भूदान मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक-क्रांति : एक सिंहावलोकन

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Published On : 2017-04-03 21:42:44

भूदान मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक-क्रांति : एक सिंहावलोकन

नरेन्द्र दुबे

विनोबाजी ने एक बार कहा था गांधी युग की मुख्य देन हैं: सर्वोदय, सत्याग्रह, समन्वय और साम्ययोग। रस्किन की पुस्तक ‘अन्टू दिस लास्ट’ का गांधीजीने भावानुवाद किया था और उसे नाम दिया था - सर्वोदय। उसका नाम तो होना चाहिए था ‘अन्त्योदय’ किंतु उसे गांधीजी ने ‘सर्वोदय’ नाम दिया। इस कृति में तीन तत्वों का उल्लेख है: समाज के हित में ही व्यक्ति का हित है, समाज के लिए किए जाने वाले सभी काम का समान महत्व है, सभी को आजीविका का समान हक है इसलिए उनके पारिश्रमिक में भी समानता होनी चाहिए और किसान, मजदूर का जीवन ही सच्चा जीवन है। इन तत्वों के अनुपालन से ही वे ‘मोहन’ से ‘महात्मा’ बने। दक्षिण अफ्रीका में व्याप्त काले-गोरे के वर्णभेद के अज्ञान के निवारण के लिए ‘सत्याग्रह’ का संशोधन किया। वहां उन्होंने अपने धर्म पर दृढ़ रहते हुए मुसलमान, ईसाई, सिख आदि सभी धर्म वालों को साथ लेकर ‘समन्वय’ की शक्ति भी प्रकट की और वहीं फिनिक्स आश्रम में ‘साम्ययोग’ का प्रयोग किया। इस प्रकार उन्होंने सर्वोदय, सत्याग्रह, समन्वय और साम्ययोग के आयामों से समृद्ध ‘अहिंसक-क्रांति’ का सूत्रपात किया। भारत में स्वतंत्रता संग्राम में इसी ‘अहिंसक-क्राति’ का आरोहण जारी रहा। भारत में अहिंसक-असहयोग, बहिष्कार, सविनय अवज्ञा, करेंगे या मरेंगे और षांतिरक्षा के लिए आमरण-उपवास जैसी इसकी अनेक पद्धतियां विकसित हुई। आजादी के बाद अहिंसक-क्रांति की यही प्रक्रिया निये संदर्भ में भूदानयज्ञ, ग्रामदान और गोरक्षा-सत्याग्रह के रूप में सतत आगे बढ़ रही है।

सत्य-अहिंसा से समाज की समस्या का समाधान

सदियों से माना जाता रहा है कि सत्य, प्रेम, करूणा, अहिंसा आदि आध्यात्मिक तत्वों का व्यक्ति के आंतरिक विकास और उन्नति के लिए महत्व हैं किंतु खेती में, व्यापार में, उद्योग में, राजकाज में सत्य-अहिंसा जैसे तत्वों का पालन करना संभव नहीं है। किंतु गांधीजी ने इन तत्वों का प्रयोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में करने का तरीका निकाला और संसारी जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए भी इनका प्रयोग कर यह सिद्ध कर दिया कि समाज की कठिन से कठिन समस्या का समाधान भी सत्य-अहिंसा जैसे तत्वों के प्रयोग से किया जा सकता है। इतना ही नहीं समाज की नवरचना भी सत्य-अहिंसा की बुनियाद पर की जा सकती है। समाज में ऐसी भी मान्यता रूढ़ रही है कि मानव के विकास में हिंसा, संघर्ष, स्पद्र्धा आदि का महत्वपूर्ण स्थान है। एक पूरा का पूरा दर्षन ही इस मान्यता पर खड़ा है। लेकिन इतिहास के गंभीर अध्ययन से यह प्रकट हुआ है कि जाने-अनजाने ही क्यों न हो सत्य और अहिंसा के सतत पालन से ही समाज उत्तरोत्तर ऊंचा उठा है।

