गोपालन की सही दृष्टि

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Published On : 2018-07-19 09:25:29

गोपालन की सही दृष्टि

विनोबा

प्रांतों की हुकूमत हाथ में आने से गाय बैलों की बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। और उस संबंध में ठीक दिशा तय करने की जरूरत हो गई है। शहरों को भरपूर और अच्छा दूध पुराने की ओर सहज ही ध्यान गया है। उसके बारे में और गोपालन के पूरे मसले के बारे में कुछ सुझाव मुझे करने हैं:

1 दूध पुराने की बात उठते ही दुधारू गायों की ओर सहज ही ध्यान जाता है। लकिन दुधारू गायें जहां तक बने, आसपास की ही चुनी जाएं ऐसा मेरा कहना है। दूर दृष्टि से सोचने पर इसका कारण समझ में आ जाएगा। पास की नस्ल को नजरअंदाज करने से काम नहीं चलेगा। वैसा करना किसानों से गद्दारी करना साबित होगा। किसानों के पास गायों को सुधारने का रास्ता दिखा देना सबसे बड़ी जरूरत है। शहरों को दूध पुराने की उमंग में इस तरफ लापरवाही करना बेजा होगा।

2 यह भी गलत होगा कि सिर्फ गाय का दुधारूपन देखकर इसका विचार ही न किया जाए कि उससे बैल कैसे होंगे। खेती के लिए बैल, गोरक्षा का एक पंख है, दूध के लिए गाय, दूसरा पंख है। ये दोनों पंख साबित रहने चाहिए। बहुत दूध की हौस इच्छा पालने से काम नहीं चलेगा। बिलकुल की कम दूध भी पुसायेगा नहीं यह साफ है। कृषि समर्थ बैल और भरपूर प्रमाण में दूध, इन दोनों का मेल साधना चाहिए। बैल कम ताकत वाला निकला तो भी काम चलेगा, दूध भरपूर हुआ तो भर पाया। ऐसी दृष्टि उस देश में चल सकती है, जिस देश में खेती बैलों पर मुनहस्सर निर्भर नहीं और जहां बैल खुराक की चीजों में शुमार है। एक ही किस्म की गाय से भरपूर दूध और अच्छा बैल मिले तभी हिंदुस्तान को पुसायेगा।

3 शहरों को दूध पुराना इतना ही गांव का काम नहीं है। गांव वालों को खुद दूध पीना चाहिए और बचा हुआ दूध बेचना चाहिए, यह हमारा मकसद हो। इसीलिए हमें ऐसा करना चाहिए कि हर गांव में भरपूर दूध हो और गांव वालों के लिए उसका पीना पुसाये।

4 खेती, गोपालन, तेलघानी, चमड़े का काम और खाद की योजना मिलकर एक समूह है। इस पूरे समूह का एक साथ प्रयोग होने पर ही खेतिहर के बच्चे दूध पी सकेंगे। इसलिए गोसेवा की सरकारी प्रयोगशालाओं में ऐसे समूचे प्रयोग चलने चाहिए।

5 गोसेवा और खादी ग्रामोद्योग को जुदा करने से नहीं चलेगा। खादी ग्रामोद्योग के अभाव में किसान को जरूरत की चीजें खरीदने में पैसा लगेगा। यह हालत जब तक कायम है तब तक उसको गोरस नसीब नहीं हो सकता।

6 गांववाले बाहर से बैल न खरीदें। बढ़िया बैल गांव में ही तैयार होने चाहिए। इसके लिए गांव-गांव सरकार योग्य सांड मुहैया करे। यह काम एकदम बुनियादी है और इसलिए सबसे ज्यादा अहम समझा जाना चाहिए।

ये कम से कम सुझाव दिए गए हैं। तफसील में मैं नहीं गया हूं। भावी योजना यदि इन्हें मद्देनजर रखकर की गई तो देश का भला होगा। दृष्टि अगर गलत हुई तो मेहनत और पैसा खर्च कर के भी मनचाहा फायदा होने वाला नहीं है ऐसा मुझे लगता है।