गोरक्षा के साधन

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Published On : 2017-04-05 21:20:40

गोरक्षा के साधन

महामना पं.मदनमोहन मालवीय

दूध के उत्पादन में वृद्धि की आवश्यकता

भारत सरकार द्वारा दूध के व्यवसाय पर प्रकाशित रिपोर्ट में लिखा है, “मनुष्य के भोजन में दूध का व्यवहार तभी से चला आता है, जब से मानव इस जगत में आया है। जितने ऐसे खाद्य पदार्थ हैं, जो अकेले आहार के काम में आ सकते हैं, दूध सबसे अधिक पूर्ण है। इसीलिए वह सदा बड़ा आदरणीय समझा जाता रहा है। इसके अंदर जीवन केो स्थिर खने तथा बढ़ाने के लिए आवष्यक सभी तत्व सुपाच्य रूप में विद्यमान हैं। आज तक किसी ऐसे दूसरे स्वतंत्र आहार का पता नहीं चला, जिसका प्रयोग दूध के स्थान पर किया जा सके।

इसी रिपोर्ट के अंतर्गत ‘दूध के उत्पादन को बढ़ज्ने की संभावनाएं’’ शीर्षक में लिखा है,  “उचित भोजन और व्यवस्था के द्वारा भारतीय पषुओं के दूध का उत्पादन जल्दी ही पचास प्रतिषत के लगभग बढ़ाया जा सकता हैं इस कथन की पुष्टि इस बात से होती है कि देहाती गायें जब सरकारी फार्मों में लायी जाती हैं, तो आगे के ब्यानों में पहले की अपेक्षा साठ प्रतिषत अधिक दूध देती हैं। इन गायों की पहली संतानों के दूध में उनकी माताआं की अपेक्षा भी दस-पंद्रह प्रतिशत तक और अधिक वृद्धि देखी जाती है। गांवों में गौएं अधिक समय तक दूध नहीं देतीं, छुटी रहती हैं, फार्मों में पहुंच जाने पर उनके छुटे रहने का समय भी बहुत घट जाता है, जिसके परिणामस्वरूप् उसी अनुपात में दूध के उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है। इन आशाजनक लक्षणों से तथा इस बात से कि गौओं के बहुत से टोलों के दूध का उत्पादन बीस वर्ष से कम में वस्तुतः तिगुना हो गया है, यह बात सूचित होती है कि भारतीय गौओं को यदि अच्छा भोजन दिया जाय, चुने हुए सांडों से उन्हें गाभिन कराया जाए तथा रखने का उचित प्रबंध हो तो उनका दूध बहुत अधिक बढ़ सकता है।

प्रतिव्यक्ति दूध की खपत

किसी समय इस देश में दूध बहुत अधिक मात्रा में मिलता था। किंतु अब यह सोचकर बड़ा खेद होता है कि मनुष्य के आहार के ऐसे आवश्यक पदार्थ की खपत प्रतिव्यक्ति इस देश में शायद अन्य सभी सभ्य देशों की अपेक्षा कम है। भारत के पशु व्यवसाय की वृद्धि तथा भारत में दूध के व्यवसाय के संबंध में प्रकाशित हुई रिपोर्टों में अनेक परामर्ष दिए गए हैं, जो विचार करने योग्य हैं तथा जिन्हें ऐसे परिवर्तनों के साथ जो स्थानीय परिस्थिति के अनुसार आवश्यक हो, व्यवहार में लाना चाहिए।

‘भारत के दूध व्यवसाय पर जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है -

‘व्यवसाय की दृष्टि से दूध तथा दूध से बने हुए पदार्थों की मांग केवल शहरों में ही अधिक है। यद्यपि दूध देने वाले पशुओं  में पंचानवे प्रतिषत से अधिक गांवों में ही पाये जाते हैं तथा भारत की नब्बे प्रतिशत जनता (अब साठ प्रतिशत) गांवों में रहती है तो भी गांवों में दूध की मांग अपेक्षाकृत बहुत कम है अर्थात गांवों में दूध के ग्राहक अधिक नहीं हैं। इसके कई कारणों में से एक तो यह है कि दूध खाने वालों में से बहुतों के घर में दूध होता है, दूसरे नगरवासियों की अपेक्षा गांवों के किसानों में दूध खरीदने की सामथ्र्य कम होती है। उनमें से अधिकांष दूध या दूध से बने हुए पदार्थ खरीदकर नहीं खा सकते। वहां बहुत से लोगों को तो, जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, कभी दूध मिलता ही नहीं। यहां तक कि ऐसे इलाकों में भी जहां दूध का व्यवसाय होता है और जहां बहुत अधिक मात्रा में दूध होता है, सोलह प्रतिशत परिवार दूध या दूध से बने पदार्थों का बिलकुल उपयोग नहीं करते। ऐसी दषा में जहां दूध बहुत कम होता है, ऐसे भारतीय देहातों में तो दूध या दूध से बने पदार्थों को खरीद कर खाने की सामथ्र्य और भी कम होनी चहिए।’

भारत में पशुओं तथा दूध के व्यवसाय की वृद्धि के संबंध में जो रिपोर्ट छपी है, उसमें लिखा है -

