Farmer Movement In Country

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Published On : 2017-06-14 23:04:00

परस्परावलंबन से दूर होगा गांव और शहर का संघर्ष
डाॅ.पुष्पेंद्र दुबे
इन दिनों देश के विभिन्न प्रदेशों में किसान आंदोलन चल रहे हैं। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। मौसम की मार, सरकार के सही-गलत निर्णय, बैंक तथा महाजन से लिए गए कर्ज और व्यापारियों के शिकंजे में फंसा किसान कई सालों से छटपटा रहा है। प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर किसानों को अनेक सपने दिखाए गए। उसमें 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने का वादा सबसे हसीन सपना है। किसान आज डूब रहा है और उससे कहा जा रहा है कि तुम अपनी गर्दन थोड़े दिन और ऊपर रखकर सांस लेते रहो, हम तुम्हें बचाने आ रहे हैं। आज हमारे अन्नदाताओं का उग्र रूप नजर आ रहा है। इसे हम शहर और गांव के संघर्ष की शुरुआत कह सकते हैं, जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है। यदि शहर और गांव का संघर्ष टालना है तो विज्ञान के जमाने में परस्परावलंबन ही काम देगा। किसान आंदोलन यह दर्शाता है कि ग्राम पंचायत असफल सिद्ध हो रही हैं। पंचायतीराज व्यवस्था में राजनीतिक दलों की घुसपैठ ने इस व्यवस्था को दूषित कर दिया है। वास्तव में गांव आज भी गुलाम हैं। शहर ने गांवों की चिंता कभी नहीं की। शहर को यह बात ध्यान में नहीं आ रही है कि गांव टिकेंगे तभी शहर टिकेंगे और तभी देश टिकेगा। एक किसान अपना अनाज लेकर बेचने के लिए शहर में आता है। उसके लिए सरकार ने समर्थन मूल्य निर्धारित किया है। किसान अनाज बेचकर कार के शोरूम पर जाता है। तब कार का मूल्य किसान नहीं बल्कि कंपनी तय करती है। किसान को अपने किसी भी उत्पाद की कीमत तय करने का अधिकार ही नहीं है। यह व्यवस्था विचित्र किंतु सत्य है। किसान कितने सालों से कह रहा है कि हमारी उत्पादन लागत बढ़ती जा रही है, लेकिन हमें अपने उत्पाद का मूल्य नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर अनुत्पादक नौकरशाही का वेतन कहां से कहां पहुंच गया है। आज किसान यदि सरकार की ओर आशाभरी निगाह से देख रहा है तो वह बड़ी भूल कर रहा है। गांव को अपने उद्धार के लिए स्वयं कमर कसना होगी। ठीक वैसे ही जैसे कभी भगवान कृष्ण ने पराक्रम किया था। वृंदावनवासी इंद्र की पूजा किया करते थे। तब बालकृष्ण ने ग्रामवासियों से इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा करने का आह्वान किया। इससे अनेक ग्रामवासी घबरा गए। उन्होंने बालकृष्ण से कहा कि इंद्र हमारे गांव में तबाही मचा देंगे। जब बालकृष्ण ने गोवर्धन की पूजा प्रारंभ की, तब वास्तव में इंद्र ने उस गांव को बाढ़ में डुबाने का प्रयत्न किया। तब अवतारी बालकृष्ण ने अपने हाथ की छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत धारण किया और गोकुलवासियों की रक्षा की। इस कहानी का आशय यही है कि ग्रामीणों को अपने गांव को गोकुल खुद बनाना होगा। उन्हें शहर पर निर्भरता कम करना होगी। आज बीज, खाद, चारा, पेट्रोल, डीजल, टैªक्टर, हार्वेस्टर से लगाकर एक-एक चीज के लिए किसान और गांव शहर पर निर्भर है। ग्राम-निर्माण सरकार के भरोसे नहीं, बल्कि गांव के लोगों से होगा। सरकार ने अब तक गांवों के उद्धार के लिए अरबों रुपये खर्च किए, फिर भी गांव का उत्थान नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण यही है कि योजना गांव वालों ने नहीं बनायी। आज तो सरकार हवा में ताली बजाने का प्रयास कर रही है। किसान कपास लगाता है, कपड़ा शहर से खरीदकर ले जाता है, किसान मूंगफली लगाता है, तेल शहर से ले जाता है, किसान पशु पालन करता है, चारा लेने शहर आता है, किसान बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बीज खरीदता है, बीज पर भी उसका अधिकार खत्म, खाद ब्लैक में लेता है, दूध का उत्पादन गांव में करता है, भाव व्यापारी तय करते हैं। किसान हाड़्तो्ड़ मेहनत कर फसल उत्पादन करता है, पुरस्कार और वाहवाही सरकार के खाते में जमा होती है। गांव की जमीन गांववालों के हाथ से निकलती जा रही है। जमीन के मालिक शहर में हैं और मजदूर गांव में। इस स्थिति के लिए ग्रामवासी स्वयं जिम्मेदार हैं। ग्राम को एक परिवार माने बिना उनका रक्षण दिनोंदिन कठिन होता जाएगा। गांवों में जो कच्चा माल पैदा होता है, उसका वहीं पक्का माल बनना चाहिए। तभी गांव टिक सकते हैं। कच्चा माल खेत में तैयार करना और उससे पक्का माल शहरों में बनाना, यह योजना गांव के लिए मारक सिद्ध हो रही है। आज ऐसा कोई नहीं सोच रहा है कि ‘मेरा गांव’ है।  विज्ञान के जमाने में पूरे गांव की योजना स्वयं ग्रामीणों को करना होगी। अत्यंत जरूरी ऐसी चीज जो गांव में बन सकती है, गांव में ही बनायी जाएगी। गांव के उद्योग गांव में चलें, और विदेश से जो माल आता है, उसे रोकने के लिए वह माल शहरों में बने। अगर गांव के उद्योग खत्म होंगे, तो न सिर्फ गांव पर, बल्कि शहरों पर भी संकट आएगा। फिर गांव के बेकार लोगों का शहरों पर हमला होगा और ऊपर से विदेशी माल का हमला तो होता ही रहेगा। इस तरह दोनों हमलों के बीच शहरवाले पिस जाएंगे। इसलिए हमारी योजना में गांव और शहरों के बीच इस प्रकार का सहयोग होगा कि गांववाले अपने उद्योग गांव में चलाएंगे और शहरवाले विदेश से आने वाली चीजें शहर में बनाएंगे। इस तरह प्रत्येक गांव पूर्ण होगा।