Gau Hatya Bandi Aur Vinobajee kee Tapasya गोहत्या-बंदी और विनोबाजी की तपस्या

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Published On : 2017-10-23 20:49:59

गोहत्या-बंदी और विनोबाजी की तपस्या

कालिंदी

बहुत खुशी की बात है कि तारीख 3 मार्च 2015 को महाराष्ट्र में गोवंश की हत्या पर प्रतिबध लगाने वाला कानून बन गया। भारतीय संविधान में समाविष्ट गोवंश प्राणी रक्षा के तत्व की प्रतिष्ठा की रक्षा हुई। महाराष्ट्र की सरकार, माननीय राष्ट्रपति तथा अनेक गोवसेवक श्रेय के अधिकारी हैं तथा बधाई के पात्र हैं।याद आ रही है एक छोटी-सी सर्वश्रुत कहानी! भगवान सूर्यनारायण कुछ काल छुट्टी पर जाने वाले थे और तब उनका काम करने के लिए किसी की जरूरत थी। भगवान ने अपने बड़े-बड़े सहकारियों से लेकर छोटे से छोटे से सेवक तक सभी से पूछा, कौन करेगा मेरा काम ? तमाम सबने चुप्पी साध ली। घने अंधकार को हटाने का जानलेवा काम था, कौन करेगा यह साहस ? कोई आगे नहीं बढ़ रहा था। और सहसा एक छोटा-सा मिट्टी का दीया सामने आया, बोला, ‘भगवन्, मैं करूंगा आपका काम!’ अंधकार न होने देने का, आलोक कायम रखने का काम उस छोटे-से दीपक ने किया। किसी को इस बात का पता तक न चला। महत्व ही महसूस नहीं हुआ और परवाह भी नहीं! दीपक को, लेकिन पूरा संतोष था कि उसने अपनी शक्तिभर आलोक देने का काम किया।

<span style="\&quot;font-size:" 14px;\"="">पिछले 33 वर्षों से मुंबई के देवनार कत्लखाने के गेट पर संपूर्ण गोवंशहत्या-प्रतिबंधक कानून बनाने की मांग करने वाला सत्याग्रह चल रहा था - 3 मार्च की मध्यरात्रि तक! सत्याग्रही तभी वहां से हटे, जब ट्रकों को लेकर पुलिस वहां आयी। काटने के लिए लाए गए बैलों को ट्रकों में भरा गया और वहां बैलों को काटने का काम प्रतिबंधित हो गया। गायों की कटाई पर तो कानूनन प्रतिबंध था ही, इसलिए वहां सिर्फ बैल ही काटे जाते हैं। आज प्रसार-माध्यमों को देवनार के इस दीपक की याद भी नहीं आएगी। लेकिन इस विषय में जब सर्वत्र लगभग अंधकार ही था, कितने ही गाय-बैल देश में रोजाना कट रहे थे, हजारों टन गोमांस निर्यात हो रहा था, तब इस विषय की ओर ध्यान खींचने वालों में, सतत जागृत करने वालों में देवनार का सत्याग्रह निश्चित ही अग्रक्रम पर रहा है।

सब जानते हैं, इस सत्याग्रह के प्रेरणापुरुष थे विनोबा जी! उनके असाधारण प्रयासों से अंतरिम परिपाक था देवनार का सत्याग्रह। सर्वप्रथम 1976 में उन्होंने इस संदर्भ में अपनी वेदना जाहिरा तौर पर व्यक्त की थी। 25 अप्रैल 1976 को आचार्यकुल का सम्मेलन विनोबा जी की सन्निधि में संपन्न हुआ था। तब आचार्यों को संबोधित करते हुए उन्होंने गोरक्षा पर जोर देते हुए कहा था कि इसकी जिम्मेवारी आचार्यों को उठानी चाहिए। उसके बाद तारीख 17 मई को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री शंकरराव चव्हाण विनोबाजी से मिलने आए थे। उस समय भी विनोबाजी ने देश के विकास की दृष्टि से गोहत्या-बंदी की आवश्यकता पर बहुत बल दिया और कहा कि, ‘‘यदि यह कार्य शीघ्र संपन्न नहीं हुआ तो मुझे आमरण अनशन करना होगा।’’ और फिर 29 मई को कार्यकर्ताओं से बाते करते हुए स्पष्ट शब्दों में जाहिर किया कि, ‘‘यदि देशभर में गोहत्याबंदी का निश्चय जाहिर न हुआ तो मैं 11 सितंबर से आमरण उपवास शुरू करूंगा।’’