‘यदि भारतीय जनता यह चाहती है कि उसे भोजन में दूध पर्याप्त मात्रा में मिले तो सबसे पहले यह आवष्यक है कि देश में दूध का उत्पादन बहुत अधिक मात्रा में बढ़ाया जाय। यह भी अनुमान किया गया है कि न्यूनतम आवष्यकतापूर्ति के लिए भी दूध का उत्पादन कम से कम दुगुना करना पड़ेगा। किंतु उत्पादन की इस वृद्धि से तब तक उद्देष्य सिद्धि न होगी जब तक कि दूध का भाव न घटा दिया जाए अथवा जनता की औसत आय में वृद्धि न हो। दूसरा उद्देष्य जिसे सदा ध्यान में रखना हेागा, यह है कि दूध का भाव इतना मंदा रहे कि उसे अधिकांश जनता खरीद सके।

खपत में वृद्धि की गुंजाइश

पर्याप्त गोचर भूमि की व्यवस्था, अच्छी नस्ल पैदा करने के लिए सांडों संख्या में वृद्धि तथा दूध की बिक्री का प्रबंध - इन तीनों बातों की इस समय सबसे अधिक आवश्यकता और उत्सुकतापूर्वक यह आषा की जाती है कि यथासंभव शीघ्र ही इन आवष्यकताओं की पूर्ति के लिए विषेश प्रयत्न किए जाएंगे।

गोचर भूमि

जैसा कि बार-बार बताया जा चुका है, पशुओं के ह्यस का एक मुख्य कारण पर्याप्त गोचर भूमि का न होना है। एक तो गोचर भूमि यों ही पर्याप्त नहीं है, उस पर अधिक शोचनीय बात यह है कि प्रतिदिन जमींदार एवं किसानों के लोभ के कारण इनका क्षेत्रफल कम होता जा रहा है। कई वर्ष पूर्व लेफ्टिनेंट कर्नल रेमंड ने कहा था कि बंगाल के सभी जिलाधीषों की रिपोर्ट बतलाती है कि बंगाल प्रांत के प्रायः सभी जिलों में गोचर भूमियों की संख्या कम कर दी गयी है, जिसके परिणामस्वरूप पषुओं की संख्या घट गयी है। श्रीयुत ब्लैकवुड ने कहा था कि निस्संदेह बंगाल में पशुओं की वृद्धि में सबसे मुख्य बाधा गोचरभूमियों की कमी है।’

ऐस कहा जाता है कि यूरोप के किसी भी देश की अपेक्षा भारत में भूमि का मूल्य सस्ता है। ऐसी दषा में आषा यह होनी चाहिए थी कि यहां पशुओं के चरने के लिए और देषों की अपेक्षा भूमि का अधिक भाग सुरक्षित रखा जाता पर बात ऐसी नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व गोचरभूमि और जोती हुई भूमि का अनुपात संयुक्त राज्य अमेरिका में 1ः16, जर्मनी में 1:6, इंग्लैंड में 1:3 तथा जापान में 1:6 था, किंतु भारत में केवल 1:27 था। भारत में गोचर भूमि का क्षेत्रफल बढ़ाने की आवष्यकता पर जितना अधिक जोर दिया जाए, उतना थोड़ा है।

सन 1913 में कृषि बोर्ड के सम्मुख गोचरभूमि न्यूनता का प्रश्न  विचार के लिए उपस्थित हुआ था। उक्त बोर्ड ने श्रीयुत एच.आर.सी.हेली की अध्यक्षता में विषेशज्ञों की एक समिति नियुक्त की। उस समिति ने निम्नांकित परामर्ष दिए -

1 गोचर भूमि के छोड़ने की व्यवस्था कानून द्वारा होनी चाहिए। पशु चारण के अधिकार पर सभी प्रकार से नियंत्रण अवांछनीय समझे जाना चाहिए। स्थानीय अधिकारियों तथा म्युनिसपल एवं जिला बोर्डों को चाहिए कि वे गोचर भूमियों की सीमा बांध दें तथा उन पर किसी का अधिकार न होने दें।

2 अनुपयोगी भूमि को खेती के योग्य बनाना। यह कार्य कृषि विभाग के निकट सहयोग से जंगल विभाग द्वारा व्यवस्थित रूप में होना चाहिए। और इस प्रकार खेती के योग्य बनायी हुई भूमि को गोचर भूमि के रूप में खुली छोड़ देना चाहिए।

3 वर्तमान गोचरभूमियों पर किसी का अधिकार न हो, इसके लिए कानून बनने चाहिए और ऐसे कानूनों द्वारा म्युनिसिपल एवं जिला बोर्डों को अधिकार दिए जाने चाहिए कि वे अपनी आय का एक भाग गोचर भूमियों को अधिकृत करने में व्यय करें।

4 सरकार तथा स्थानीय बोर्डों के खर्च से गोचरभूमियों को अधिकृत करना चाहिए।

कृषि के संबंध में सम्राट की ओर से एक कमीशन (जांच समिति) बैठा था, जिसने इस विशय पर विचार करके सन् 1928 में अपनी रिपोर्ट दी थी। कमषीन ने लिखा था -

