Goraksha Satyagrah : Rashtriya Paristhiti aur Sarvodaya Vichar

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Published On : 2017-09-25 21:15:03

गोरक्षा सत्याग्रह : राष्ट्रीय परिस्थिति और सर्वोदय विचार 

आज अपने देश में गरीबी है, बेरोजगारी है, विषमता है, सभी प्रकार के अन्याय हैं, संप्रदायवादी, आतंकवादी और नक्सलवादी हिंसा व्याप्त है। सत्ता और दलों की राजनीति ने इन समस्याओं को ज्यादा तीव्र बनाया है। ये समस्याएं जो ऊपर से दिखाई देती हैं इनका मूल कारण शोषण और हिंसा पर आधारित समाज-व्यवस्था है। जैसे बुखार अपने आप में कोई बीमारी नहीं है वह तो किसी बीमारी का बाह्य लक्षण है। उसी प्रकार जो कठिन समस्याएं दिखाई देती हैं, वे बाह्य लक्षण मात्र हैं। इसलिए जब तक सम्पूर्ण समाज व्यवस्था के ढांचे में ही परिवर्तन नहीं होगा ये समस्याएं रहने वाली हैं। इसलिए हमारी दृष्टि किसी विषिष्ट समस्या या समस्याओं के निवारण की नहीं है। समाज व्यवस्था में ही बुनियादी परिवर्तन करने की है। लेकिन जिस प्रकार हम लक्षणों की भी चिकित्सा करते हैं, बुखार उतारने का प्रयत्न करते हैं उसी प्रकार दिखाई देने वाली समस्याओं के निराकरण के लिए भी तात्कालिक कदम उठाते हैं। इस दृष्टि से गोरक्षा सत्याग्रह को देखना चाहिए। गोरक्षा सत्याग्रह समाज व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन और तात्कालिक समस्याओं के निराकरण इन दोनों उद्देश्यों को पूरा करता है।

आप जानते ही हैं कि स्वराज्य के पश्चात गांधी-विचार अर्थात सत्य, अहिंसा आदि साधनों से समाज-परिवर्तन का प्रयोग विनोबा ने किया। उन्होंने एक ओर हिंसा का विरोध किया तो दूसरी ओर सत्ता से निरपेक्ष रहकर स्वतंत्र जनशक्ति खड़ी करने का प्रयास किया। जब गांधीजी के नजदीक से नजदीक के साथी सत्ता और दलों की राजनीति में गए, कुछ सत्ता में गए तो कुछ विपक्ष में रहे, तब विनोबा ने इन दोनों से भिन्न रास्ता चुना। विनोबा ने अहिंसा की शक्ति से समाज की बुनियादी समस्याओं को हल करने का रास्ता दिखाया। इस प्रक्रिया और पद्धति में देश की जनता का शिक्षण किया, एक समर्पित समाज खड़ा किया।

एक सुनिश्चित कार्य योजना के अनुसार विनोबा ने सूक्ष्म में प्रवेश किया, जिससे उनके साथी और सुप्रशिक्षित कार्यकर्ता आपस में मिलकर उनके द्वारा शुरू की गई अहिंसक प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं। लेकिन विनोबा के साथ कार्य करने वाले कुछ प्रभावशाली नेताओं की राजनीतिक प्रक्रिया में संघर्ष पद्धति पर विश्वास था। यद्यपि वे प्रत्यक्ष दल या सत्ता की राजनीति में नहीं मानते थे, लेकिन संघर्ष की पद्धति से समस्याओं के निराकरण में विश्वास रखते थे। उन्होंने महंगाई, भ्रष्टाचार, कुशिक्षा आदि समस्याओं को लेकर संघर्ष शुरू किया। संघर्ष के लिए सामने एक ऐसा प्रतीक या बिंदु होना चाहिए जिसके खिलाफ लोगों को खड़ा किया जा सके। उन्हें लगा कि इन सब समस्याओं के मूल में इंदिरा गांधी की नीतियां और उन नीतियों के पीछे चलने वाली कांग्रेस पार्टी है। इसलिए उन्हें सत्ता से हटाये बिना इन समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। संघर्ष से सत्ता परिवर्तन हुआ है और इससे पहले भी अनेक बार हुआ है। संघर्ष आंदोलन से भारत में भी सत्ता परिवर्तन हुआ, लेकिन समाज की बुनियादी समस्याओं के समाधान का मार्ग प्रशस्त नहीं हुआ। जैसे यह सिद्ध हुआ है कि गांधीजी के अनन्य साथी भी यदि सत्ता में जाते हैं तो भी सत्ता के चरित्र में बुनियादी अंतर नहीं आता है। सत्ता तो सत्ता ही रहती है। अनेक समर्पित लोग भी सत्ता में जाकर ‘जादू की कुर्सी’ से प्रभावित हो जाते हैं। वैसे ही यह सिद्ध हुआ है कि गांधी-विनोबा के साथी भी यदि संघर्ष पद्धति का प्रयोग करेंगे तो भी संघर्ष के स्वरूप में परिवर्तन नहीं होगा।