शब्द-शक्ति के उपासक विनोबा

विनोबाजी शब्द-शक्ति के उपासक थे। वे कहते थे, ‘पुराने शब्दों में नया अर्थ भरना अहिंसक-क्रांति की प्रक्रिया है’। उन्होंने ‘भूदानयज्ञ’ में गीता के तत्वज्ञान - दान, तप और यज्ञ - तीनों का समन्वय तो किया ही है किंतु उसके साथ-साथ इन शब्दों में नये अर्थ भी भरे हैं। ‘दान’ शब्द गिर गया था उसे उन्होंने उठाया और श्रमदान, समय-दान, बुद्धि-दान, सम्पत्ति-दान, साधन-दान के साथ श्री जयप्रकाशजी ने ‘जीवन-दान’ से एक नया शब्द जोडा। इस प्रकार उन्होंने दान-प्रक्रिया से न्यास-व्यवस्था (ट्रस्टीशिप) कायम करने की प्रक्रिया भी समझाई। उन्होंने एक ओर वेद के सूत्र - ‘माता भूमिः पुत्रोहम पृथिव्याः’ अर्थात् भूमि हमारी माता है उसके हम पुत्र हैं इस भावना का प्रसार कर मानसिक धरातल पर ‘उत्पादन-सम्बन्धों’ में परिवर्तन की और स्वामित्व-विसर्जन की नई भूमिका प्रस्तुत की तो साथ ही शंकराचार्य के ‘दानं संविभाग‘ सूत्र का भी सामयिक उपयोग कर दान शब्द का नया अर्थ उद्धाटित किया। ‘सबै भूमि गोपाल की और सब सम्पत्ति रघुपति कै आही के पुराने आध्यात्मिक सूत्र में मालकियत-विसर्जन का क्रांतिकारी तत्व भी दाखिल कर दिया।

भूदान आन्दोलन

हम लोग  भूदानयज्ञ आन्दोलन को ‘आन्दोलन’ कहते थे वे बार-बार समझाते थे कि यह आन्दोलन नहीं ‘आरोहण’ है। ‘आन्दोलन’ शब्द में एक ही स्तर पर हलचल का भाव है जबकि ‘आरोहण’ शब्द में निरंतर ऊपर चढ़ने का भाव हैं। हम लोग नारा लगाते थे ‘भूखी जनता अब न सहेगी, धन और धरती बंट’ के रहेगी। वे उसमें सुधार कर कहते थे, ‘सुखी जनता अब न सहेगी धन और धरती प्रेम से बटेगी।’ इस प्रकार वे हमारे जोष को होष में तब्दील कर देते थे।

सत्याग्रह : जीवन शैली

वस्तुतः सत्याग्रह सम्पूर्ण जीवन-शैली है परंतु विशेष प्रसंग पर अन्याय-निवारण केलिए अहिंसक-प्रतिकार की पद्धति भी है। विश्व ने अभी तक सत्याग्रह को जीवन-शैली के रूप में स्वीकार नहीं किया है। इसे प्रतिकार-पद्धति के रूप में ही ज्यादा मान्यता मिली है। इसलिए आजादी के बाद भारत में वेतन-भत्ते बढ़ाने या अपनी छोटी-मोटी मांगों की पूर्ति के लिए प्रदर्शन, हड़ताल, भूख हड़ताल, धरने आदि को ही ‘सत्याग्रह’ कहा जाने लगा। इस प्रकार हृदय-परिवर्तन और विचार-परिवर्तन के बजाय ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग डराने, धमकाने के लिए होने लगा। इस कारण सत्याग्रह शब्द के सहचारी भाव बदल गए और उसकी पूर्व प्रतिष्ठा को धक्का लगा। जबकि सत्याग्रह का विचार और दर्शन विश्व को गांधीजी की मौलिक और महान देन है। दक्षिण अफ्रीका और भारत में गांधीजी ने जिस प्रकार ‘सत्याग्रह’ के विविध आयाम प्रकट किए वे विश्व इतिहास में स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हैं।

