्ञ का संचालन करने वाली और उसका मुख हैं। ये विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का आधार होती हैं। और सारा संसार उनके सामने मस्तक झुकाता है। इस पृथ्वी पर गौएं अपने तेज और शरीर में अग्नि के समान हैं। वे महान तेज की राशि और समस्त प्राणियों को सुख देने वाली है। गौओं का समुदाय जहां निर्भयतापूर्वक बैठकर सांस लेता है, उस स्थान की श्री बढ़ जाती है और वहां का सारा पाप नष्ट हो जाता है। गौएं स्वर्ग की सीढ़ी है, वे स्वर्ग में भी पूजी जाती हैं। गौएं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियां हैं, उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। राजन्! यह मैंने गौ का माहात्म्य बतलाया है, इसमें उनके गुणों के एक अंश का दिग्दर्शन कराया है। गौओं के संपूर्ण गुणों का वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता। (कल्याण से साभार)

Author: vinoba bhave Published On: 2017-02-20 02:25:51

बाजार मुक्ति जरूरी

विनोबा

हम चाहते हैं कि आपके गांव में गन्ना होता है, तो गुड़ भी वहीं बने। कपास होती है, तो कपड़ा भी गांव में बने। गांव में मिट्टी है, तो मिट्टी के बर्तन, घड़े आदि गांव में ही बनें। गांव-गांव स्वावलंबी हों। ऐसे स्वावलंबी आजाद गांवों का आजाद देश मजबूत होगा।

मैं कहना चाहता हूं कि आप लोग बाजार के सामने टिक नहीं सकेंगे। उसे आप अपने हाथ में तभी रख सकते हैं, जबकि ग्रामस्वराज्य हो, और वह ग्रामस्वराज्य भी ग्रामदान की बुनियाद पर ही होगा। जब तक आप ग्रामदान नहीं करते, तब तक आप शहर के गुलाम ही रहेंगे।

गांव को जितना कपड़ा चाहिए, उसके हिसाब से कपास बोयेंगे औश्र अपना कपड़ा बनायेंगे, तो कपास और कपड़े के बाजार से मुक्त हो जाएंगे। गांव में दो साल का अनाज हो। गांव के लिए तेल, गुड़ भी बनाएंगे। पैसा कम-से-कम चाहिए। उसके लिए जो ज्यादा पैदावार होगी, उसे बेचेंगे। लेकिन यह समझ लें कि जितना ज्यादा पैसा चाहेंगे, उतनी गुलामी ज्यादा होगी।

एक तो हम पर आसमानी असर छाया हुआ है, दूसरा यह सुलतानी बाजार-भाव का भी असर है। बारिश न हुई, कपास की फसल अच्छी न हुई, तो किसानों को नुकसान है, अगर बारिश हुई और कपास की फसल अच्छी हुई, लेकिन दाम गिर गए तो भी उन्हें नुकसान है। इस तरह आज हमारा किसान अत्यंत पंगु बन गया है। इन दोनों सत्ताओं से उसे बचाना है। आसमानी सत्ता से बचाने के लिए तीन उपाय हैं। पहला, पानी का इंतजाम हमें करना होगा। इस साल पानी हुआ और हमारी खेती बरबाद हुई, ऐसा नहीं होना चाहिए। दूसरा उपाय है, अपने गांव में दो साल का अनाज रखना। अगले साल अच्छी फसल होने के बाद ही हम पुराना बेचें। इस साल का धान इसी साल खत्म हो, ऐसा नहीं होना चाहिए। और तीसरा उपाय है, हमारे व्यवहार में भलाई होना। अगर हम भलाई का बर्ताव करते हैं, तो परमेष्वर भी समयपर ठीक बारिष करेगा। अगर हम पाप करते हैं, तो बारिष भी हम पर प्रहार करती है। इस तरह न्याय, नीति, प्रेम और धर्म पर चलना तीसरा उपाय है। ये तीन बातें हम करेंगे, तो आसमान-सुलतानी से बच जायेंगे।