‘पशुओं की रक्षा के संबंध में सबसे आवष्यक बात है - उनके भोजन की व्यवस्था। भारत में, जहां कि पशुओं को बांध कर खिलाने की प्रथा नहीं सी है, चराने की सुविधाओं पर ही मुख्य रूप् से विचार करना चाहिए। ऐसा कहा जा सकता है कि भारत के प्रायः प्रत्येक भाग में गांव के समीप की सार्वजनिक गोचरभूमि तथा घास के मैदानों में सामान्यतः आवष्यकता से अधिक प्षु चराये जाते हैं।’ कमीशन ने आगे चलकर लिखा है -

‘प्षुओं की उन्नति के लिए मुख्यतः दो बातों पर ध्यान देना आवष्यक है - खुराक और नस्ल। इनमें भी हम खुराक को प्रथम स्थान देते हैं क्योंकि जब तक प्षुओं को अच्छी तरह खिलाया-पिलाया नहीं जाएगा, तब तक संतानोत्पादन के तरीकों में कोई विषेश सुधार नहीं हो सकता। यह कोई आष्चर्यजनक बात नहीं है कि कमीशन के सामने के बयान देने वालों में से बहुतों ने गोचर भूमियों को बढ़ाने की सम्मति दी है। किंतु इस संबंध में जो कुछ हो सकता है, उसकी पूरी छानबीन करने के प्ष्चात हम लोगों ने यह मत स्थिर किया है कि वर्तमान गोचरभूमियों में अधिक वृद्धि की गुंजाइश नहीं है। अत हम लोगों को चाहिए कि जितनी भूमि मेें इस समय घास पैदा होती है, उसीकी उत्पादन शक्ति को बढ़ाने में अपना सारा प्रयत्न लगा दें। ऐसे प्रयत्नों के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र उपस्थित है।

मुक्तेसर में स्थित पशु चिकित्सा संबंधी राजकीय अनुसंधानशाला के डायरेक्टर श्री एफ.वेयर ने भारत की पशु चारण समस्या पर एक वक्तव्य तैयार किया थ, जिसे उन्होंने बोर्ड आफ एग्रिकल्चर एंड ऐनिमल हसबेंड्री की पशु प्रबंध शाखा की द्वितीय वार्षिक बैठक में उपस्थित किया था। उसमें उन्होंने लिखा है -

‘कृषि के संबंध में बैठाये गये शाही कमीशन की सन् 1928 की रिपोर्ट निकलने के बाद उस रिपोर्ट में विचारित कई बातों में अच्छी उन्नति हुई है, किंतु गो चारण ही एक ऐसा विषय है, जिसके संबंध में यह बात लागू नहीं होती। सन् 1929 में पुराने कृषि बोर्ड की अंतिम बैठक में इस विशय पर संक्षेप में विचार हुआ था। उसमें दो सामान्य प्रस्ताव ऐसे पास हुए थे, जिनमें वर्तमान गोचरभूमियों की रक्षा एवं उनके समुचित उपयोग पर जोर दिया गया था। किंतु अब तक बहुत ही कम स्थानों में गोचर भूमियों के सुधार के लिए कोई स्थायी प्रयत्न किया गया है।’

पशु चारण के लिए जंगली इलाकों के समुचित उपयोग के संबंध में जो प्राथमिक परामर्श सभा हुई थी, उसमें इस विषय पर विचार गया था। इस सभा की रिपोर्ट सन् 1936 में ‘बोर्ड आफ एग्रिकल्चर एंड एनिमल हसबेंड्री के सम्मुख उपस्थित हुई थी। उस पर बोर्ड ने अपनी निम्नलिखित सम्मति प्रकट की थी - अनुपयोगी भू भागों की उन्नति की संभावनाओं पर विष्वास करते हुए हमारा यह निश्चित मत है कि रायल कमीशन की कल्पना के अनुसार इन अनुपयोगी भूभागों का पुनर्वर्गीकरण किसी प्रांतीय सरकार के किसी एक विभाग पर नहीं छोड़ा जा सकता। हम सिफारिश करते हैं कि प्रत्येक प्रांत में एक स्थायी ‘चारा तथा पशु-चारण-समिति का निर्माण हो और उसके सदस्य वे अफसर हों, जो जंगल तथा माल (रेवेन्यू) के महकमों द्वारा इस काम के लिए नियुक्त किए जाएं तथा एक पशु प्रबंध विभाग अफसर हो। प्रत्येक प्रांत की यह स्थायी समिति इम्पीरियल कौसिंल आफ एग्रिकल्चरल रिसर्च की एक नवीन पशु चारण उपसमिति की प्रांतीय समिति के रूप् में काम करेगी। और तब यह उप समिति सारे भारतवर्ष के लिए सुव्यवस्थित रूप् में काम कर सकेगी। यद्यपि यह समस्या भारतभर की समस्या है तथापि इसे हल करने का तरीका प्रत्येक प्रांत के लिए अलग-अलग होगा। प्रांतीय चारा तथा पशुचारण समिति का कर्तव्य है कि वह सरकारी जंगलों के बाहर अनुपयोगी भूभागों के पुनर्वर्गीकरण की जांच करे तथा ऐसे भूभागों को चुने, जिनमें चारा उग सकता हो अथवा जिनकी गोचरभूमि के रूप् में व्यवस्था की जा सके। समिति को ऐसे भूभागों के अधिकार तथा प्रबंध के विषय में प्रस्ताव भी उपस्थित करने चाहिए। डाक्टर एन.सी.राइट ने भारत में पशुओं के व्यवसाय तथा दुग्ध व्यवसाय की उन्नति पर सन् 1937 में जो रिपोर्ट उपस्थित की थी, उसमें चारा तथा पशुचारण समितियों के निर्माण के प्रस्ताव का जोरदार समर्थन किया है। यह अत्यधिक वांछनीय है। ऐसी समितियां प्रत्येक जिले में बनें, जिनमें कुछ गैर सरकारी, स्थानीय कृषिकार, जमींदार तथा आसामी अपने-अपने हल्कों में काम करने के लिए सम्मिलित कर लिए जाया करे। सबसे पहले आवश्यकता इस बात की है कि भिन्न-भिन्न प्रांतों तथा राज्यों के सरकारी अफसरों और कृषि से संबंध रखने वाली साधारण जनता के मस्तिष्क में यह विष्वास बैठा दिया जाए कि कृषि प्रधान भारत की आर्थिक समस्याएं हल ‘मिश्रित खेती’ की प्रणाली को ग्रहण करने पर निर्भर करता है। इस प्रणाली के अनुसार किसान अपनी साधारण खेती चालू रखते हुए साथ-साथ गाय बैल भी पालेंगे तथा प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि देशभर में गोचरभूमियों की पर्याप्त वृद्धि हो और पर्याप्त मात्रा में चारे की खेती हो।