भूदान यज्ञ : सत्याग्रह

यद्यपि विनोबाजी पर यह आक्षेप किया जाता रहा कि उन्होंने गांधी के सत्याग्रह को छोड़ दिया है। जबकि उनका भूदानयज्ञ सही अर्थ में सत्याग्रह था। विनोबाजी ने आंतरिक चर्चा में जब-तब उसका ऐसा उल्लेख किया है किंतु उसे प्रचलित विकृत अर्थ में सत्याग्रह न समझ लिया जाय इसलिए भी सार्वजनिक स्तर पर उसे सत्याग्रह के रूप में प्रचारित नहीं किया। भारत के आजादी के आन्दोलन में ही यह विचार पक्का हो गया था कि जमींदारी, जागीरदारी, राजाशाही जैसी सामंती-व्यवस्था अन्यायपूर्ण है और यह समाप्त होनी ही चाहिए। ऐसा जनमानस भी बन चुका था। सरदार पटेल ने इस मानस का उपयोग कर कुषलता से राजाओं की सहमति से उनके राज्यों को भारत संघ में विलय कराया। देश ने कानून बना कर जमींदारी और जागीरदारी समाप्त की। किंतु भूमि का व्यक्तिगत-स्वामित्व ही अन्यायपूर्ण है ऐसी मान्यता उस समय नहीं बनी थी। इसलिए जमीदार, जागीरदार, मालगुजार भी किसान बन कर भूमि के मालिक बन गए। खेती न करते हुए भी वकील, डाक्टर, व्यापारी, सरकारी कर्मचारी और उद्योगपति भी जमीन के मालिक बने रहे। खेतों पर काम करने वाला, जोतने वाला खेत-मजदूर, मजदूर ही बना रहा। समाज के ढ़ाचे में ही अंतर्निहित यह ऐसा अन्याय था जिसे सामान्यजन अन्याय ही नहीं मानता था। जबकि जमीन तो प्रकृति की देन है और उस पर रहने वाले और उससे अपनी आजीविका प्राप्त करने वाले प्राणी मात्र का उस पर हक है। यह ऐसा कठिन प्रश्न है जिसका समाधान करना शेष है। विनोबाजी कार्लमाक्र्स को महामुनि कहते थे क्योंकि उन्होंने अपने तथ्यान्वेषण से ‘व्यक्तिगत-स्वामित्व’ को शोषण और विषमता का प्रमुख कारण सिद्ध किया था। महर्षि टाल्स्टाय ने व्यक्तिगत-स्वामित्व की जड़ मानव मन में है इसलिए मानस-परिवर्तन के बिना स्वामित्ववृत्ति का शमन नहीं होगा इस तत्व को रेखांकित किया था। गांधीजी ने व्यक्तिगत-स्वामित्व की वृत्ति से उत्पन्न साम्राज्यवादी-व्यवस्था को सत्याग्रह द्वारा समाप्त करने का प्रयोग सिद्ध किया। जापान में अमेरिकी कब्जे के बाद जनरल मेकार्थर ने कानून बना कर सामंती प्रथा समाप्त की और भूमि हद बन्दी कानून लागू किया। रूस में हिंसक-क्रांति के बाद भूमि की व्यक्तिगत मालकियत समाप्त कर राज्य की मालकियत कायम की। चीन जैसे कृषि-प्रधान और ग्राम-प्रधान देश में माओत्से तुंग को भी जमीन की व्यक्तिगत मालकियत मिटाने के लिए हिंसा का सहारा लेना प़ड़ा, उस व्यवस्था को टिकाए रखने के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबन्धित कर एक दलीय तानाशाही व्यवस्था कायम करनी पड़ी और जिसे आज तक सेना की मदद से कायम रखा जा रहा है। इस एतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भूदानयज्ञ और ग्रामदान को देखना चाहिए जिसमें सत्य, प्रेम और करूणा की शक्ति से बेजमीन खेत मजदूरों को जमीन देने और स्वेच्छा से स्वामित्व के विसर्जन का तत्व निहित है। गांधीजी कहते थे, ‘वन स्टेप इज इनफ फॉर मी’ - ‘मेरे लिए एक कदम काफी है’। अहिंसक-क्रांति की देशा में भूदानयज्ञ ऐसा ही एक कदम था।