बाजार के दामों की सुलतानी से बचने का उपाय है ग्राम-स्वावलंबन। मैं आपको एक मिसाल देता हूं। 1920 में हमने खद्दर पहनना शुरू किया। तब से हमने कपड़ा खरीदा नहीं, यानी खद्दर भी हमने खरीदी नहीं। आश्रम में हमने खेतों में कपास बोयी, हमने ही काता और हमने ही बुना। अपना कपड़ा हमने ही इस्तेमाल किया। इसलिए कपड़े पर हमें एक कौड़ी का भी खर्चा नहीं करना पड़ा। हमारा ही खेत था और हमारा ही श्रम। कपास बोने के लिए भी पहले साल के जो बिनौले होते, उन्हीं का इस्तेमाल करते। इसलिए बाजार में कपड़े का दाम इतने सालों में कितना चढ़ा और कितना गिरा, वह हमें मालूम नहीं। महायुद्ध के समय कपड़े का दाम किधर से किधर चला गया। बीच में कंट्रोल का जमाना भी आया। उस क्ता लोगों को बड़ी मुष्किल से कपड़ा मिलता था। किंतु हमें कोई कष्ट नहीं हुआ। हमको बाजार के दाम का पता ही नहीं रहता था। सारांष, इस तरह गांव-गांव के लोग अपनी मुख्य-मुख्य आवश्यकताओं के  बारे में मिल-जुलकर स्वावलंबन करेंगे, तो बाजार के दामों से बचेंगे। फिर भी बिल्कुल ही बचेंगे, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि केरोसीन जैसी चीज गांव में बनाना मुष्किल होगा। हम अपने गांव के प्रकाष की योजना बिल्कुल ही नहीं बना सकते, ऐसी बात नहीं। गोबर-गैस-प्लांट की योजना कार्यान्वित कर प्रकाष तैयार किया जा सकता है। यह हम सब कर सकते हैं और करना भी चाहिए, पर वह एकदम नहीं होगा। कुछ चीजें बाहर से खरीदनी ही होंगी। भले ही वे महंगी पड़ें। उन चीजों के बारे में हमें तकलीफ होगी। फिर भी रोजमर्रा की मुख्य-मुख्य आवश्यकताओं के बारे में स्वावलंबी बनेंगे, तो हम बाजार-भाव की सुलतानी से बहुत कुछ बच जाएंगे।

विनोबा साहित्य (खण्ड 18)

Author: डॉ.मो.या.मंगरूलकर Published On: 2017-02-19 04:51:11

श्वेत क्रांति पर प्रश्नचिह्न

गोविभा पत्रिका से

नवम्बर 2011

(मध्यप्रदेश पशुपालन विभाग के भूतपूर्व संचालक डॉ.मो.या.मंगरूलकर ने गोवंश को विनाश से बचाइये! पुस्तक लिखी। जिसका प्रकाशन अ.भा.कृषि गोसेवा संघ ने किया। पुस्तक के संपादित अंश यहां दिए जा रहे हैं।)