विनोबाजी का संकल्प जाहिर हुआ और वह समूचे भारत के चिंता और चिंतन का विषय बन गया। चारों ओर से संकल्प के प्रति सद्भावनाएं व्यक्त होने लगीं। 11 अगस्त 1976 को बड़ी तादाद में जनता ने भगवत्-प्रार्थना के रूप में पूरे दिन का उपवास रखा और प्रार्थना की। जनता-जनार्दन का आशीर्वाद मिला। आखिर केंद्रीय तथा राज्य सरकारों ने भी अपना निर्धार जाहिर कर दिया। पश्चिम बंगाल तथा करेल, दो प्रदेशों को छोड़कर पूरे देश में गाय की हत्या पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून बनाने का आश्वासन मिल गया। और पश्चिम बंगाल और केरल, इन दो सरकारों की ओर से भारत सरकार ने विनोबाजी को अभिवचन दिया कि इन दो प्रदेशों में भी एक साल की अवधि में 11 सितंबर 1977 तक ऐसे कानून बन जाएंगे।

विनोबाजी उपवास की पूर्व तैयारी के रूप में 1 अप्रैल से आधा ही आहार ले रहे थे। मानो एक तरह से उनका सौम्यतम सत्याग्रह ही चल रहा था। सरकार के उपर्युक्त आश्वासन के बाद वे पूर्ण आहार लेने लगे। इस तरह 1976 में भारत में गाय की हत्या पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून बना, वह विनोबाजी के इन प्रयासों के, उपवास के संकल्प के कारण।

फिर भी, इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी काम तो पूरा हुआ नहीं था। दो प्रदेशों में गायों की हत्या हो रही थी। विनोबाजी गोसेवकों को इस बारे में सतत सचेत करते रहे। सभी कार्यकर्ता उसके लिए प्रयत्नशील थे।

विनोबाजी ने 2 अक्टूबर 1978 के दिन एक निर्णय लिया था कि अब आम सभाओं में या कार्यकर्ताओं की बैठकों में वे बोलेंगे नहीं। कुछ दो-एक अपवाद इसके लिए रखे गए थे। गोसेवा संघ के मंत्री की ओर से अनुरोध किया गया कि गोसेवा के बारे में बोलने का भी अपवाद रखा जाए। विनोबाजी का जवाब था - ‘गोसेवा के विषय में बाबा को बोलने का अब कुछ रहा नहीं है। आवश्यकता हो, तब उपवास करना पड़ेगा। और वह बाबा करेगा।’’

और वैसा समय आ ही गया। 20 नवंबर 1978 को गोसेवा-संघ के मंत्री तथा अन्य सेवकों ने अपने काम की जानकारी विनोबाजी को दी, उसमें यह बात भी अधोरेखित हुई कि शासन की ओर से दिए गए अभिवचन को दो साल बीत जाने पर भी पश्चिम बंगाल तथा केरल की सरकारें गोहत्या-प्रतिबंधक कानून बनाने के बारे में गंभीरता से सोच नहीं रही हैं। और विनोबाजी ने जाहिर किया कि अगर इन दो प्रदेशों में 31 दिसंबर 1978 तक कानून नहीं बनता है तो तारीख 1 जनवरी 1979 से वे आंशिक उपवास प्रारंभ करेंगे - केवल पानी और शहद ग्रहण करेंगे। और तारीख 25 नवंबर 1978 को यह भी जाहिर किया कि इससे भी कार्यसिद्धि न हुई तो वे पूर्ण उपवास करेंगे - ‘‘गोहत्या-बंदी के लिए आत्माहुति का संकल्प बाबा ने किया है। आखिर गाय की रक्षा तो भगवान ही करेगा। लेकिन हमें अपना कर्तव्य कर लेना चाहिए।’’