जयप्रकाश जी और भूदान आन्दोलन

श्री जयप्रकाशजी भारत में समाजवादी विचारधारा के प्रवर्तकों मे से थे। हजारीबाग जेल तोड़कर भागने वाले क्रातिकारी थे। उन्होंने उनके मित्र श्री ब्रह्मदत्त बाजपेयी द्वारा भेजे गए विनोबा के भूदानयज्ञ के साहित्य को पढ़ा और सिताबदियारा में अपनी जमीन का वितरण कर वे उत्तर प्रदेश के बांदा नगर में विनोबाजी से मिलने आए। उन्होंने विनोबाजी से कहा कि ‘वे अपने गांव में साठ बेजमीनों को मालिक बना कर आए है।’ इस पर विनोबा ने हंसते हुए कहा,‘आप मेरा काम कठिन बना कर आए हैं। क्योंकि अभी तो मेरे सामने एक मालिक की ही मालकियत मिटाने का सवाल था। अब तो साठ मालिकों की मालकियत मिटाने का बड़ा सवाल है।’ इस पर जयप्रकाशजी ने कहा था,‘आप महान क्रांतिकारी हैं।’ इसी प्रकार जब श्री जयप्रकाशजी ने सर्वोदय सम्मेलन के अवसर पर अपने जीवनदान की घोषण की तब विनाबाजी ने उनके हाथ में अपने जीवनदान की पर्ची में लिखा, ‘‘भूदानयज्ञ मूलक ग्रामोद्योग प्रधान अहिंसक-क्रांति केलिए मेरा जीवन समर्पित है।’’ इस प्रकार विनोबाजी ने भूदानयज्ञ को परिभाषित किया।

क्रांति अहिंसक ही हो सकती है

हिंसा से राज्य-परिवर्तन केलिए क्रांति शब्द का प्रयोग फ्रान्स की राज्यक्रांति के बाद होने लगा। किंतु दुनिया में ‘‘क्राति’’ शब्द को प्रचलित करने का श्रेय साम्यवादी आन्दोलन को है। गांधीजी ने ‘क्राति’ शब्द का उच्चारण नहीं किया। सन् 1942 के भारत-छोड़ो आन्दोलन में तोड़-फोड़ हुई थी संभवतः इसी कारण से उसे लोगों ने ‘42 की क्राति’ कहा। क्योंकि ‘क्रांति’ शब्द के साथ ऐसे ही सहचारी भाव हैं। किंतु विनोबा ने भूदानयज्ञ के साथ विचारपूर्वक ‘अहिंसक-क्रांति’ शब्द को जोड़ा है। इस प्रकार उन्होंने ‘क्रांति’ शब्द को परिभाषित कर उसमें में एक नया अर्थ भरा है। बाद में तो उन्होंने कहा कि क्रांति तो अहिंसा से ही हो सकती है। सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाने की ‘संक्राति’ से क्राति शब्द को जोड़ा। इतना ही नहीं उन्होंने हृदय-परिवर्तन, विचार-परिवर्तन और व्यवस्था-परिवर्तन की त्रिसूत्री के साथ समाज के जीवनमूल्यों में परिवर्तन को जोड़ कर ‘अहिंसक-क्रांति’ का समग्र दर्शन प्रस्तुत किया।

कांग्रेस की जगह ‘लोक सेवक संघ’

गांधीजी ने आजादी के बाद कांग्रेस को ‘लोक सेवक संघ’ में रूपांतरित करने का एक विधान अपने हाथ से ही बनाया था। उसमें लिखा था, ‘शहरों और कस्बों से भिन्न उसके सात लाख गांवों की दृष्टि से हिन्दुस्तान की सामाजिक, नैतिक और आर्थिक आजादी हांसिल करना अभी बाकी है। लोकशाही के मकसद की तरफ हिन्दुस्तान की प्रगति के दरमियान सैनिक सत्ता पर नागरिक सत्ता को प्रधानता देने की लड़ाई अनिवार्य है।’ जब विनोबाजी पंचवर्षीय योजना के प्रारूप पर चर्चा के लिए पंडित नेहरू के निमंत्रण पर उनसे मिलने गए तब उन्होंने नेहरूजी का ध्यान गांधीजी की इस अंतिम वसीयत पर आकर्षित किया। इस पर नेहरूजी ने नम्रतापूर्वक कहा कि ‘गांधीजी होते तो यह कर सकते थे। मेरी वैसी हस्ती नहीं है। देश में अनेक शक्तियां काम कर रही हैं। देश की एकता, अखंडता और स्थिरता कायम रखने का बड़ा सवाल है। कांग्रेस देश व्यापी संगठन है। वह नहीं रहेगा तो कठिनाई होगी।’ इस चर्चा के बाद विनोबाजी अपनी भूदान पदयात्रा पर निकल पड़े।