अनेक गांधीवादी संघर्ष और सत्याग्रह को एक ही मानते हैं। यह ठीक है कि सत्याग्रह में संघर्ष के भी अनेक तत्व रहते हैं और संघर्ष में भी सत्याग्रह के तत्व रहते हैं। लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर है। संघर्ष का प्रमुख उद्देश्य सत्ता परिवर्तन और उसके द्वारा समस्याओं का समाधान करना होता है जबकि सत्याग्रह का उद्देश्य सत्य-अहिंसा आदि साधनों पर विचार परिवर्तन, हृदय परिवर्तन और परिस्थिति परिवर्तन करके साध्य की प्राप्ति है। संघर्ष पद्धति को सत्य-अहिंसा आदि साधनों की ज्यादा चिंता नहीं रहती है। यह अलग बात है कि संघर्ष में शरीक कुछ निष्ठावान लोग व्यक्तिश: सत्य, अहिंसा में निष्ठा रखने वाले हों तदनुसार आचरण भी करते हों। वस्तुतः सत्याग्रह संघर्ष का विकल्प है। समाज में ‘वर्ग-संघर्ष’ का विचार प्रचलित रहा है। साम्यवाद तो इसे क्रांति का साधन मानता है। इसी प्रकार सामाजिक-क्रांति के लिए समर्पित कुछ विचारक भी जाति-संघर्ष, वर्ण-संघर्ष को साधन मानते हैं, इसी क्रम में कुछ गांधीनिष्ठ विचारक भी जन-संघर्ष को संपूर्ण क्रांति का साधन मानते हैं। लेकिन हमारी मान्यता है कि सत्याग्रह, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, वर्ण संघर्ष या जन संघर्ष से भिन्न और स्वतंत्र तत्वज्ञान है। ‘संघर्ष’ का परिणाम समाज-विभाजन में होता है जबकि ‘सत्याग्रह’ समाज में एकता और सामंजस्य का भाव उत्पन्न करता है। वस्तुतः संघर्ष की अपनी पद्धति और प्रक्रिया है जबकि सत्याग्रह की पद्धति और प्रक्रिया उससे सर्वथा भिन्न है। संघर्ष का स्फुरण क्षोभ और प्रतिक्रिया से होता है जबकि सत्याग्रह शांत, शुद्ध चित्त में अंतर्नाद से होता है।

जब सारा देश संघर्ष से आंदोलित था, देश में राजनीतिक ध्रुवीकरण हो रहा था, परस्पर द्वेष और वैमनस्य का वातावरण था, तब विनोबा को गोरक्षा सत्याग्रह का स्फुरण हुआ। उन्होंने गोरक्षा के लिए आमरण उपवास की ही घोषणा की। उनकी इस घोषणा ने सारे देश का ध्यान खींचा और सरकार को भी नीति परिवर्तन के लिए झुकना पड़ा। जो लोग विनोबा को ‘सरकारी संत’ कह रहे थे वे भी सकते में आ गए। सर्वोदय के ऐसे कार्यकर्ता जो संघर्ष में नहीं गए थे उनमें से अधिकांश गोरक्षा में सक्रिय हो गए। विनोबा ने जैसे ही इस प्रश्न को हाथ में लिया, इस पर नये सिरे से चिंतन शुरू हो गया। जो प्रश्न भारतीय इतिहास में घोर सांप्रदायिक माना गया था उसे असांप्रदायिक बनाने के साथ ही इसे देश में सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और सांस्कृतिक क्रांति का माध्यम बनाने का महाकार्य विनोबा ने शुरू किया।