मार्च की 3 तारीख को उन्होंने गोहत्या-बंदी के लिए सत्याग्रह का आह्वान करते हुए जाहिर किया कि 21 अप्रैल तक पश्चिम बंगाल और केरल में कानून नहीं बनते हैं तो 22 अप्रैल से बाबा का आमरण अनशन करने का संकल्प कायम है।

आखिर 22 अप्रैल की सुबह आयी। गोसेवकों की ओर से प्रयत्नों की पराकाष्ठा करने पर भी सरकार ने अपने अभिवचन की पूति नहीं की और विनोबाजी की उपवासरूपी प्रार्थना प्रारंभ हो गयी। सुबह सात बजे का आहार लेने से पहले उन्होंने कहा, ‘‘बाबा अभी अपना आहार नित्य की तरह लेगा। उसके बाद अनशन शुरू होगा हमेशा के लिए - आमरण।’’ उस आहार में नित्य की तरह 15 तोला दूध, 3 तोला छेना तथा दो तोला शहद था। अब विनोबाजी केवल पानी लेने वाले थे। बाकी पूर्ण उपवास। उस समय अपने छोटे से भाषण के अंत में उन्होंने कहा था - ‘‘अब बाबा हमेशा के मुताबिक भाषण की समाप्ति करते हुए ‘समाप्तम् जय जगत’ नहीं कहेगा, ‘‘आरब्धम् जय जगत् कहेगा।’’ आरब्धम् यानी आरंभ हो गया। बहुत ही चिंताजनक बात थी। पेट में पुराना अल्सर था तथा अन्य शारीरिक व्याधियां, तकलीफें थीं, 84 वर्ष की अवस्था, वर्धा-पवनार की बेहद गरमी। तपस्या ही थी!

पंच उपवास हुए - 22 से 26 अप्रैल 1979 -! और 26 तारीख को प्रधानमंत्री ने संसद में वक्तव्य दिया, जिसका सार था - ‘‘आचार्य विनोबा भावे के उपवास और गिरते स्वास्थ्य के बारे में हम चिंतित हैं। अभी-अभी जो खबर हमें प्राप्त हुई है, वह कहती है कि आचार्य की सेहत बहुत शीघ्रता से बिगड़ती जा रही है। पशुओं का संरक्षण, संवर्धन और सुधार का संतोषजनक मार्ग ढूंढने के लिए हम बहुत आतुर हैं। इसको समवर्ती सूची में लेने की सूचना की गयी है। कुछ प्रतिष्ठित सर्वोदय कार्यकर्ताओं ने बताया है कि आवश्यक संविधान-संशोधन और गोसंरक्षण के लिए कानून बनाने में कांग्रेस और कांग्रेस ई का पूरा-पूरा समर्थन रहेगा। इस आश्वासन पर हम संविधान-संशोधन बिल इसी सत्र में लाएंगे और सारे राजनैतिक दलों के सहयोग-प्राप्ति की आशा करेंगे।....ये प्रक्रियाएं कुछ समय लेंगी और वे मार्च 1980 तक पूरी हो जाएंगी।

इस प्रकार गोहत्या-बंदी के लिए जो मांग थी, वह पूर्ण होने का निश्चित आश्वासन मिलने के कारण 26 तारीख की शाम को करीब 3:30 बजे एक तोला शहद और दस तोला पानी दादा धर्माधिकारी के हाथों से विनोबाजी ने ग्रहण किया और उपवास की समाप्ति हुई।