नेहरु जी के लिए जान हाजिर पर वोट नहीं

सन् 1952 में पहले आम चुनाव हुए। उस समय विनोबाजी उत्तर प्रदेश में नेहरूजी के चुनाव क्षेत्र के पास पदयात्रा करके पहुंचे थे। वह पत्रकारों ने उनसे पूछा कि नेहरूजी गांधीजी के राजनैतिक उत्तराधिकारी हैं, आपके मित्र है क्या आप उनके समर्थन में अपील जारी नहीं करेंगे?’  विनोबाजी ने जवाब दिया, ‘पंडित नेहरू के लिए जान हाजिर है, वोट नहीं।’ इससे जाहिर है कि चुनाव और वोट की राजनीति से विनोबाजी किस हद तक असहमत थे।

शासन-मुक्ति, निधि मुक्ति, तंत्र मुक्ति

भूदानयज्ञ आरोहण में अहिंसक-क्राति की प्रक्रिया को तीव्र और व्यापक करने के लिए उन्होंने शासन-मुक्ति, ‘निधि-मुक्ति’ और ‘तंत्र-मुक्ति’ के सूत्र विकसित किए। भूदान के कार्यकर्ताओं केलिए शासन से आर्थिक या अन्य सहायता लेने का तो प्रश्न ही नहीं था। किंतु उसमें ‘शासन-विरोध’ का भी तत्व नहीं था। शासन-मुक्ति का अर्थ है न तो शासन आश्रय और न शासन-विरोध। इसके साथ ही उन्होंने समझाया कि संचित-निधि से और बनी बनाई संस्थाओं से क्रांति नहीं हो सकती। उस समय भूदानयज्ञ के कार्यकर्ताओं को गांधी स्मारक निधि से किंचित मानधन दिया जाता था। भूदान प्राप्ति और वितरण की व्यवस्था के लिए जगह-जगह राज्यों में भूदानयज्ञ समितियां बनाई गई थी। इन भूदान समितियों में विभिन्न राजनैतिक दलों के नेता और सार्वजनिक कार्यकर्ता भी सदस्य और पदाधिकारी थे। 1957 के आमचुनाव का समय था। स्वाभाविक ही उसके पदाधिकारियों के द्वारा भूदानयज्ञ से उत्पन्न नैतिक शक्ति का राजनैतिक उपयोग करने की संभावना भी थी। विनोबाजी ने भूदानयज्ञ समितियों के तंत्र को विसर्जित कर इस संभावना को ही समाप्त कर दिया। दूसरी ओर गांधी निधि आदि के पदाधिकारी पदाधिकारी राजनैतिक नेता भी थे और वे अर्थ-सहायता के बल पर भूदान कार्यकर्ताओं पर प्रशासनिक नियंत्रण भी कर सकते थे उस संभावना को भी समाप्त कर दिया। इस प्रकार उन्होंने भूदान कार्यकर्ताओं की स्वतंत्रता और अभिक्रम को भी कायम रखा। कार्ल मार्क्स ने कहा था ‘साम्यवादी कार्यकर्ताओं को मानव-सागर में मछली की तरह रहना चाहिए’। विनोबाजी ने इसी तर्ज पर सर्वोदस सेवकों के समक्ष जनाधार का विचार रखा और सर्वोदय कार्यकर्ताओं को जनाधारित जीवन जीने का आह्वान किया। इससे न केवल कार्यकर्ताओं को जनता से मदद मिली वरन् सर्वोदय विचार को भी व्यापक जनसमर्थन भी मिला।

