गाय-बैल न कटें, यह स्वच्छ सरकार के लिए ‘एसिड टेस्ट’

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Published On : 2018-04-20 22:14:36

गाय-बैल न कटें, यह स्वच्छ सरकार के लिए ‘एसिड टेस्ट’
अच्युत देशपांडे
भारत के सभी राजनीतिक पक्ष गला फाड़-फाड़कर भ्रष्टाचार खत्म करने की बात संसदीय चुनाव प्रचार के दौरान कर रहे हैं। हमें चुना गया और हमारे पक्ष की सरकार बनी तो हम देश को स्वच्छ शासन देंगे। ऐसी हरेक की प्रतिज्ञा है। इसमें शक नहीं कि स्वच्छ शासन राज्य और प्रजा दोनों के अस्तित्व को जीवन देने व जीवन के लिए नितांत आवश्यक है। किंतु भारत में जिन-जिन क्षेत्रों में भ्रष्टाचार चल रहा है, सबमें इसका अलग-अलग परिमाण है। किसी में पांच प्रतिशत तो किसी में दस प्रतिशत तो किसी में और कुछ, किंतु एक क्षेत्र ऐसा है और कोई भी आंख वाला आदमी इसे देख सकता है। जहां सौ फीसदी भ्रष्टाचार चलता है। शुरू से लेकर आखिरी तक निखालिस भ्रष्टाचार है। अन्य क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के जो शिकार होते हैं, वे कुछ शिकायत करते हैं, दख्र्वास्त करते हैं, अखबारों में खबर देते हैं, मोर्चा निकालते हैं और कुछ न हो तो चुनाव के वक्त अपनी कीमत का अहसास कराते हैं। इन कारणों से इनकी तकलीफों में कुछ कमी भी हो जाती है, किंतु यह भ्रष्टाचार एक ऐसे क्षेत्र में चल रहा है, जहां इसके शिकार की ओर से न कभी कोई शिकायत होती है न दख्र्वास्त दी जाती है न मोर्चें निकालते हैं और न जो कभी वोट रूप् में अपनी कीमत भी वसूल कर सकते हैं। हमारा आशय है भारत के गाय-बैलों से। जिनके लिए पशु संरक्षण कानून देशभर में बनाये गये हैं। इन पर जो जुल्म चलता है, वह बेमिसाल है। उसकी कहीं बराबरी या जोड़ नहीं। तो स्वच्छ शासन देने की प्रतिज्ञा करने वालों का यह क्षेत्र आह्वान करता है और चुनौती देता है कि स्वच्छ शासन की शुरुआत यहीं से की जाए। कोई अगर यह दलील दे कि यह तो जानवरों का मसला है और हमारी दिलचस्पी व फिक्र मनुष्य को लेकर है तो वह व्यक्ति भ्रम में है या वंचना कर रहा है। भ्रष्टाचार व सदाचार का क्षेत्र विभाजन नहीं हो सकता। मनुष्य के संबंध में भ्रष्टाचार ऐसा नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र या राज्यशास्त्र यहां चलने वाला नहीं। यह आत्मप्रवंचना ही है। यहां सामाजिक राष्ट्रीय जीवन की कुछ वास्तविकताओं के आधार से इनकी मर्यादा के अंतर्गत गाय-बैल जैसे पशुओं को जीने का अधिकार दिया। उन्हें कानूनी संरक्षण दिया तो केवल पशु नहीं रह गये बल्कि संरक्षित प्राणी है। उनका दर्जा मनुष्य के करीब का हो गया। मनुष्य की तरह इन पशुओं के संबंध में भी जंगल का कानून नहीं चलाया जा सकता और अगर इन पशुओं के संबंध में जंगल का कानून चलेगा तो फिर मनुष्य भी इसकी चपेट में आ जाना निश्चित है। यानी मानव समाज में भी जंगल का ही कानून चलेगा। जिसकी लाठी उसकी भैंस। अतः सदाचार और कदाचार भ्रष्टाचार का एक ऐसा कृ़ित्रम एवं भ्रामक विभाजन किया जाना कभी हितकर नहीं है। विडंबना और विपत्ति यह है कि ऐसे शतप्रतिशत के पीछे शास्त्र के तर्क का आधार लिया जाता है। इसमें अर्थशास्त्र का नहीं अनर्थशास्त्र का ही आधार एवं प्रेरणा है। देश के वर्तमान योजनाकारों, प्लैनर्स व कारोबार चलाने वालों की विकृत बुद्धि के कारण शतप्रतिशत भ्रष्टाचार कार्यक्रम को पूरा प्रोत्साहन एवं समर्थन मिला है और परिणामस्वरूप गाय-बैलों का तेजी से सफाया हो रहा है। इस संहार का कार्यक्रम में ज्यामितीय परिमाण प्रोग्रेशन से वृद्धि की जा रही है। सरकारी आंकड़ों का जाल जैसा भी भुलावा देना चाहे, कोई भी देख सकता है कि किसान जो राष्ट्र की रीढ़ रहा है, टूट रहा है और गांव उजड़ चले हैं, गांवों के रूप में जो बस्तियां नजर आ रही हैं, वे वस्तुतः नगरों के उपनिवेश हैं। उन नगरों के जो पूंजीवादी अर्थतंत्र व अमानवीय शोषण की पैदाइश है। इन बस्तियों में यहां के नगरों के भुलावे पाये जाएंगे या फिर उनके स्लम्स, गंदी बस्तियां लेकिन ग्राम का जीवन नहीं बचा है। जो भी चुनकर आते हैं और हुकूमत संभालते हैं, चाहे सरकार में हो, उसके समर्थन में हो या विरोधी पक्ष में। वे सब के सब मिलकर सरकार के ही हिस्से हैं तथा स्वच्छ शासन के लिए प्रतिबद्ध भी हैं। उनके सामने स्वच्छ शासन देने के क्रम में इतनी बड़ी समस्या और चुनौती को हकीकत में राष्ट्र को ही बचाने की समस्या और चुनौती हो खड़ी है। हम आशा और प्रार्थना करें कि उनमें यह अक्ल और हिम्मत जगेगी कि वे इस चुनौती को स्वीकार कर सही हल ढूंढने की कोशिश करेंगे। किसी भी उम्र के गाय-बैल न कटें, ऐसे संपूर्ण प्रतिबंध की शुरुआत ही वैसी कोशिश की ‘एसिड टेस्ट’ की असली कसौटी है।