पहले ऑपरेशन फ्लड एक और अब ऑपरेशन फ्लड दो। सीधे-भोले ग्रामीणों और शहरियों के लिए दूध की नदियों में बाढ़। चमत्कार जैसा लगता है जबकि देश में पिछले 25-30 वर्षों में दूध मिलना ही दुर्लभ होता जा रहा है। शहरों में तो उसका भाव 5 से 7 रुपये (अब 42 से 50 रुपये) लीटर तक हो गया है। इस कारण बेचारा समीपवर्ती ग्रामीण अपने घर का सारा का सारा दूध, अपने नन्हें-मुन्नों को भी न देकर शहरों में बेच देता है या इसी हेतु बनाई गई सहकारी संस्थाओं के हवाले सस्ती कीमत पर बेच देता है। इन संस्थाओं का जन्म इसी उद्देष्य से हुआ है कि ग्राम-ग्राम से दूध एकत्र कर शहर की दिशा में भेजा जा सके। कुछ वर्षों पूर्व जब सड़कें और आवागमन के साधन सुलभ नहीं थे, ग्रामवासी अपना दूध बेच नहीं पाता था, परंतु दही, खोया, मक्खन और घी शहरों तक पहुंचाकर पैसा कमाता था। गांव से कौन सी दुग्धजन्य वस्तु कहां बेची जाएगी यह पहले-पहले गांव से बिक्री स्थान की दूरी पर और माल ले जाने के साधन वाहन इत्यादि पर निर्भर रहता था। धीरे-धीरे व्यापारी वर्ग इस काम में घुसा और स्वार्थ हेतु किसी न किसी गरज की पूर्ति के लिए कर्ज देकर उससे घी, खोया, मक्खन इत्यादि मनचाहे भाव से वसूलने लगा। यह माल शहरों के बाजारों में स्वनिर्मित भाव से बेचकर उसने अपनी धाक जमाई। उन दिनों ग्रामीणों को दूध-दही नहीं तो कुछ मठा तो अवष्य ही उपलब्ध हो जाता था जो स्वास्थ्य बनाये रखता था। जैसे-जैसे शहरों के आसपास के गांवों से सड़कें जुड़ गईं और वाहन व्यवस्था हो गई, शहरी जनता ही समीपवर्ती गांवों से अधिक मात्रा में दूध मिलने लग गया और देहातियों का स्वास्थ्य गिरने लगा। खोया घी इत्यादि का आयात अब दूर गांवों से होने लगा जहां छोटा-बड़ा मझोलिया व्यापारी अभी भी कर्जा देकर अपना एकाधिकार जमाये हुए है।

हरित क्रांति के बाद श्वेत क्रांति का दावा

पिछले दशक में श्वेत क्रांति बड़ी धूमधाम से आई, नारे लगे, और जनता के मन में हरित क्रांति से भी अधिक आशा जागी कि अब देश में दूध की विपुलता होगी। आशावादी लोगों की दृष्टि यह चमत्कार देखने को आतुर अधिक थी, समझने को कम। जैसे-जैसे श्वेत क्रांति का स्वप्न (?) खिलता गया, उसका रहस्य चर्चा का विषय बन गया। भारत में ही नहीं, सारे विश्व में। पहले भारत की ही बात करें।

कुछ दशकों से क्या विदेश के लोग और क्या भारतवासी शिक्षित और वैज्ञानिक, यह बात कहते नहीं थकते कि भारत में पूरे विश्व का एक तिहाई या एक चौथाई गोवंश होते हुए भी दूध का उत्पादन इतना कम है कि प्रतिदिन प्रति मनुष्य केवल कुछ चम्मच (अब 245 ग्राम) ही नसीब होता है और फलस्वरूप् यहां कि आबादी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इस दावे की सच्चाई मानने वालों के अनुसार यही एक मार्ग बचा है कि यहां के गोवंश की छंटाई की जाए और विदेशों से दूध, दूध-चूर्ण और डेयरी मशीनरी की तुरंत सहायता ली जाए और भारतीय गायों को देशी सांडों से फलाने की बजाय विदेशी दुधारू नस्ल के सांडों से संकरित किया जाए (इसके लिए देशी सांडों को बधिया करना अनिवार्य हो जाता है) जिससे संकरित बछिया से अधिक दूध उत्पादन हो सके।

हमारे नेताओं ने, वरिष्ठ अधिकारियों ने और चोटी के वैज्ञानिकों ने इस विचारधारा और गोवंश के संकरीकरण की आवश्यकता के अनुकूल अपनी मनःस्थिति को पूर्णतया बदलने में दूरदर्शिता से काम है ऐसा नहीं लगता। अपना इतिहास बताता है कि भारत में दुधारू नस्ल भी थीं, जिनसे प्रचुर मात्रा में दूध हुआ करता था। यदि आजकल के बड़े बड़े शहरों और कस्बों को छोड़ दिया जाए तो अभी भी ऐसे लोग जीवित हैं जो बतलायेंगे कि उन्होंने रुपये का बीस सेर दूध औश्र आठ-नौ आने सेर घी खाया है। आज भी 35 किलो दूध देने वाली देषी गायें मौजूद हैं, और तीस-चालीस बरस से अभी तक कलकत्ते में छैना-रसगुल्ला के उत्पादन पर हरियाणा गायों का एकाधिकार रहा है।

दोषी कौन ?