विनोबा ने शांति सेना, आचार्यकुल, खादी-मिशन, स्त्री-शक्ति जागरण समिति जैसे संगठन बनाये, अनेक आश्रम स्थापित किए, अनेक संस्थाओं के गठन की प्रेरणा दी। लेकिन गोरक्षा-सत्याग्रह का संयोजन शांति सेना को सौंपा। उनके ही मार्गदर्शन में काम करने वाली संस्था कृषि गोसेवा संघ होते हुए भी सत्याग्रह का उत्तरदायित्व शांति सेना को सौंपने के पीछे भी एक विशिष्ट विचार है। वस्तुतः शांति सेना अशांति की मूल समस्याओं के निवारण के साथ ही अशांति के तात्कालिक कारणों के निवारण के लिए भी है। भारत में अशांति का तात्कालिक कारण भी गोहत्या है और अशांति का मूलभूत कारण भी सरकार समर्थित गोवंश हत्या है।

गोरक्षा-सत्याग्रह में गोवंश रक्षा का केंद्रीय कानून बनाने की मांग का मुख्य कारण यह भी है कि गोहत्या को सरकार का कानूनी समर्थन प्राप्त है। गोहत्या धंधा बना है, व्यापार बना है इसलिए गोहत्या का करना साहूकारी है और गोहत्या रोकना अपराध है। यदि मुम्बई, चैन्नई, बैंगलोर, कोलकाता में गोहत्या रोकने का प्रयास करेंगे या करायेंगे तो वह कानूनन अपराध माना जाएगा और गोहत्या करेंगे तो वह साहूकार माना जाएगा। इसे सरकार का संरक्षण प्राप्त है। इसलिए सम्पूर्ण गोवंश हत्या बंदी का केंद्रीय कानून बनाना अनिवार्य है। जिस प्रकार गांधीजी जैसे महान आध्यात्मिक संत को, महात्मा को अंग्रेजी राज हटाने के लिए, स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह करना पड़ा उसी प्रकार विनोबा जैसे विरक्त और अनासक्त संत को गोहत्या बंदी के लिए सत्याग्रह करना पड़ा। देश का यह दुर्भाग्य ही है कि संविधान के निर्देश, सरकार के वचन और सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक अनिवार्यता के बावजूद गोवंश हत्याबंदी के लिए विनोबा को सत्याग्रह करना पड़ा। देश में यदि पर्याप्त संवेदनशीलता होती तो ऐसे महापुरुष के जरा से संकेत से ही गोवंश हत्या बंदी कानून बन जाता।

गाय के अनेक पहलू हैं। इनमें गोसेवा, गोसंवर्धन, गोपालन, गोरक्षा प्रमुख है। सामान्य किसान गोपालक हैं, श्रद्धावान लोग गोसेवक हैं, जो निष्काम भाव से सेवा के भाव से गोशालाएं आदि चलाते हैं, वैज्ञानिक-गोपालन, नस्ल-सुधार आदि में लगे लोग गोसंवर्द्धन में लगे हैं, जीवदया के मान से गोसदन आदि चलाने वाले लोग गोरक्षा कर रहे हैं। लेकिन हमारी भूमिका इससे भिन्न ‘गोरक्षा सत्याग्रह’ की है। आज सामान्य गोपालन, गोसंवर्द्धन, गोसेवा या गोरक्षा मात्र से गोहत्या बंद नहीं होगी। इसके लिए सत्याग्रह द्वारा भारत सरकार की मूलभूत नीति में ही परिवर्तन करना होगा।

आज सारे रचनात्मक कार्य मात्र भूतदया के कार्य हो गए हैं और सेवकों के भरण-पोषण के साधन बन गए हैं। उनकी तेजस्विता क्षीण हो रही है। गोरक्षा सत्याग्रह जनता में संपर्क के लिए, विचार-प्रचार के लिए अवसर प्रदान करता है और सेवकों को लोकाधार भी देता है। सर्वोदय तत्वज्ञान के रक्षण और प्रसार का भी यह एक अच्छा माध्यम है।

सत्य, प्रेम, करुणा, असांप्रदायिक, अराजनैतिक, अहिंसक आदि के साथ ही सर्वोदय विचार के मूल तत्वों को समाज में प्रतिष्ठित करने का यह अच्छा कार्यक्रम है।