बाजार मुक्ति जरूरी

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Published On : 2017-02-20 02:25:51

बाजार मुक्ति जरूरी

विनोबा

हम चाहते हैं कि आपके गांव में गन्ना होता है, तो गुड़ भी वहीं बने। कपास होती है, तो कपड़ा भी गांव में बने। गांव में मिट्टी है, तो मिट्टी के बर्तन, घड़े आदि गांव में ही बनें। गांव-गांव स्वावलंबी हों। ऐसे स्वावलंबी आजाद गांवों का आजाद देश मजबूत होगा।

मैं कहना चाहता हूं कि आप लोग बाजार के सामने टिक नहीं सकेंगे। उसे आप अपने हाथ में तभी रख सकते हैं, जबकि ग्रामस्वराज्य हो, और वह ग्रामस्वराज्य भी ग्रामदान की बुनियाद पर ही होगा। जब तक आप ग्रामदान नहीं करते, तब तक आप शहर के गुलाम ही रहेंगे।

गांव को जितना कपड़ा चाहिए, उसके हिसाब से कपास बोयेंगे औश्र अपना कपड़ा बनायेंगे, तो कपास और कपड़े के बाजार से मुक्त हो जाएंगे। गांव में दो साल का अनाज हो। गांव के लिए तेल, गुड़ भी बनाएंगे। पैसा कम-से-कम चाहिए। उसके लिए जो ज्यादा पैदावार होगी, उसे बेचेंगे। लेकिन यह समझ लें कि जितना ज्यादा पैसा चाहेंगे, उतनी गुलामी ज्यादा होगी।

एक तो हम पर आसमानी असर छाया हुआ है, दूसरा यह सुलतानी बाजार-भाव का भी असर है। बारिश न हुई, कपास की फसल अच्छी न हुई, तो किसानों को नुकसान है, अगर बारिश हुई और कपास की फसल अच्छी हुई, लेकिन दाम गिर गए तो भी उन्हें नुकसान है। इस तरह आज हमारा किसान अत्यंत पंगु बन गया है। इन दोनों सत्ताओं से उसे बचाना है। आसमानी सत्ता से बचाने के लिए तीन उपाय हैं। पहला, पानी का इंतजाम हमें करना होगा। इस साल पानी हुआ और हमारी खेती बरबाद हुई, ऐसा नहीं होना चाहिए। दूसरा उपाय है, अपने गांव में दो साल का अनाज रखना। अगले साल अच्छी फसल होने के बाद ही हम पुराना बेचें। इस साल का धान इसी साल खत्म हो, ऐसा नहीं होना चाहिए। और तीसरा उपाय है, हमारे व्यवहार में भलाई होना। अगर हम भलाई का बर्ताव करते हैं, तो परमेष्वर भी समयपर ठीक बारिष करेगा। अगर हम पाप करते हैं, तो बारिष भी हम पर प्रहार करती है। इस तरह न्याय, नीति, प्रेम और धर्म पर चलना तीसरा उपाय है। ये तीन बातें हम करेंगे, तो आसमान-सुलतानी से बच जायेंगे।

बाजार के दामों की सुलतानी से बचने का उपाय है ग्राम-स्वावलंबन। मैं आपको एक मिसाल देता हूं। 1920 में हमने खद्दर पहनना शुरू किया। तब से हमने कपड़ा खरीदा नहीं, यानी खद्दर भी हमने खरीदी नहीं। आश्रम में हमने खेतों में कपास बोयी, हमने ही काता और हमने ही बुना। अपना कपड़ा हमने ही इस्तेमाल किया। इसलिए कपड़े पर हमें एक कौड़ी का भी खर्चा नहीं करना पड़ा। हमारा ही खेत था और हमारा ही श्रम। कपास बोने के लिए भी पहले साल के जो बिनौले होते, उन्हीं का इस्तेमाल करते। इसलिए बाजार में कपड़े का दाम इतने सालों में कितना चढ़ा और कितना गिरा, वह हमें मालूम नहीं। महायुद्ध के समय कपड़े का दाम किधर से किधर चला गया। बीच में कंट्रोल का जमाना भी आया। उस क्ता लोगों को बड़ी मुष्किल से कपड़ा मिलता था। किंतु हमें कोई कष्ट नहीं हुआ। हमको बाजार के दाम का पता ही नहीं रहता था। सारांष, इस तरह गांव-गांव के लोग अपनी मुख्य-मुख्य आवश्यकताओं के  बारे में मिल-जुलकर स्वावलंबन करेंगे, तो बाजार के दामों से बचेंगे। फिर भी बिल्कुल ही बचेंगे, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि केरोसीन जैसी चीज गांव में बनाना मुष्किल होगा। हम अपने गांव के प्रकाष की योजना बिल्कुल ही नहीं बना सकते, ऐसी बात नहीं। गोबर-गैस-प्लांट की योजना कार्यान्वित कर प्रकाष तैयार किया जा सकता है। यह हम सब कर सकते हैं और करना भी चाहिए, पर वह एकदम नहीं होगा। कुछ चीजें बाहर से खरीदनी ही होंगी। भले ही वे महंगी पड़ें। उन चीजों के बारे में हमें तकलीफ होगी। फिर भी रोजमर्रा की मुख्य-मुख्य आवश्यकताओं के बारे में स्वावलंबी बनेंगे, तो हम बाजार-भाव की सुलतानी से बहुत कुछ बच जाएंगे।

विनोबा साहित्य (खण्ड 18)