आज ऐसी गिरी हालत क्यों है इसका उत्तरदायित्व गोवंश पर नहीं, बल्कि उनकी तरफ असीम दुर्लक्ष करने वाले, उन्हें अधोगति तक पहुंचाने वाले, उन्हें बेकाम, अनार्थिक और भारतम करने वाले पढ़े लिखे सत्ताधारियों पर है। मान भी लिया जाय कि कुछ सदियों के मुगल शासन में कुछ हद तक और तदुपरांत अंग्रेजी राज में, गोवंष की अवनति होती रही, तिस पर भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि समय समय पर मुगल बादशाहों ने ऐसे फरमान जारी किए थे कि जिनसे अच्छी नस्ल का गोवंश सुयोग्य रीति से पाला जाय और अच्छी दुधारू गायें और खेती और भारवहन के लिए मजबूत बैल पैदा होते जायें (गुजरात की गायें 60 सेर दूध देती हैं ऐसा उल्लेख मुगल जमाने के एक प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा बताते हैं)। अंग्रेजी शासन के अंतिम वर्षों में अपने दीर्घकालीन शासन में विदेषी नस्ल का गोवंष (नर-मादा दोनों का भारत में आयात कर पछताते हुए उन्होंने यह स्पष्ट रूप से सलाह दी थी गोवंश भारत के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है, उसका ही संवर्धन इस तरीके से हो जिससे ग्राम-ग्राम में आवश्यकतानुसार दुग्ध उत्पादन हो और खेती योग्य बैल मिलें। याने ऐसे द्विप्रयोजन नस्ल का ही उपयोग हो विदेशी नस्लों की अनुपयोगिता से अंग्रेजों ने सबक सीख लिया था और कहा था कि केवल पहाड़ी और अतिवृष्टि वाले इलाकों के लिए ही, जहां कोई अच्छी भारतीय नस्ल अस्तित्व में नहीं है विदेशी नस्लों का प्रयोग किया जाये यदि खिलाई, रख-रखाव और प्रतिबंध व उपचार की सुविधाएं संतोषजनक हों। उस समय के भारतीय अधिकारी और वैज्ञानिक इस सुझाव से सहमत थे।

आज की हालत में आदमी छोटे बड़े कस्बों और शहरों की ओर खिंचा जा रहा है। जब गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं, दूध और अन्नोत्पादन की समस्या उठ खड़ी हुई है। गोवंष के माध्यम से इन दोनों में जो संबंध था वह टूट गया है। अब दूध के लिए केवल गाय की बात सोची जाती है और खेती के लिए ट्रैक्टर और रासायनिक खाद की। यह हम भूल गये कि आज भी हमारा 80 प्रतिशत गरीब किसान औसतन दो-तीन एकड़ की खेती और खाद के लिए गोवंश पर निर्भर है, हमारे खाद्यान्न का उत्पादक है और हमें भुखमरी से बचाता है।

गांव से शहरी की ओर दौड़

सड़कें, यातायात, बिजली, यंत्रीकरण, सिनेमा, रेडियो ऐसे प्रलोभन हैं जिनके कारण देहाती अधिकाधिक संख्या में शहरों की आबादी बढ़ाता जा रहा है। शहरों की आबादी के लिए दूध कहां से आये जब दूध उत्पादक स्वतः अपनी गायों को लापरवाही से त्याग कर शहर में बस गया है और दूध की मांग कर रहा है ? देष को विकसित करने के लिए हमारे नेताओं ने निर्णय ले लिया है कि पाश्चात्य देशों के पदचिन्हों का सहारा लिया जाय, उनका अनुकरण किया जाय। भारतीय गोवंश इस कारण पिछड़ता ही गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उसके प्रति इतनी षिथिलता बरती गई कि प्रारंभ में जो प्रगति हुई थी वह आगे बढ़ने के बजाय किन्हीं राजनैतिक कारणों से रुक गई। यदि गाय का दूध घटा, या वह निकम्मी और भारतम हो गई, उसमें गाय का क्या दोष ?

