Gorakshan Aur Bauddh Sahitya

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Published On : 2017-06-11 20:18:45

बौद्ध साहित्य और गोरक्षण

अक्सर यह कहा जाता है कि बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ और यहीं फला-फूला, यहीं से वह संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक फैला, फिर भी उसमें बहुत-सी बातें आर्य सभ्यता तथा संस्कृति के प्रतिकूल मालूम पड़ती हैं। इसमें मुख्य बात गोमांस भक्षण की है। लेकिन बौद्ध साहित्य में - विशेष रूप से बुद्ध की दृष्टि में गाय का स्थान क्या है ? यह इस निबंध से स्पष्ट हो जाएगा।

भगवान बुद्ध करुणा के अवतार थे। उनके हृदय में संसार के समस्त प्राणियों के लिए समान दया थी। वे किसी भी प्राणी के कष्ट को देखकर चुप नहीं बैठ सकते थे। उनका स्नेह सीमाबद्ध नहीं था। फिर गाय जैसे उपयोगी और मनुष्य मात्र को बिना किसी भेदभाव के, एक समान सुख देने वाले प्राणी की वे कैसे उपेक्षा कर सकते थे। भगवान बुद्ध की इस सहृदयता को देखकर महाकवि जयदेव ने गाया -

निंदसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातम्

सदयहृदय दर्शितपशुघातम्

केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे।

भगवान बुद्ध ने यज्ञ हिंसा की बड़ी निंदा की। वे 45 वर्ष तक एक स्थान से दूसरे स्थान में घूमते रहे और लोगों को अन्यान्य बातों के साथ-साथ गोहत्या के विरुद्ध भी उपदेश देते रहे। उनके समकालीन भगवान महावीर भी अहिंसा के प्रबल समर्थक थे। इन दोनों प्रचारकों को अपने उद्देश्य की सिद्धि में पूर्ण सफलता मिली। उन्होंने आज की तरह गोरक्षा के लिए न कहीं सांप्रदायिक दंगे करवाये और न गोरक्षा को धार्मिक रूप ही दिया। बल्कि उन्होंने जनता को गाय की और गोवंश की उपयोगिता बतलाकर गोवध न करने की शिक्षा दी। कुछ लोगों ने उनका प्रबल विरोध किया, किंतु उन्होंने धैर्यपूर्वक सब सहन करने में ही अपने उद्देश्य की सफलता देखी।

आज प्रत्येक हिंदू गोसेवा और गोरक्षा में ही अपना गौरव समझता है, किंतु भगवान बुद्ध की गोरक्षा की भावना से लोग बहुत कम परिचित हैं। भगवान बुद्ध ने एक जगह कहा है-

माता यथा नियं पुत्तं आयुसा एक पुत्तमनुरक्खे।

एवम्पि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं॥

‘माता जिस प्रकार अपने इकलौते बेटे के प्रति स्नेह रखती है, उसी प्रकार सभी प्राणियों में अपरिमित प्रेम रखना चाहिए। जीवदया की यह प्रवृत्ति धर्मराज अशोक के विचारों में पूर्णता को प्राप्त हुई। भगवान बुद्ध गाय की उपयोगिता को सर्वोपरि स्थान देते थे। वे गाय की निर्दोषता पर मुग्ध थे। इसीलिए उन्होंने कहा है -

न पादा न विसाणेन नास्सु हिस्सन्ति केनचि।

गावो एलक समाना सोरता कुम्भदूहना॥

गायें न पैर से, न सींग से न किसी अंग से ही मारती हैं। भेड़ के समान प्रिय और घड़ेभर दूध देने वाली हैं।

मनुष्य को अनेक वस्तुओं पर निर्भर रहना पड़ता है, किंतु कुछ वस्तुओं की उपयोगिता इतनी अधिक है कि उनके बिना हमारा जीवनयापन कठिन हो जाता है। आज के वैज्ञानिक युग में संभव है हम अपनी आवश्यकता की पूर्ति भिन्न तरीके से कर लें, पर वह तरीका सर्वव्यापी नहीं हो सकता। भारत सदा से कृषिप्रधान देश रहा है। खेती के लिए यहां प्राचीन काल से आज तक बैल का उपयोग होता है। गाय बचपन में हमें अपने दूध से और बड़े होने पर उसका पुत्र बैल अन्न उपजाकर हमारा भरणपोषण करता है। भगवान बुद्ध जैसे दयालु पुरुष गाय के इस महत्व को कैसे भूल सकते थे ? उन्होंने गाय को माता-पिता के समान उपकारी     बतलाया है-