नस्ल

अब हमें नस्ल के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। एक सामान्य कहावत है कि भोजन से अधिक प्रभाव नस्ल का पड़ता है। अच्छी नस्ल का मूल्य आंका नहीं जा सकता। श्री नीलानंद चटर्जी कहते हैं कि अच्छी जाति के सांडों से नस्ल पैदा कराने में दो लाभ हैं। पहला लाभ तो यह है कि हमें बछड़े उत्तम श्रेणी के मिलते हैं। दूसरा लाभ, जो सबसे अधिक महत्व का है और जिसका फल तुरंत मिलता है, यह है कि गाय का दूध बढ़ जाता है। स्थायी लाभ इसमें है कि नस्ल की उन्नति के लिए उसी जाति के उत्तम सांड द्वारा गाय को बरधारया जाय। नस्ल का वास्तविक सुधार उत्तम से उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्लों की उन्नति करने में है न कि एक जाति की गौ को दूसरी जाति के सांड से बरधाने में अथवा विदेशी रक्त का मिश्रण कराने में। इंग्लैंउ तथा आस्ट्रेलिया सांडों से नस्ल उत्पन्न कराने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं।

सरकारी फार्मों से उत्तम जाति वाले सांडों के वितरण के संबंध में शाही कमीशन ने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि देश के पशुओं की आवश्यकता को देखते हुए सन 1926 तक इस दिशा में बहुत कम प्रगति हुई है। कमीशन ने गणना करके बताया कि प्रतिवर्ष दो लाख सांडों को वितरित करने की आवश्यकता थी, किंतु बड़े-बड़े प्रांतों में वास्तव में 500 से कुछ ही अधिक सांड प्रतिवर्ष बांटे गए। यद्यपि प्रतिवर्ष सरकारी फार्मों से बांटे जाने वाले सांडों की संख्या लगभग दुगुनी कर दी गयी है, फिर भी भारत को जितने सांडों की आवश्यकता है, कुल मिलाकर उनका एक क्षुद्र अंश ही अब तक बांटा गया है।

सूरज सांड

भारत में गायों को बरधाने की कोई व्यवस्थित प्रणाली न होने के कारण उसके अभाव की पूर्ति अति प्राचीनकाल से सूरज सांड से की जाती रही है। हिंदूलोग इन सांडों को अपने संबंधी की मृत्यु के ग्यारहवें दिन छोड़ा करते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए सांडों का कार्य केवल गोवंश की वृद्धि करना है। धर्मशास्त्रों में यह विधान किया गया है कि ऐसे सांडों को जिस काम के लिए छोड़ा जाता है उसके अतिरिक्त न तो उनसे हल चलाने का काम लिया जा सकता है और गाड़ी में जोतने का और न कोई अन्य काम ही लिया जा सकता है। उन्हें खूब अच्छी तरह खिला-पिलाकर स्वतंत्र घूमने के लिए छोड़ देना चाहिए, जिससे उन्हें पर्याप्त व्यायाम मिले और वे स्वस्थ्य तथा बलवान बने रहें। यह प्रथा अब तक कई स्थानों में प्रचलित है। किंतु बंगाल के कृषि विभाग के डायरेक्टर श्री टी.आर.ब्लैकवुड, आईसीएस ने यह लिखा है कि प्रांतभर में ऐसा एक भी जिला नहीं है, जिसमें गोवंश की वृद्धि के लिए अच्छे सांड पर्याप्त संख्या में उपलबध हों। उनका यह विचार ठीक ही है कि पवित्र समझे जाने वाले सूरज सांडों द्वारा नस्ल पैदा करने की हिंदुओं की पुरानी प्रथा स्वयं पशुओं के दृष्टिकोण से बहुत अच्छी थी, क्योंकि इसका परिणाम यह होता था कि उन्हें खुला छोड़ देने का परिणाम भी यह होता था कि लोग उन्हें अच्छी तरह खिलाते-पिलाते थे तथा उन्हें पर्याप्त व्यायाम भी मिल जाता था।