मालवी गोविज्ञान संशोधन एवं प्रशिक्षण विद्यालय

(मुम्बई गोरक्षक ट्रस्ट एवं गोविज्ञान भारती के सहयोग से संचालित)

डी – 37 सुदामा नगर, इंदौर, मध्यप्रदेश, भारत

Web site : www.govigyan.org, www.cowlogy.com, www.shabdbraham.com

फोन : +9754220781, 0731-2489475

गोविज्ञान प्रशिक्षण पाठ्यक्रम

(विद्यालय का सत्र छः माह का है।)

पाठ्यक्रम रचनाकार : श्री नरेन्द्र दुबे

इकाई:

1. भारत में गो-संस्कृति एवं गोविज्ञान का विकास

2. गोसेवा - गांधीजी की विचारधारा

3. गो-उपासना - विनोबाजी के विचार

4. गोरक्षा आन्दोलन और गोरक्षा सत्याग्रह

5. ग्रामस्वराज्य और गो-केन्द्रित ग्राम विकास

इकाई 2.

1 नस्ल सुधार क्यों ?

2. भारत की गो-नस्ल

3. मध्यप्रदेश की गो-नस्ले। मालवी, निमाड़ी आदि

4. विदेशी नस्ले। होल्स्टीन, स्विस, फ्रीजीयन, जर्सी आदि

5. नस्ल सुधार कैसे ? चयन पद्धति और कृत्रिम गर्भाधान

6. ऋतुमति गाय के लक्षण और बांझ पन

इकाई 3

1 पशुओं की सामान्य बीमारियां - कब्ज, अपच, अफरा, दस्त, खांसी, बुखार, खुजली, सूजन, दर्द, आंख में सफेदी आना, नकसीर तथा तीड़ फूटना।

2 . विषाणु (वायरस)जनित रोग। जैसे माता महामारी, खुर-पका, मुंह-पका, रेबीज

3. रोगाणु (बेक्टीरिया)जनित रोग। जैसे गलघोंटू, एक टंगिया, एन्थ्रेक्स

4. रक्त परजीवी (ब्लड प्रोटोजोआ) जनित रोग। जैसे थाईलेरिया, बेबिसिओसिस, ट्रिपेनोसोमिओसिस

5. परजीवी (कृमि) जनित रोग - चपटे कृमि, फीता कृमि, गोल कृमि

इकाई 4

1. पशुओं के शरीर पर रहने वाले परजीवियों का नियंत्रण

2. घावों की मरहमपट्टी एवं सामान्य औषधियां

3. हड्डी टूटने पर प्राथमिक चिकित्सा

4. आकस्मिक स्थिति में प्राथमिक उपचार।

सर्पदंश, चरी का जहर, घांस का कीड़ा खा जाने पर, यूरिया विष, आग से झुलसना

5. टीकाकरण कार्यक्रम

इकाई 5

1. प्रसव एवं प्रसवकालीन बीमारियां

2. सामान्य प्रसव एवं असामान्य प्रसव

3. गर्भाशय का प्रदाह (सूजन)

4. आंवल अवरोध एवं बच्चेदानी का बाहर निकलना

5. बच्चेदानी में पीप पड़ना

6. गर्भपात

7. दुग्ध ज्वर

8. किटोसिस

9. थनैला रोग

ईकाई  6

2. बछड़े-बछडि़यों का पालन पोषण 
3. पशुओं का वजन ज्ञात करने का तरीका

5. पशु आहार में खनिज लवण और उनका महत्व

7. हरे चारे की खेती के सम्बन्ध में जानकारी

<span style="\\&quot;color:" rgb(0,="" 128,="" 0);\\"="">8. पशु आवास

इकाई 7

1. क्रय करते समय पशुओं का चयन

2. पशु लाने ले जाने के लिए रस्सी का हाल्टर

3. प्राथमिक चिकित्सा का बक्सा तैयार करना

4. पशुओं का सामान्य तापमान, नाड़ी एवं श्वास की गति

5. गाय, भैंस आदि विभिन्न पशुओं के दुग्ध के तत्व

6. पुआल तथा भूसे का यूरिया से उपचार

इकाई  8

1. बैल परिवहन, उन्नत बैल गाड़ी की रचना और क्षमता

2. पशु चालित कृषि उपकरण, हल, बक्खर, डोरा, बीज  पेरणी यंत्र, निंदाई उपकरण आदि की जानकारी