जनता पक्ष के अध्यक्ष का वक्तव्य, प्रधानमंत्री का वक्तव्य, आदि पढ़ने के बाद बाबा ने कहा था - ‘‘सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक गाय को पूरा रक्षण मिलना चाहिए और बैल को 15 साल तक रक्षण मिलना चाहिए। ऐसे बाबा तो चाहता है कि बैल को भी पूरा रक्षण मिले। लेकिन वह अनशन का विषय नहीं हो सकता। उसके लिए प्रचार करना होगा। अनशन कम से कम चीज के लिए होता है। तो कम से कम मांग यह थी कि गाय को पूरा रक्षण मिले और बैल को 15 साल तक मिले।’’

कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने यह भी कहा था कि ‘‘श्वास का जो स्थान शरीर में है, वही स्थान विश्वास का समाज में है। विश्वास समाज का प्राण है। जब बाबा को आश्वासन दिया गया प्रधानमंत्री और कांग्रेसवालों की ओर से, तो बाबा ने विश्वास रखा। परिणामस्वरूप बाबा का अनशन पांच दिन में पूरा हुआ।’’

परंतु मार्च 1980 बीत गया। 1981 भी पूरा हो रहा था। 1981 के दिसंबर में तारीख 25, 26, 27 को अ.भा.गोसेवा सम्मेलन विनोबाजी की सन्निधि में संपन्न हुआ। भिन्न-भिन्न प्रदेशों के तथा कार्यों के कार्यकर्ता स्वतंत्र रूप से भी विनोबाजी से मिले। उस समय कुछ गोसेवक बाबा के पास बैठे थे। उनके कतिपय प्रश्नों में गोहत्याबंदी के बारे में भी कुछ प्रश्न थे। उस पर बाबा ने कहा, ‘‘इसके लिए सत्याग्रह करना होगा।’’ फिर इस पर चर्चा चली कि सत्याग्रह कहां किया जाए, स्वरूप क्या हो इत्यादि। चर्चा के अंत में तय रहा कि मुंबई में देवनार कत्लखाने के सामने सत्याग्रह हो। विनोबाजी की हिदायतें मिलती गयीं। विनोबाजी के कहने के अनुसार शांतिसेना के संयोजक श्री अच्युतभाई देशपांडे को सत्याग्रह के संयोजकत्व का भार सौंपा गया। उनके साथ दस व्यक्तियों का एक दल 2 जनवरी को मुंबई के लिए रवाना हुआ। और 11 जनवरी 1982 को देवनार कत्लखाने पर सत्याग्रह प्रारंभ हुआ। इस सत्याग्रह की मांग है - ‘‘देश में किसी भी उम्र के गाय और बैल न कटें, इस हत्या पर प्रतिबंध लगानेवाला कानून बने।’’

उसके बाद 30 जनवरी से ‘सौम्य सत्याग्रह’ प्रारंभ हुआ। उस दिन विनोबाजी ने प्रतीकरूप में एक समय का आहार लिया नहीं। ख्याल करें, पेट में पुराना अल्सर होने के कारण तोले में गिना-नापा आहार, एक समय का भी क्यों न हो, न लेने से क्या तकलीफ होती होगी! भारत के विभिन्न स्थानों से सौम्य सत्याग्रह के निमित्त चले उपवास की जानकारी बाबा के पास आ रही थी। उसमें छोटे गांव के नागरिक भी शामिल थे और मुंबई जैसे विशाल महानगरों के नागरिक भी शामिल थे। यह उपवास-श्रृंखला 30 जनवरी से 22 फरवरी तक चली।