सर्वोदय पात्र

इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए विनोबा ने ‘सर्वोदय-पात्र’ का विचार और कार्यक्रम देश के सामने रखा। वे कहते थे कि सर्वोदय पात्र भिक्षा नहीं, सर्वोदय का पात्र बनने के लिए दीक्षा है और सर्वोदय विचार के लिए लोक-सम्मति का प्रतीक है। विनोबा ने अपने लिए कहा था ‘सर्वोदय-पात्र का विचार देकर वे ऋषि बन गए।’

हिंसा में विश्वास रखने वाले क्रांतिकारी ‘राहतकार्य’ और ‘क्रांतिकार्य’ में विरोध  मान कर राहतकार्य को क्रान्ति का विरोधी मानकर समान्य राहत-कार्य का तत्वतः विरोध करते रहे हैं। किंतु गांधीजी ने खादी जैसे राहत कार्य को आजादी के अहिंसक-क्रातिकारी आन्दोलन से जोड़ा था। इसी परंपरा में विनोबा ने भूदानयज्ञ में इन दोनों का समन्वय किया। भूदान से भूमिहीनों को तत्काल राहत मिलती थी और इसमें स्वामित्व-विसर्जन का क्रांतिकारी तत्व भी था। भूदानयज्ञ ऐसा राहत कार्य था जिसमें क्रांति के बीज छिपे थे।

दुनिया में गुणात्मक परिवर्तन

हिन्दुस्तान की आजादी और चीन की क्रांति ने विश्व-परिस्थिति में गुणात्मक परिवर्तन कर दिया। भारत न केवल आजाद हुआ बल्कि उसने सैंकड़ों सालों की नवाबी, राजाशाही, जमीदारी, जागीरदारी, मालगुजारी जैसी सामंती परंपराओं का परित्याग कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संगठन की स्वतंत्रता, धर्म-निरपेक्षता, स्वतंत्र न्यायपालिका जैसे सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों के साथ बहुदलीय संसदीय-लोकतंत्र को अपनाया और शान्तिपूर्ण उपायों से समाजवादी-समाज की रचना का लक्ष्य सामने रखा। उसी समय चीन ने हिसक-क्रांति द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बलिदान देकर सैन्यशक्ति आधारित एक दलीय प्रणाली द्वारा साम्यवादी-समाज बनाने का लक्ष्य सामने रखा है। रूस की हिंसक क्रांति पर गांधीजी ने यह टिप्पणी की थी कि ‘हिसक साधनों से प्राप्त कोई भी उपलब्धि टिकाउ नहीं हो सकती’। दुनिया को हिला देने वाली हिंसक-क्राति के साठ साल में ही सोवियत-संघ छोटे-छोटे राष्ट्रों में विभक्त हो कर बिखर गया है। इसलिए इसमें कोई शक नहीं रहना चाहिए कि यदि समय रहते चीन ने भी अपनी नीतियां नहीं बदली तो उसका हाल भी सोवियत-संघ जैसा ही होगा। आज तो विचारों की दृष्टि से भारत और चीन दोनों पड़ौसी देश वर्तुल के दो सिरों की तरह आमने-सामने खड़े हैं।

