गोरक्षा की आवश्यकता

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Published On : 2017-02-21 01:19:09

गोरक्षा की आवश्यकता

जयदयाल गोयन्दका

वे दिन अब चले गये। हिंदू जाति आज निर्बल हो गयी है। हम अपनी स्वतंतत्रा अपना पुरुषत्व, अपनी धर्मप्राणता, ईष्वर और ईष्वरीय कानून में विष्वा, शास्त्रों के प्रति आदर बुद्धि, विचार स्वातंत्र्य, अपनी संस्कृति एवं मर्यादा के प्रति आस्था - सब कुछ खो बैठे हैं। आज हम आपसी फू2 एवं कलह के कारण छिन्न-भिन्न हो रहे हैं। हम अपनी संस्कृति एवं धर्म पर किए गए प्रहारों एवं आक्रमणों को व्यर्थ करने के लिए संगठित नही हो सकते। हम अपनी जीवनी शक्ति को खो बैठे हैं। मूक पशुओं की भांति दूसरों के द्वारा हांके जा रहे हैं। राजनीतिक गुलामी ही नहीं, अपितु मानसिक गुलामी के भी शिकार हो रहे हैं। आज हम सभी बातों पर पाष्चात्य दृष्टिकोण से ही विचार करने लगे हैं। यही कारण है कि हमारी इस पवित्र भूमि में प्रतिवर्ष लाखों की संख्यार में गाय और बैल काटे जाते हैं औश्र हम इसके विरोध में उंगली तक नहीं उठाते। आज हम दिलीप और अर्जुन का केवल इतिहास पढ़ते हैं और सुनते हैं, उनसे हमारी नसों में जोश नहीं भरता।

दूसरी जातियां अपने गोधन की वृद्धि में बड़ी तेजी से अग्रसर हो रही हैं। दूसरे देशों में क्षेत्रफल के हिसाब से गौओं की संख्या भारत की अपेक्षा कहीं अधिक है और प्रति मनुष्य दूध की खपत भी अधिक है। वहां की गौएं हमारी गौओं की अपेक्षा दूध भी अधिक देती हैं। कारण यही है कि वे गौओं को भरपेट भोजन देते हैं, अधिक आराम से रखते हैं, उनकी अधिक संभाल करते हैं और उनके साथ अधिक प्रेम और कोमलता का बर्ताव करते हैं। अन्य देषों में गोचरभूमियों का अनुपात भी खेती के उपयोग में आने वाली भूमि की तुलना में कहीं अधिक है। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हम अपने को गोपूजक और गोरक्षक कहते हैं, वस्तुतः आज हम गोरक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। गोजाति के प्रति हमारे इस अनादर एवं उपेक्षा का परिणाम भी प्रत्यक्ष ही है। अन्य देषों की अपेक्षा हम भारतीयों की औसमत आयु बहुत कम है और अन्य देशों की तुलना में हमारे यहां के बच्चे बहुत अधिक संख्या में मरते हैं। यही नहीं, अन्य लोगों की अपेक्षा हम लोगों में जीवट भी बहुत कम हैं। कहना न होगा कि दूध और दूध से बने हुए पदार्थों की कमी ही हमारी इस शोचनीय अवस्था का मुख्य हेतु है। इससे यह बात प्रत्यक्ष हो जाती है कि किसी जाति के स्वास्थ्य एवं आयु मान के साथ गोधन का कितना घनिष्ठ संबंध है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देष में आर्थिक दृष्टि से भी गाय का महत्व स्पष्ट ही है। जिन लोगों ने हमारे ग्रामीण जीवन का विशेष मनोयोगपूर्वक अध्ययन किया है, उन सबने एक स्वर से हमारे जीवन के लिए गौ की परमावष्यकता बतायी है। गोधन ही हमारा प्रधान बल है। गोधन की उपेक्षा करके हम जीवित नहीं रह सकते। अतः हमारे गोवंष का संख्या एवं गुणों की दृष्टि से जो भयानक ह्रास हो रहा है,  उसका बहुत शीघ्र प्रतीकार करना चाहिए और हमारी गौओं की दशा सुधारने, उनकी नस्ल की उन्नति करने और उनका दूध बढ़ाने तथा इस प्रकार देश के दुग्धोत्पादन में वृद्धि करने का भी पूरा प्रयत्न करना चाहिए। गायों, बछड़ों एवं बैलों का वध रोकने तथा उन पर किए जाने वाले अत्याचारों को बंद करने के लिए कानून बनाने होंगे और विधर्मियों को भी गौ की परमोपयोगिता बतलाकर गोजाति के प्रति उनकी सहानुभूति एवं सद्भाव का अर्जन करना चाहिए। जिस देष में कभी दूध और दही की एक प्रकार से नदी बहती थी, उस देष में असली दूध मिलने में कठिनाई हो रही है। यह कैसी विडम्बना है!

 

 

 

<p style="\\&quot;text-align:" justify;\\"=""> आध्यात्मिक दृष्टि से भी गाय का महत्व कम नहीं है। गाय के दर्शन एवं स्पर्श से पवित्रता आती है, पापों का नाश होता है, गाय के शरीर में तैंतीस करोड़ देवताओं का निवास माना गया है। गाय के खुरों से उड़ने वाली धूलि भी पवित्र मानी गयी है। महाभारत में महिर्ष च्यवन राजा नहुष से कहते हैं, ‘‘मैं इस संसार में गौओं के समान दूसरा कोई धन नहीं समझता। गौओं के नाम और गुणों का कीर्तन करना-सुनना, गौओं का दान देना और उनका दर्शन करना - इनकी शास्त्रों में बड़ी प्रशंसा की गयी है। ये सब कार्य संपूर्ण पापों को दूर करके परम कल्याण देने वाले हैं। गौएं लक्ष्मी की जड़ हैं, उनमें पाप का लेष भी नहीं है। गौएं ही मनुष्य को अन्न और देवताओं को हविष्य देने वाली हैं। स्वाहा और वषट्कार सदा गौओं में ही प्रतिष्ठित होते हैं। गौएं ही यज्ञ का संचालन करने वाली और उसका मुख हैं। ये विकाररहित दिव्य अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत ही देती हैं। वे अमृत का आधार होती हैं। और सारा संसार उनके सामने मस्तक झुकाता है। इस पृथ्वी पर गौएं अपने तेज और शरीर में अग्नि के समान हैं। वे महान तेज की राशि और समस्त प्राणियों को सुख देने वाली है। गौओं का समुदाय जहां निर्भयतापूर्वक बैठकर सांस लेता है, उस स्थान की श्री बढ़ जाती है और वहां का सारा पाप नष्ट हो जाता है। गौएं स्वर्ग की सीढ़ी है, वे स्वर्ग में भी पूजी जाती हैं। गौएं समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली देवियां हैं, उनसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। राजन्! यह मैंने गौ का माहात्म्य बतलाया है, इसमें उनके गुणों के एक अंश का दिग्दर्शन कराया है। गौओं के संपूर्ण गुणों का वर्णन तो कोई कर ही नहीं सकता। (कल्याण से साभार)