श्री नीलानंद चटर्जी का कहना है - पशुओं के नस्ल सुधार के विशय पर ‘इम्पीरियल बोर्ड आफ एग्रिकल्चर’ द्वारा कई बार विशेषकर 1913 तथा 1917 में विचार हो चुका है तथा भारत के विभिन्न प्रांतों के पशु चिकित्सा विभाग के डायरेक्टरों तथा सुपरिंटेंडेंटों ने भी इस विषय पर मननपूर्वक विचार किया है। संक्षेप में उन लोगों के परामर्श निम्नांकित हैं।

1 सूरज सांड किसी की संपत्ति नहीं हैं, अदालतों द्वारा दिए हुए इस प्रकार के निर्णय के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए कानून द्वारा सूरज सांडों का अधिकार म्युनिसिपल्टी, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड तथा स्थानीय सभाओं को सौंपकर उन्हें इस बात के लिए बाध्य करना चाहिए कि वे अपनी-अपनी सीमा के भीतर पशु संख्या तथा आय के अनुपात से नस्ल वृद्धि के लिए कम से कम थोड़े से उत्तम सांडों को अपने खर्च से रखें अथवा एक उचित रकम सहायता के रूप् में देकर किसी सार्वजनिक या व्यक्तिगत संस्था द्वारा उनके भरणपोषण की व्यवस्था करायें।

2 विशेषकर नस्ल बढ़ाने के उद्देष्य से सांड रखने के विचार को प्रोत्साहन देने के लिए पूरा प्रयत्न करना चाहिए तथा डिस्ट्रिक्ट बोर्डों को चाहिए कि वे जितने सांड चाहें रख सकें।

3 इस बात को बार-बार दुहराया जा चुका है कि नस्ल में वास्तविक सुधार उत्तम से उत्तम देशी पशुओं द्वारा स्थानीय नस्ल के सुधार से ही संभव है। संकर जाति की नस्ल उत्पन्न करके या विदेशी रक्त का मिश्रण करने से नहीं। इंग्लैंड तथा आस्ट्रेलिया के सांडों से नस्ल उत्पन्न करने के प्रयत्न अधिकांश असफल ही रहे हैं। मेजर वाल्डे का कहना है कि मुख्यतया आसपास की सभी नस्लों का ह्रास हुआ है तथा कर्नल एच.ईवंस के कथनानुसार बर्मियों की संकर जाति की संतान पैदा न करने की नीति ही बर्मी पशुओं के अत्युत्तम गुणों को बनाये रखने में सहायक हुई है।

4 भारत के कृषि बोर्ड के सन् 1919 के कार्य विवरण में कर्नल जी.के.वाकर तथा सर्वश्री जैकब, वुड, मेकेंजी, नाइट एवं टेलर ने कहा है कि पूर्ण शक्ति के साथ पशु वृद्धि के व्यवसाय को प्रोत्साहन देना तथा उसकी वृद्धि करना सरकार का मुख्य कर्तव्य है।

(क) सरकारी पशु पालन शालाओं की संख्या में वृद्धि करना।

(ख) सरकार को चाहिए की वह उत्तम से उत्तम नस्ल के देशी पशुओं का पालन करे तथा इन नस्लों की रक्त शुद्धि बनाये रखे।

(ग) पशु-वृद्धि के लिए भूखण्डो को निर्धारित करना तथा उनकी रक्षा करना।

(घ) सरकारी या दूसरे प्रमाणित फार्मों से उत्तम श्रेणी के पशुओं का विरण।

सूरज सांड किसी की भी संपत्ति नहीं है

हाईकोर्ट के द्वारा दिए हुए इस प्रकार के निर्णयों के दुष्परिणामों को रोकने के लिए अब तक कोई कानून नहीं बना। इस प्रकार का कानून यथासंभव शीघ्र बन जाना चाहिए। अन्य प्रस्तावित उपायों को भी समूचे भारत वर्ष की आवश्यकता के अनुसार थोड़े या अधिक पैमाने पर अमल में लाना चाहिए।

