श्वेत क्रांति पर प्रश्नचिह्न

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Published On : 2017-02-19 04:51:11

श्वेत क्रांति पर प्रश्नचिह्न

गोविभा पत्रिका से

नवम्बर 2011

(मध्यप्रदेश पशुपालन विभाग के भूतपूर्व संचालक डॉ.मो.या.मंगरूलकर ने गोवंश को विनाश से बचाइये! पुस्तक लिखी। जिसका प्रकाशन अ.भा.कृषि गोसेवा संघ ने किया। पुस्तक के संपादित अंश यहां दिए जा रहे हैं।)

पहले ऑपरेशन फ्लड एक और अब ऑपरेशन फ्लड दो। सीधे-भोले ग्रामीणों और शहरियों के लिए दूध की नदियों में बाढ़। चमत्कार जैसा लगता है जबकि देश में पिछले 25-30 वर्षों में दूध मिलना ही दुर्लभ होता जा रहा है। शहरों में तो उसका भाव 5 से 7 रुपये (अब 42 से 50 रुपये) लीटर तक हो गया है। इस कारण बेचारा समीपवर्ती ग्रामीण अपने घर का सारा का सारा दूध, अपने नन्हें-मुन्नों को भी न देकर शहरों में बेच देता है या इसी हेतु बनाई गई सहकारी संस्थाओं के हवाले सस्ती कीमत पर बेच देता है। इन संस्थाओं का जन्म इसी उद्देष्य से हुआ है कि ग्राम-ग्राम से दूध एकत्र कर शहर की दिशा में भेजा जा सके। कुछ वर्षों पूर्व जब सड़कें और आवागमन के साधन सुलभ नहीं थे, ग्रामवासी अपना दूध बेच नहीं पाता था, परंतु दही, खोया, मक्खन और घी शहरों तक पहुंचाकर पैसा कमाता था। गांव से कौन सी दुग्धजन्य वस्तु कहां बेची जाएगी यह पहले-पहले गांव से बिक्री स्थान की दूरी पर और माल ले जाने के साधन वाहन इत्यादि पर निर्भर रहता था। धीरे-धीरे व्यापारी वर्ग इस काम में घुसा और स्वार्थ हेतु किसी न किसी गरज की पूर्ति के लिए कर्ज देकर उससे घी, खोया, मक्खन इत्यादि मनचाहे भाव से वसूलने लगा। यह माल शहरों के बाजारों में स्वनिर्मित भाव से बेचकर उसने अपनी धाक जमाई। उन दिनों ग्रामीणों को दूध-दही नहीं तो कुछ मठा तो अवष्य ही उपलब्ध हो जाता था जो स्वास्थ्य बनाये रखता था। जैसे-जैसे शहरों के आसपास के गांवों से सड़कें जुड़ गईं और वाहन व्यवस्था हो गई, शहरी जनता ही समीपवर्ती गांवों से अधिक मात्रा में दूध मिलने लग गया और देहातियों का स्वास्थ्य गिरने लगा। खोया घी इत्यादि का आयात अब दूर गांवों से होने लगा जहां छोटा-बड़ा मझोलिया व्यापारी अभी भी कर्जा देकर अपना एकाधिकार जमाये हुए है।

हरित क्रांति के बाद श्वेत क्रांति का दावा

पिछले दशक में श्वेत क्रांति बड़ी धूमधाम से आई, नारे लगे, और जनता के मन में हरित क्रांति से भी अधिक आशा जागी कि अब देश में दूध की विपुलता होगी। आशावादी लोगों की दृष्टि यह चमत्कार देखने को आतुर अधिक थी, समझने को कम। जैसे-जैसे श्वेत क्रांति का स्वप्न (?) खिलता गया, उसका रहस्य चर्चा का विषय बन गया। भारत में ही नहीं, सारे विश्व में। पहले भारत की ही बात करें।

कुछ दशकों से क्या विदेश के लोग और क्या भारतवासी शिक्षित और वैज्ञानिक, यह बात कहते नहीं थकते कि भारत में पूरे विश्व का एक तिहाई या एक चौथाई गोवंश होते हुए भी दूध का उत्पादन इतना कम है कि प्रतिदिन प्रति मनुष्य केवल कुछ चम्मच (अब 245 ग्राम) ही नसीब होता है और फलस्वरूप् यहां कि आबादी का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इस दावे की सच्चाई मानने वालों के अनुसार यही एक मार्ग बचा है कि यहां के गोवंश की छंटाई की जाए और विदेशों से दूध, दूध-चूर्ण और डेयरी मशीनरी की तुरंत सहायता ली जाए और भारतीय गायों को देशी सांडों से फलाने की बजाय विदेशी दुधारू नस्ल के सांडों से संकरित किया जाए (इसके लिए देशी सांडों को बधिया करना अनिवार्य हो जाता है) जिससे संकरित बछिया से अधिक दूध उत्पादन हो सके।