देवनार कत्लखाने के सामने सत्याग्रह 11 जनवरी 1982 से प्रारंभ हुआ और 3 मार्च 2015 तक चला। इसके अंतर्गत अनेक बड़े-बड़े अभियान चलाए गए। भारत में जगह-जगह कटने के लिए जाने वाले बैलों को रोकने का ‘रोको भाई रोको’ आंदोलन चला। गायें तो गैरकानूनन कटती थीं, लेकिन कुछ साथियों ने उनको रोकने का काम भी किया और परिणामस्वरूप खूब मार भी खायी - यहां तक कि शरीर की हड्डियां टूट गयीं, फ्रैक्चर हुआ इत्यादि। भारतभर में और खासकर मुंबई की बहनों ने भी इसमें बहुत बड़ा योगदान दिया। कई साथियों के 33 साल सत्याग्रह कैंप में ही बीते हैं और कई साथी इस रणक्षेत्र से ही सीधे भगवान के पास पहुंच गए हैं।

सत्याग्रह के लिए विनोबाजी की ओर से नियुक्त किए गए पहले संयोजक श्री अच्युतभाई देशपांडे जो काका या अच्युत काका के नाम से ही जाने जाते थे ऐन जवानी में ही स्वतंत्रता संग्राम में शरीक हुए। उन्होंने अपनी गृहस्थी बनायी नहीं, बालब्रह्मचारी रहे। वे हैदराबाद स्टेट के नागरिक थे। उनकी पढ़ाई उर्दू माध्यम से हुई। उर्दू के विद्वान थे। बल्कि अरबी, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी का भी उत्तम ज्ञान था। मराठी उनकी मातृभाषा, भारत की लगभग सभी भाषाओं का गहरा अध्ययन था। विनोबाजी ने कुरानशरीफ तथा न्यू टेस्टामेंट का चयन कर उसके सार-ग्रंथ प्रकाशित किए, उसमें काका दाहिने हाथ के जैसे सहायक रहे। ऐसे विद्वान अध्ययनशील व्यक्ति को विनोबाजी ने जीवन की प्रौढ़ावस्था में देशव्यापी सत्याग्रह का संयोजकत्व सौंप दिया। काका को मानो अपना व्यक्तित्व ही बदलना पड़ा। सत्याग्रह का काल जैसे-जैसे बीतने लगा, काका की चिंता बढ़ती गयी। तीव्र वेदना के परिणामस्वरूप उन्होंने दुग्ध तथा दुग्धजन्य पदार्थ खाना छोड़ दिया। अथक चिंतन, श्रम किए। धीरे-धीरे स्वास्थ्य बिगड़ता गया और 14 मई 1998 को उन्होंने अपने शरीर को छोड़ दिया। ऐसे ही कुछ योग्यतावाले समर्पित अन्य साथी भी सत्याग्रहकाल के दरमियान भगवान के पास चले गए। उन सबकी याद आज आ रही है।

देवनार के गेट पर चलने वाला सत्याग्रह महाराष्ट्र में बने कानून के कारण पूर्ण हो गया है। परंतु सत्याग्रह की मांग अभी पूरी नहीं हुई है। ‘भारत में किसी भी उम्र के गाय-बैल न कटें’ और भारत से मांस का निर्यात बंद हो’ ये हैं सत्याग्रह की मांगें! अब इसके लिए आगे किस प्रकार काम करें, वह सोचा जाएगा।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत में गोहत्या-बंदी के लिए अनेक प्रकार के आंदोलन हुए हैं। उनको भी भूला नहीं जा सकता। परंतु विनोबाजी की तपस्या तथा उनकी ओर से प्रेरित, निर्दिष्ट यह सत्याग्रह सर्वथा असांप्रदायिक, अराजनैतिक तथा अहिंसक था और है। विनोबाजी ने सत्याग्रह के विचार को विकसित करते हुए कहा है कि अहिंसक सत्याग्रह का रूप सौम्य से सौम्यतर और सौम्यतर से सौम्यतम बनते जाना चाहिए। सौम्य से तीव्र - तीव्रतर, यह सत्याग्रह का स्वरूप नहीं हो सकता। इस सत्याग्रह की यह विशेषता रही और विश्वास है कि आगे भी रहेगी।

मैत्री अप्रैल 15 से साभार