पशुवध की रोक

किंतु सबसे महत्व का प्रश्न, सब प्रश्नों का एक प्रश्न है - पशुओं की निर्बाध हत्या। ऐसा केवल भारत में ही संभव है। संसार के अन्य किसी सभ्य देश में इस प्रथा को एक दिन के लिए भी प्रोत्साहन नहीं मिल सकता। श्रीनीलानंद चटर्जी लिखते हैं - क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक अच्छी स्वस्थ, जवान गाय का भी, जो छुटाने के समय तक प्रतिदिनि लगभग ढाई सेर दूध देती है, बेखटके वध कर दिया जाता है ? कलकत्ते की एक म्युनिसिपल पशुवध शाला में मैंने अपनी आंखों ऐसा होते देखा है। इस प्रकार का केवल यही एक उदाहरण नहीं है। कलकत्ते की म्नुनिसिपल पशु वधशाला में ऐसी-ऐसी पांच सौ (आजकल तो ज्यादा) गायों का वध प्रतिदिनि होता है। सोचिये, कलकत्ते में कई पशुवध शालाएं हैं तथा भारत में कई ऐसे नगर और कस्बे हैं, जहां बारह महीनों गोवध का कार्य चालू रहता है। खोज करने से पता चला है कि मारे जाने वाले पशुओं में से सत्तर से नब्बे प्रतिशत तक पशु छोटी अवस्था में ही मार दिए जाते हैं और बजाय इसके कि वे दस या बारह वर्ष तक और जीकर मनुष्य को लाभ पहुंचाते, पहले या दूसरे ब्यान के बाद ही मार डाले जाते हैं। इस प्रकार जो थोड़े से उत्तम श्रेणी के पशु बचे रहते हैं, वे भी समय से पहले ही मार दिए जाते हैं।

पशुओं के ह्रास विषय पर लिखने वाले कई विद्वानों का कहना है कि दूध देने वाले पशुओं का वध इस ह्रास का मुख्य कारण है। इस विषय पर भी श्री नीलानंद चटर्जी के निम्नांकित कथन की ओर ध्यान देना चाहिए। वे लिखते हैं -

इस देश में अंग्रेजों के आने के पूर्व गोवध प्रायः नहीं था। यह सच है कि मुसलमानी राज्य में कुछ मुसलमालन गोमांस खाते रहे होंगे, किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी तथा वध न किए जाने वाले पशुओं की संख्या तो बिलकुल नगण्य थी। यहां तक कि आज भी जो अच्छे और उच्च वर्ग के मुसलमान हैं वे गोमांस को छूने तक में अपनी हतक तथा अपमान समझते हैं। वे मुख्यतः मेढ़े अथवा बकरे का मांस खाते हैं। भारत का जलवायु गोमांस भक्षण के अनुकूल नहीं पड़ता। मुसलमानों के गोमांस से परहेज करने में यह एक मुख्य कारण है,  दूसरा कारण है, जो इससे कम महत्व का नहीं है, हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के प्रति आदर का भाव था। इस भाव की प्रतिध्वनि हमें इस बीसवीं सदी में सुनायी पड़ी थी। जबकि अफगानिस्तान के स्वर्गीय अमीर हबीबुल्लाह साहब भारत में पधारे थे तथा ईद के अवसर पर दिल्ली में इस विषय पर उन्होंने भाषण दिया था। उन्होंने मुसलमानों से कहा था, “यद्यपि परंपरा के अनुसार मेरे सत्कार में आप लोगों को सौ गायों की कुर्बानी करनी चाहिए, किंतु एक भी गाय की कुर्बानी मत कीजिए। आप लोगों को दिल्ली या भारत के किसी भी भाग में मेरे नाम पर गाय की कुर्बानी या और कोई ऐसा धार्मिक कृत्य नहीं करना चाहिए जिससे सम्राट एडवर्ड के साम्राज्य की हिंदू प्रजा को पीड़ा या दुःख हो। क्यों ? क्या बकरे पर्याप्त नहीं हैं ? क्या दिल्ली की जुमा मस्जिद में कुर्बानी करने के लिए पर्याप्त ऊंट नहीं हैं ? मैं आप लोगों के साथ ईद का महत्वपूर्ण त्योहार मनाने जा रहा हूं। यदि आप लोगों की इच्छा हो तो बकरों की कुर्बानी कर सकते हैं। किंतु यदि एक भी गाय का वध हुआ तो मैं सदा के लिए आप लोगों से तथा दिल्ली से मुंह फेर लूंगा। यदि मैं आज्ञा दे सकता हूं तो मेरी बात मानिये, नहीं तो कम से कम मेरी प्रार्थना पर अवष्य ध्यान दीजिए।

कुछ ही दिनों से अंग्रेज सैनिकों तथा अपेक्षाकृत निम्नवर्ग की यूरोपियन तथा यूरेशियन जनता द्वारा अधिक मात्रा में गोमांस की खपत होने लगी। पिछला महायुद्ध छिड़ने के समय तक यह पशु वध बराबर बढ़ता ही गया। उस समय युद्ध के लिए बहुत से सिपाही भारत से बुला लिए गये, जिसके परिणामस्वरूप पशुवध में थोड़ी-सी कमी आ गयी। किंतु यह कमी थोड़े ही समय के लिए थी, क्योंकि पशुवध की संख्या फिर बढ़ती पर है। युद्धकाल में कितना गोवध हुआ, यह बताना बहुत ही कठिन है।