हमारे नेताओं ने, वरिष्ठ अधिकारियों ने और चोटी के वैज्ञानिकों ने इस विचारधारा और गोवंश के संकरीकरण की आवश्यकता के अनुकूल अपनी मनःस्थिति को पूर्णतया बदलने में दूरदर्शिता से काम है ऐसा नहीं लगता। अपना इतिहास बताता है कि भारत में दुधारू नस्ल भी थीं, जिनसे प्रचुर मात्रा में दूध हुआ करता था। यदि आजकल के बड़े बड़े शहरों और कस्बों को छोड़ दिया जाए तो अभी भी ऐसे लोग जीवित हैं जो बतलायेंगे कि उन्होंने रुपये का बीस सेर दूध औश्र आठ-नौ आने सेर घी खाया है। आज भी 35 किलो दूध देने वाली देषी गायें मौजूद हैं, और तीस-चालीस बरस से अभी तक कलकत्ते में छैना-रसगुल्ला के उत्पादन पर हरियाणा गायों का एकाधिकार रहा है।

दोषी कौन ?

आज ऐसी गिरी हालत क्यों है इसका उत्तरदायित्व गोवंश पर नहीं, बल्कि उनकी तरफ असीम दुर्लक्ष करने वाले, उन्हें अधोगति तक पहुंचाने वाले, उन्हें बेकाम, अनार्थिक और भारतम करने वाले पढ़े लिखे सत्ताधारियों पर है। मान भी लिया जाय कि कुछ सदियों के मुगल शासन में कुछ हद तक और तदुपरांत अंग्रेजी राज में, गोवंष की अवनति होती रही, तिस पर भी ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि समय समय पर मुगल बादशाहों ने ऐसे फरमान जारी किए थे कि जिनसे अच्छी नस्ल का गोवंश सुयोग्य रीति से पाला जाय और अच्छी दुधारू गायें और खेती और भारवहन के लिए मजबूत बैल पैदा होते जायें (गुजरात की गायें 60 सेर दूध देती हैं ऐसा उल्लेख मुगल जमाने के एक प्रसिद्ध इतिहासकार अबुल फजल ने लिखा बताते हैं)। अंग्रेजी शासन के अंतिम वर्षों में अपने दीर्घकालीन शासन में विदेषी नस्ल का गोवंष (नर-मादा दोनों का भारत में आयात कर पछताते हुए उन्होंने यह स्पष्ट रूप से सलाह दी थी गोवंश भारत के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है, उसका ही संवर्धन इस तरीके से हो जिससे ग्राम-ग्राम में आवश्यकतानुसार दुग्ध उत्पादन हो और खेती योग्य बैल मिलें। याने ऐसे द्विप्रयोजन नस्ल का ही उपयोग हो विदेशी नस्लों की अनुपयोगिता से अंग्रेजों ने सबक सीख लिया था और कहा था कि केवल पहाड़ी और अतिवृष्टि वाले इलाकों के लिए ही, जहां कोई अच्छी भारतीय नस्ल अस्तित्व में नहीं है विदेशी नस्लों का प्रयोग किया जाये यदि खिलाई, रख-रखाव और प्रतिबंध व उपचार की सुविधाएं संतोषजनक हों। उस समय के भारतीय अधिकारी और वैज्ञानिक इस सुझाव से सहमत थे।

आज की हालत में आदमी छोटे बड़े कस्बों और शहरों की ओर खिंचा जा रहा है। जब गांव के गांव खाली होते जा रहे हैं, दूध और अन्नोत्पादन की समस्या उठ खड़ी हुई है। गोवंष के माध्यम से इन दोनों में जो संबंध था वह टूट गया है। अब दूध के लिए केवल गाय की बात सोची जाती है और खेती के लिए ट्रैक्टर और रासायनिक खाद की। यह हम भूल गये कि आज भी हमारा 80 प्रतिशत गरीब किसान औसतन दो-तीन एकड़ की खेती और खाद के लिए गोवंश पर निर्भर है, हमारे खाद्यान्न का उत्पादक है और हमें भुखमरी से बचाता है।

गांव से शहरी की ओर दौड़

सड़कें, यातायात, बिजली, यंत्रीकरण, सिनेमा, रेडियो ऐसे प्रलोभन हैं जिनके कारण देहाती अधिकाधिक संख्या में शहरों की आबादी बढ़ाता जा रहा है। शहरों की आबादी के लिए दूध कहां से आये जब दूध उत्पादक स्वतः अपनी गायों को लापरवाही से त्याग कर शहर में बस गया है और दूध की मांग कर रहा है ? देष को विकसित करने के लिए हमारे नेताओं ने निर्णय ले लिया है कि पाश्चात्य देशों के पदचिन्हों का सहारा लिया जाय, उनका अनुकरण किया जाय। भारतीय गोवंश इस कारण पिछड़ता ही गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उसके प्रति इतनी षिथिलता बरती गई कि प्रारंभ में जो प्रगति हुई थी वह आगे बढ़ने के बजाय किन्हीं राजनैतिक कारणों से रुक गई। यदि गाय का दूध घटा, या वह निकम्मी और भारतम हो गई, उसमें गाय का क्या दोष ?