यथा माता पिता भाता अंचे वापि च जातका।

गावो नो परमा मित्ता यासु जायंति ओसधा॥

‘जैसे माता, पिता, भाई और दूसरे कुटुम्ब परिवार के लोग हैं, वैसे ही गायें भी हमारी परम मित्र (हितकारिणी) हैं, जिससे (अर्थात जिनके दूध से) दवा बनती है।’

ऊपर की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि गाय के प्रति भगवान बुद्ध के हृदय में कितनी करुणा थी। वे गाय को सुख का मूल स्रोत मानते थे। इसीलिए तो उन्होंने कहा है :

अन्नदा बलदा चेता वण्णदा सुखदा तथा।

एतमत्थवसं मत्वा नास्सु गावो हनिंसु ते॥

गाय इतनी चीजों को देने वाली है - अन्न, बल, वर्ण तथा सुख। इन बातों को जानकर ही (पहले) वे (लोग) गाय को नहीं मारते थे।’

सरल और हृदयस्पर्शी भाषा में किसी वस्तु की उपयोगिता बताकर दूसरों की नजर में भी उस वस्तु के प्रति श्रद्धा और आदर पैदा करना बुद्ध का ही काम था। बुद्ध किसी पर अपना विचार बलपूर्वक लादना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि बलपूर्वक मनवाने का अर्थ है ‘परस्पर द्वेष पैदा करना।’ किंतु बुद्ध तो कहते थे कि वैर से कभी भी वैर शांत नहीं हो सकता। मित्रता से ही वैर मिट सकता है।’

गाय के प्रति भगवान बुद्ध की यह भावना देख उनके अनुयायियों में भी गाय की बड़ी कद्र रही। बर्मा में विशेष प्रचलित पाली भाषा की एक छोटी-सी पुस्तक है ‘लोकनीति’, इसमें लिखा है -

ये च खादन्ति गोमंसं, मातुमंसं व खादये।

मतेसु तेसु गिज्झानं ददे स्रोते व वाहये॥

‘जो गाय के मांस को खाते हैं, वे अपनी माता के मांस को ही खाते हैं। गाय के मर जाने पर उसे गृद्धों को दे दें या नदी में बहा दें।’

आगे चलकर इसी पुस्तक में कहा है-

गोणाहि सब्ब गिहीनं पोसका भोगदायका।

तस्मा हि माता पितू व मानये सकरेय्य च॥

‘बैल सब गृहस्थों के पोषण और भोगदायक हैं। इसलिए उनका माता-पिता की तरह आदर-सत्कार करें।’

अंत में बुद्ध के इस वचन के साथ लेख समाप्त करता हूं कि एवमेसो अनुधम्मो, पोराणो विन्नुगरहितो। अर्थात यह गोहत्या प्राचीन विद्वानों द्वारा निंदित कर्म है।

भगवान बुद्ध और गोमाता

मूल वैदिक समाज मांस भक्षक नहीं था। उसके यज्ञकर्म मांसयुक्त नहीं होते थे अर्थात प्राचीन वैदिक समाज में गो की हिंसा नहीं होती थी। यह बात मंत्रसंति से स्पष्ट सिद्ध होती है। महाभारत के शांतिपर्व में कहा है कि सतयुग में हिंसा नहीं होती थी। महाभारत का प्रमाण कालत: अधिक प्राचीन और स्थितितया निकटस्थ होने से यूरोपीय पंडितों की बातों की अपेक्षा, प्रमाण की दृष्टि से अधिक प्रबल अत: अधिक स्वीकार्य है। परंतु परायी संस्कृति का ऐनक लगाकर ही अपनी ओर देखने वाले नवीन विद्वानों की दृष्टि में बेचारे पुराने व्यास का महत्व ही क्या! फिर यह भी शंका उठायी जा सकती है कि व्यास ब्राह्मणत्व के अभिमानी थे, अत: उनके कथन में पक्षपात हो सकता है। कोई यह भी कह सकते हैं कि शांति अनुशासनादि पर्वों का बहुत-सा अंश प्रक्षिप्त होने से महाभारत का प्रमाण विश्‍वसनीय नहीं माना जा सकता। इसलिए थोड़ी देर हम व्यास और भारत को अलग ही रक्खें और भगवान बुद्ध ने क्या कहा है देखें। ‘ब्राह्मण धम्मिय सुत्त’ में भगवान बुद्ध कहते हैं, ‘‘पूर्व के ॠषि संयमी और तपस्वी थे। ब्रह्मचर्य, शील, सरलता, नम्रता, तप, मृदुता, करुणा और क्षमा - इन गुणों की वे प्रशंसा करते थे। चावल, शय्या, वस्त्र, घी, तेल की याचना करके धर्म के अनुसार विभाग निकालकर वे यज्ञ करते थे। यज्ञ के उपस्थित होने पर वे गो को मारते नहीं थे। माता, पिता, भाई और अन्य बांधवों के समान ही गौओं को वे अपना परम मित्र जानते थे, उनसे औषधि निर्माण होती है, वे अन्न, बल, रूप और सुख देती हैं यह जानकर वे गौओं को मारते नहीं थे। वे सुकुमार, महाकाय, वर्णवान और यशस्वी ब्राह्मण कर्तव्याकर्तव्य का विचार रखते हुए धर्म का ही आचरण करते थे। जब तक ऐसे ब्राह्मण संसार में थे तब तक प्रजा सुखी थी।