आगे चलकर चमड़े का व्यवसाय तथा सूखे मांस के व्यापार के लिए गौओं का वध होने लगा। इन सब कारणों ने मिलकर इस देश में वध होने वाले पशुओं की संख्या में भीषण वृद्धि कर दी।

गोवध के विरुद्ध हिंदूमात्र की प्रबल धार्मिक भावना प्रसिद्ध है। अतः उसके विषय में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। खेद की बात है कि हिंदुओं की इस धार्मिक भावना तथा विरोध पर कोई धान न दिया जाकर गोवध बराबर जारी है। बड़े नगरों तथा कस्बों में हिंदुओं को प्रतिदिन प्रातःकाल छाती पर पत्थर रखकर बहुसंख्यक गौओं को वधशाला की ओरे ले जायी जाती हुई देखना पड़ता है। गाय से मनुष्य जाति को इतने महान लाभ होते हैं कि उनकी गणना नहीं हो सकती, उन्हें सभी जानते हैं, अतः उन्हें दुहराने की आवश्यकता नहीं है। गाय हमें वह दूध देती है, जो मनुष्य को प्राप्त होने वाले आहारों में सबसे पूर्ण है - यह बात वैज्ञानिक खोजों द्वारा सिद्ध हो चुकी है। ऊपर बतलाया जा चुका है कि दूध मनुष्य के भोजन का एक आवश्यक अंग है। यह दूसरे आहारों की त्रुटियों को पूर्ण कर देता है। दूध के अभाव की पूर्ति करने वाला कोई दूसरा आहार नहीं है। राष्ट्र के शारीरिक विकास के बनाये रखने के लिए तथा राष्ट्र के स्वास्थ की उन्नति के लिए यह आवश्यक है कि धनी-निर्धन सबको पर्याप्त मात्रा में दूध मिले। गाय देश को बैल भी देती है, जो हमारे खेत जोतते और हमारे छकड़े खींचते हैं। भारत की खेती में पशुओं से जो सहायता मिलती है, उसका सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग उनकी शारीरिक सेवा है। भारत में कृषि संबंधी जो शाही कमीशन बैठा था, उसके कथनानुसार बिना बैल के खेती नहीं हो सकती। बिना बैलों के पैदावार एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं पहुंचायी जा सकती। बैलों की रक्षा इसीलिए की जाती है कि वे कृषि के लिए अनिवार्य हैं। यूरोप के देशों में लोग दूध देने वाले पशुओं के वध की बात सहन नहीं कर सकते। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो कानून द्वारा उसे दण्ड दिया जाता है अथवा वह समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है। किंतु यहां इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां के सबसे अधिक दूध देने वाले पशु नगरों में भेजे जा रहे हैं और वहां जब उनका दूध कम हो जाता है, तो उनका बड़ी संख्या में वध कर दिया जाता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि उत्तम गायों की संख्या घट रही है। श्रीनीलानंद चटर्जी ने उपर्युक्त बातें कई वर्ष पूर्व लिखी थीं। तब से आज की स्थिति और भी अधिक शोचनीय एवं भयानक हो गयी है।

बम्बई सरकार ने एक ‘पशु विशेषज्ञ समिति’ नियुक्त की थी, जिसने सन् 1939 में अपनी रिपोर्ट लिखी थी। समिति ने लिखा है -

‘समिति का यह मत है कि वर्तमान परिस्थिति में, जिसके कारण दूध के लिए पशु नगरों की सीमा के भीतर रखे जाते हैं, उपयोगी पशुओं के वध को रोकने के लिए कानून बनना आवश्यक है। किंतु समिति इस बात पर जोर देती है कि यदि नगरों की सीमा के बाहर सरकार या म्युनिसिपल्टी आदि के द्वारा दूध की पैदावार के हल्कों की स्थापना का उचित प्रबंध हो जाय, जहां दूध का व्यवसाय करने वाले दूध इकट्ठा कर सकें, दूध देने वाले पशुओं का पालन एवं वृद्धि कर सकें तथा छूटे पशुओं का तब तक पालन कर सकें जब तक कि वे फिर दूध न देने लगें, तो उपयोगी पशुओं के वध की समस्या बहुत कुछ हल्की हो जाएगी तथा यह भी संभव है कि यथासमय यह समस्या रह ही न जाय। दूसरे शब्दों में समिति का यह मत है कि दूध देने वाले उपयोगी पशुओं का वध नगर के भीतर दूध का व्यवसाय चलाने की प्रचलित प्रथा का प्रत्यक्ष परिणाम है। समिति बड़े जोरदार शब्दों में यह बतलाना चाहती है कि दूध देने वाले पशुओं की रक्षा तथा प्रांत में संतोषजनक स्थानीय दुग्ध व्यवसाय की वृद्धि के लिए बरती जाने वाली नीति में सबसे प्रथम और अत्यंत आवश्यक बात यह होनी चाहिए कि प्रचलित प्रणाली में परिवर्तन करके दूध का व्यवसाय क्षेत्र नगर की सीमा से बाहर कर दिया जाए।’