3. कम्पोस्ट, नाडेप कम्पोस्ट, माध्यम-कल्चर आदि

4. गोबर गैस संयंत्र: दीनबन्धु माडल, केवीआईसी माडल, चीनी माडल, गुजरात की गोबर बैंक योजना और सामुदायिक गैस संयंत्र।

5. विभिन्न गोमूत्र और पंचगव्य औषधियों का निर्माण

6. बैल उर्जा से चलने वाले आधुनिक उपकरण जैसे बैटरी चार्जिंग, आटा पिसाई, सिंचाई पंप आदि

7. फेट निकालने का यंत्र और दूध में मिलावट जांचने के तरीके

नोट:

1. उक्त इकाईयों के बौद्धिक वर्ग के साथ ही प्रायोगिक भी होंगे

2. प्रति माह मौखिक और लिखित परीक्षा होगी : मासिक परीक्षा के प्राप्तांक

सत्रांत की परीक्षा के प्राप्ताकों में जोड़ कर ग्रेड दी जायगी।

पाठ्य पुस्तकें:

1. गो सेवा : अहिल्यामाता गौशाला इन्दौर द्वारा प्रकाशित

2. गोसेवा: गो-उपासना - गोविज्ञान भारती, मुम्बई द्वारा प्रकशित

संदर्भ ग्रन्थ:

3. गोपालन -  बनवारीलाल चौधरी

4. भारत में गाय - : डॉ.. सतीशचन्द्र दासगुप्ता

पत्रिकाएं:

गोविभा मासिक,  प्रकाशक - गोविज्ञान भारती, मुम्बई

गोग्रास मासिक प्रकाशक - कृषि गोसेवा संघ, गोपुरी, वर्धा

Author: Junagadh Agricultural University-Gujarat-India Published On: 2016-04-27 10:27:26

Useful Gir Cow Urine analysis to cure very serious disease

Panchagavya and Cow Urine of Gir breed here at Junagadh with Special department of Analysis and Testing By Department of Biotechnology- Junagadh Agricultural University-Gujarat-India. They come to a conclusion with very important useful information with modern science and Laboratory tests that authentic and well mentioned GIR Cow (with natural grassing habits from open ground) produces very important elements such as Gold, Silver, Calcium, Iron, Cobalt, Zinc and Boron in a very noticeable amount which are naturally helpful to recover very serious dieses like cancer (Blood, bone, laugh, almost all type of cancer), Hypertension, Asthma, Renal and Peripheral Circulatory disturbances.

Gir Cow Urine Analysis by Chromatography Mass Spectrometry

Gir Cow Urine Analysis by Chromatography Mass Spectrometry

As results they found Elemental Composition of Cow Urine by ICP-MS

Element

Silver

Iron

Zinc

 

(Ag)

(Fe)

(Zn)

Content

 

 


(ppb)

 

 

1.71

700.11

50.32

 

 

Therapeutic/Medicinal Property

A Potent anti-microbial agent

Antioxidant

Anti-Fungal, Topical Antiseptics and Inhalant decogestants.

Treatment of Hyper-Ammonemia

Anticonvulsants & Treatment of seizure disorders

An intermediate in synthesis of UV stabilizers or antioxidants

Hypertension, Asthma, Renal and Peripheral Circulatory disturbances

Intermediate for a hypnotic and anticonvulsant

Junagadh Agricultural University-Gujarat-India

http://www.blog.gomataseva.org/gir-cow-urine-analysis-cure-serious-disease