अनंतर ब्राह्मण धर्म का ह्यास हुआ और निरपराध गौओं की इस प्रकार हत्या होती देख -

देव, पितर, असुर, राक्षस आदि सभी चिल्ला उठे कि गौ पर शस्त्र चला, यह बड़ा भारी अधर्म हुआ। पहले इच्छा, भूख और जरा - ये तीन ही रोग मनुष्यों में थे। पशु हिंसा से अंठानवे हो गये। इस प्रकार पूर्व के ज्ञानियों ने गोहत्या की निंदा की है। गोहत्या नीच कर्म है।

‘ब्राह्मणधम्मिय सुत्त’ के उपर्युक्त वचनों से यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरातन ब्राह्मण धर्म के संबंध में भगवान बुद्धदेव के क्या मत थे। ‘नास्सु गावो हनिसु ते’ वे गौओं को नहीं मारते थे। पूर्वकालीन ब्राह्मणों की यह प्रशंसा दो-ढाई हजार वर्ष पहले जो भगवान बुद्धदेव ने की, उसे सच माना जाय या पूर्वग्रह-दूषित अर्वाचीन यूरोपीय पण्डितों ने उन पर जो यह दोष आरोपित किया है कि वे गो-मांस भक्षक थे, उसे सच माना जाय, इस प्रश्‍न का उत्तर कोई भी दे   सकता है।

विदेशों में आज जो सर्वभक्षक बौद्धधर्मावलम्बी लोग देख पड़ते हैं उन्हें देखकर हम लोग यह समझ लेते हैं कि बौद्धधर्मावलम्बी लोग पहले से ही गोमांस भक्षक रहे होंगे, परंतु यह कल्पना सही नहीं है। इतिहासप्रसिद्ध बौद्ध सम्राट अशोक के शिलालेखों में गाय-बैल आदि प्राणियों की हत्या न होने देने की आज्ञाएं मिलती हैं। उत्तर ब्रह्मदेश (बर्मा) के अंतर्गत विजयपुर में सन् 1950 के लगभग सीहसूर नामक राजा राज करते थे। उनके प्रधानमंत्री महाचतुरंगबल का बनाया हुआ ‘लोकनीति’ नामक ग्रंथ है। इसमें कहा है -

गोणाहि सब्ब गिहीनं पोसका भोगदायका।

तस्मा हि माता पितू व, मानये सकरेय्य च॥14॥

सब गृहस्थों को भोग (योग्य पदार्थ) देने वाले और पोसने वाले गौ-बैल ही हैं। इसलिए माता-पिता के समान उन्हें पूज्य माने और उनका सत्कार करे। जो गोमांस खाते हैं वे अपनी माता का मांस खाते हैं। तात्पर्य यह है कि आजकल बौद्धों का आचरण चाहे जैसा हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि भगवान गौतम बुद्ध और उनके निष्ठावान अनुयायी गोहिंसा और गोमांस भक्षण के अत्यंत विरोधी थे, यह उपर्युक्त वचनों से सिद्ध है। बौद्धकाल में यह देश गोधन से कितना समृद्ध था यह दर्शाने के लिए एक ही दृष्टांत पर्याप्त होगा।

भगवान बुद्ध के एक शिष्य थे धनंजय सेठ। उन्होंने  अपनी कन्या के विवाहोपलक्ष्य में इतनी गौएं दहेज मेें दी थीं कि उन गौओं के खड़े होने के लिए लगभग डेढ़ सौ हाथ चौड़े और तीन कोस लंबे मैदा की आवश्यकता हुई। प्रख्यात चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ईसा की 8वीं शताब्दी में होने वाले सम्राट हषवर्द्धन के संबंध में लिखा है -

‘उनके राज्य में प्राणिहिंसा करने वाले के लिए कठोर दण्ड था। उन्होंने अपने राज्य में मांस-भक्षण ही बंद कर दिया था।’ गोहत्या और गोमांस भक्षण की तो बात ही क्या।! संकलित- कल्याण