सन 1917 में अखिल भारतवर्षीय गो सम्मेलन संघ कलकत्ता के प्रमुख श्री सर जान वुडरफ की प्रेरणा से कई म्युनिसिपल्टियों ने उपयोगी पशुओं के वध में नियंत्रण लगाने का निश्चय किया था। किंतु सरकार ने उनके प्रस्तावों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि वर्तमान कानून के अनुसार ऐसे प्रस्तावों को कार्यरूप में लाना न्याययुक्त नहीं है।

जब कलकत्ता म्युनिसिपल्टी का बिल धारा सभा के सम्मुख उपस्थित हुआ, तब नीलानंद चटर्जी तथा कुछ अन्य मित्रों ने उस बिल में एक धारा बढ़ाकर इस कानूनी त्रुटी को दूर करने की चेष्टा की। उस धारा के द्वारा कलकत्ते के कारपोरेशन को यह अधिकार दिया गया था कि आवश्यकतानुसार वह उपयोगी पशुओं के वध पर रोक लगा सके। किंतु यूरोपीयन और मुसलमान सदस्यों द्वारा उस प्रस्ताव का समर्थन न होने से वह प्रस्ताव गिर गया। गाय तथा बछड़ों को उनके जीवन के प्रारंभ में ही वध कर देने की बुरी प्रथा बिना किसी रोकथाम के जारी है!

हिंदुओं की धार्मिक भावना को मार्मिक चोट पहुंचाने के साथ-साथ गोवध की प्रथा ने सारे भारतवर्ष तथा इसमें रहने वाली सभी जातियों को अतुल आर्थिक क्षति पहुचायी है। राष्ट्रहित के लिए यह आवश्यक है कि समस्या की गंभीरता का अच्छी प्रकार अनुभव किया जाय तथा दूध देने वाली गाय और उसकी संतान - बैलों एवं सांडों की रक्षा के लिए सरकार या उसके द्वारा नियुक्त अन्य कमेटियों द्वारा आमंत्रित विशेषज्ञों  के बताये हुए उपायो अथवा अन्य उपयुक्त समझे जाने वाले साधनों को काम में लाया जाय। अवश्य ही शांतिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार का कार्य तो प्रचुर मात्रा में बराबर चलता रहना चाहिए। प्रजा के सभी वर्गों के समर्थन से जीवदया संबंधी आवष्यक कानून बन जाय - इसके लिए शांतिपूर्ण शिक्षात्मक प्रचार कार्य प्रचुर मात्रा में निरंतर चालू रखने की आवष्यकता है।

जिन तथ्यों की ओर मैंने पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है, उनको दृष्टि में रखते हुए मैं निम्नलिखित परामर्श उनके सामने प्रस्तुत करता हूं:

उपाय:

1 सारे देश में खेती एवं गोपालन की सम्मिलित प्रणाली को प्रचलित करने के लिए देशव्यापी प्रयत्न होना चाहिए।

2 प्रत्येक किसान को एक या एक से अधिक गाय अपने घर में रखने तथा गाय और बैलों की नस्ल बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन तथा सहायता दी जानी चाहिए। अधिक जनसंख्या वाले नगरों में लोगों को सामुदायिक प्रयत्न से गोशाला अथवा डेरियां स्थापित करने के लिए उत्साहित करना चाहिए।

3 प्रत्येक जिले में ‘चारा तथा पशु-चारण-समितियों  की स्थापना होनी चाहिए।

4 गांव के पशुओं के चरने के लिए यथेष्ट गोचर भूमि कानूनन अलग छूटी रहनी चाहिए।

5 सूरज सांड किसी की संपत्ति नहीं है - इस विषय में दिए हुए हाई कोर्ट के निर्णयों केा व्यर्थ करने के लिए कानून बनाना चाहिए।

6 काफी बड़े परिणाम में अच्छे सांडों की नस्ल बढ़ाने के कार्य को प्रोत्साहन देना चाहिए।

7 जवान गायों के वध को रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि बूढ़ी गाय, सांड और बैलों के वध को भी रोकने के लिए कानून बनना चाहिए।

8 बम्बई, कलकत्ता, मद्रास, लाहौर तथा दूसरे बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की मांग पूरी करने के लिए नगरों की सीमा के बाहर दूध व्यवसाय के क्षेत्रों की स्थापना होनी चाहिए।

9 पशु चिकित्सा शाला तथा दातव्य औषधालयों का प्रबंध पर्याप्त संख्या में होना चाहिए।

10 अधिक दूध उत्पन्न करो और खूब दूध पियो का आंदोलन सारे देश में चलना चाहिए।

11 अधिक दूध उत्पन्न करने, खपत करने और गोवध को बंद करने की आवश्यकता के विषय में सरकारी महकमों तथा गैरसरकारी संस्थाओं को परस्पर मिलकर शिक्षात्मक प्रचार करना चाहिए।

12 सरकार तथा सार्वजनिक संस्थाओं को चाहिए कि वे वर्तमान या भावी गोशालाओं के उपयोग के लिए निःशुल्क गोचर भूमि प्रदान करें।

यदि ये उपाय काम में लाये गये तो राष्ट्र के स्वास्थ्य तथा भारतीय जनता की आर्थिक उन्नति के लिए एक नया युग उत्पन्न हो जाएगा।