विवेकशील लोग हिंसा पर प्रतिबन्ध लगाएं

अमेरिका द्वारा हीरोशिमा और नगासाकी पर गिराए गए अणुबम ने हिंसा की पराकाष्ठा का भान लोगों को करा दिया है। हिंसा-शक्ति का ऐसा विकास सैंकड़ों, हजारों वर्षों की ‘साधना’ और ‘तपस्या’ का ही फल है। दुनिया भर के अनेक बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और वैज्ञानिकों ने संहारक शस्त्रों के संशोधन में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है और आज भी विश्वभर की अनेक संस्थाएं, संगठन और सरकारें की शस्त्र-शक्ति के विकास में लगी है। इसके परिणामस्वरूप आज सामान्य मनुष्य के हाथ में प्रलय करने की ‘ईश्वरीय-शक्ति’ आ गई है। यदि अमेरिका, रूस, चीन, पाकिस्तान या भारत जैसे अणुआयुध सम्पन्न देश के किसी राजनेता का दीमाग खराब हो जाए या ओसामा बिन लादेन जैसे आतंककारी के हाथ में ये विनाशकारी हथियार पहुंच जाएं और वह इन आयुधों का इस्तेमाल करे तो कुल दुनिया का विनाश हो सकता है। इसलिए दुनिया भर के विवेकशील लोगों को इस बात का तेजी से अहसास हो रहा है कि हिंसा-शक्ति पर प्रभावी अुंकुश लगाने की जरूरत है। इसके लिए अणुआयुधों पर बन्दिश लगाने केलिए पारस्परिक संधियां करने पर जोर दिया जा रहा है। किंतु ऐसे तात्कालिक प्रयत्नों से सामाजिक ढांचे में अंतर्निहित हिंसा का शमन नहीं हो सकता। इसके लिए जीवन शैली में और जीवन मूल्यों में ही परिवर्तन करने की जरूर है। यदि दुनिया में शोशणमुक्त, वर्गविहीन और शासनमुक्त समाज की रचना करनी हो, पारस्परिक प्रेम और सद्भाव का विकास करना हो तो वह ‘अहिंसक-लोकशक्ति’ से ही किया जा सकता है। इसलिए ऐसी अहिंसक-लोकशक्ति खड़ी करना हमारे जमाने की मांग है। अहिंसक-लोकशक्ति से ही ‘अहिंसक-समाज’ की रचना की जा सकती है।

भारत दुनिया की तीसरी शक्ति

गांधीजी के जमाने में राजनैतिक गुलामी एक वैश्विक समस्या थी। दुनिया के अधिकांश राष्ट्र साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की गुलामी में फंस गए थे। भारत की आजादी के आन्दोलन से उन्हें प्रेरणा मिली और भारत के आजाद होते ही एक-एक कर दुनिया के सारे देश राजनैतिक गुलामी से मुक्त हो गए। किंतु दुनिया दो ध्रुवों में विभाजित थी। एक था अमेरिका-केन्द्रित और दूसरा था रूस-केन्द्रित। दुनिया के लगभग सभी देश इन दो ध्रुवों मे विभाजित थे जिनके बीच ’शीतयुद्ध’ चल रहा था। दोनों ध्रुव शस्त्र-सज्जित थे। इनके कारण हिंसा का शक्ति-संतुलन बना था। किंतु भारत की आजादी और उसकी सक्रिय तटस्थता और गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण दुनिया मे ‘तीसरी-शक्ति’ का उदय हुआ। सैनिक गुटों से अलग रह कर विश्व शान्ति केलिए भारत ने दुनिया में तीसरी शक्ति - नैतिक-शक्ति - खड़ी करने का प्रयास प्रारंभ किया। विश्व राजनीति को यह पंडित नेहरू की देन थी। इसके कारण ही स्वेज-संकट टला, वियेतनाम और कोरिया में युद्ध बन्द हुआ और रूस तथा पष्चिमी देश नजदीक आए। विनोबा ने भारत में हिसा-शक्ति की विरोधी और दण्ड-शक्ति से भिन्न अहिंसक-लोकशक्ति को ‘तीसरी-शक्ति’ के रूप में खड़ा करने का प्रयास किया। राजनैतिक क्षेत्र में गुट-निरपेक्षता की, तटस्थता की नीति का कुछ अनुभव उस समय दुनिया को हुआ। सर्वोदय की अहिंसक-शक्ति का किंचित अनुभव भी भारत सहित कुल दुनिया को हुआ था। किंतु गांधीजी के शब्दों ‘सैनिक-सत्ता पर नागरिक-सत्ता कायम करने’ का महान कार्य करना अभी बाकी है।

यद्यपि मानव समाज शनैः-शनैः हिंसा से अहिंसा की ओर बढ़ रहा है। किंतु उस ओर बढ़ने की उसकी गति अत्यंत धीमी है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से इस मंथर गति को तीव्र किया जा सकता है। विनोबाजी द्वारा प्रवर्तित भूदानयज्ञ को इस दृष्टिकोण से भी देखना चाहिए। (संपादक : डॉ.पुष्पेन्द्र दुबे)