इस्लाम में बकरीद पर गोकुशी जरूरी नहीं

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Published On : 2017-04-18 21:11:56

इस्लाम में बकरीद पर गोकुशी जरूरी नहीं

नरेंद्र दुबे

भारत में गोरक्षा जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रश्न को भी सांप्रदायिक और राजनैतिक रंग दिया जा रहा है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। वास्तव में जैसे पश्चिम के देशों में आधुनिक विज्ञान और यंत्र-शास्त्र, टेक्नालाजी आदि का विकास हुआ वैसे ही भारत में बहुत प्राचीनकाल में गोविज्ञान का विकास हुआ था। भारत से यह गोविज्ञान सारी दुनिया में गया। पश्चिम में गौ को काउ, बैल को बुल और पूर्व में जापान में गौ को ‘ग्यू’ कहा जाता है। ये शब्द संस्कृत के ही अपभ्रंश हैं।

भारत की और पश्चिम की सांस्कृतिक परंपरा में यही बुनियादी भेद है कि भारत में संपूर्ण गोवंश का पूरा-पूरा उपयोग किया गया। दूध, खेती, खाद, परिवहन, ग्र्रामोद्योगों के लिए चालक शक्ति के उपयोग और चर्मोद्योग आदि का जैसा विकास भारत में हुआ वैसा पश्चिम में नहीं हो सका। पश्चिम में गाय दूध के लिए तथा बैल मांस के लिए और घोड़ा खेती के लिए पाले गए।

भारत में जैसा गोवंश रक्षणीय माना गया और उसे परिवार का अंग माना गया वैसा पश्चिम देशों में नहीं हुआ।

भारत में लगभग दस हजार सालों से गोसेवा गोरक्षा की परंपरा है जबकि ऐसी परंपरा पश्चिम के किसी देश में नहीं है। इसलिए भारत में गाय-बैल के प्रति जैसा पूज्य भाव है, वैसा वहां नहीं है।

भारत में दूध और मांसाहार के लिए बकरी-बकरे का पालन होता है वैसा ही वहां दूध और मांस के लिए गाय-बैल पाले जाते हैं। ऐसे उपयोगितावादी दृष्टिकोण के कारण जब तक गाय दूध देती है तब तक तो उसका बहुत अच्छा पालन होता है और जब वह दूध देना कम कर देती है या बंद कर देती है तो उसका कतल कर दिया जाता है।

पश्चिमी देशों में खेती, परिवहन और ग्रामोद्योगों में घोड़े का प्रयोग होता था। इसलिए वहां हार्स पावर शब्द चला। वहां अश्व संस्कृति का अच्छा विकास हुआ। इसलिए वहां घोड़ा कतल परंपरा से प्रतिबंधित रहा। इतना ही नहीं यहूदी धर्मग्रंथ में घोड़े के कतल को प्रतिबंधित किया गया है। इस परंपरा के ही परिणामस्वरूप आज भी संपूर्ण इस्लामिक जगत में घोड़े का कतल नहीं किया जाता है।

बलि या कुर्बानी प्रथा

प्राचीन काल में मांसाहार प्रचलित था। वह स्वाभाविक आहार था। शिकार की बजाय पशुपालन करके मांसाहार प्राप्त करना सरल था। ऐसा आहार भी परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है इसलिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना चाहिए यह विचार दृढ़ हुआ और मंत्र पढ़कर कतल करने की प्रथा प्रचलित हुई। भारत में यद्यपि गोमांस वर्जित था, गाय-बैल अवध्य थे किंतु अनेक अवसरों पर बकरे और भैंसे की बलि देने की प्रथा प्रचलित थी। लेकिन जैसे-जैसे शाकाहार का प्रचलन बढ़ा वैसे-वैसे मांसाहार निवृत्ति के प्रयास होने लगे। भारत में मांसाहार को नियंत्रित और मर्यादित करने के लिए उसे यज्ञों से जोड़ा गया और केवल यज्ञ-प्रसाद के रूप में ही मांसाहार करने की इजाजत थी। इस प्रकार साल में एकाध बार ही लोग मांस सेवन कर सकते थे और वह भी यज्ञ प्रसाद रूप में अत्यंत कम मात्रा में। किंतु भगवान महावीर, गौतम बुद्ध और वैष्णव संतों ने ऐसी यज्ञ हिंसा और बलि प्रथा का भी निषेध किया और उनके सद्प्रयासों से यह कुप्रथा भी समाप्त हुई। यद्यपि अपवाद रूप में पूर्वी भारत के कुछ देवी मंदिरों में यह आज भी प्रचलित है।

अरब देशों में कुर्बानी की प्रथा हजरत मोहम्मद साहब के भी बहुत पहले से प्रचलित थी। पवित्र कुरान ने कुर्बानी के लिए केवल छः पालतु पशु निर्धारित किए उनमें से किसी भी एक की कुर्बानी दी जा सकती है। इसकी पृष्ठभूमि में हजरत इब्राहिम द्वारा अल्लाह के संकेत पर अपने प्रिय पुत्र हजरत इस्माइल की कुर्बानी की धर्मकथा प्रचलित है। ऐसी ही धर्मकथा भारत में भी राजा मोरध्वज की प्रचलित है। अंतर केवल इतना ही है कि इस्लामी जगत में हजरत इब्राहिम के त्याग और अल्लाह के प्रति समर्पण की स्मृति में प्रचलित कुर्बानी की प्रथा आज भी प्रचलित है और प्रतिवर्ष इदुज्जुहा पर कुर्बानी देकर लोग यह पर्व मनाते हैं।

पवित्र कुरान में जिन छः पालतु पशुओं की कुर्बानी की इजाजत है उनमें बकरा, बकरी, उंट, उंटनी, भेड़-भेड़ा, दुंबा-दुंबी, भैंस-भैंसा तथा गाय-बैल हैं।

अरब देश में गाय-बैल केवल दूध और मांस के लिए ही पाले जाते थे जैसा कि भारत में बकरी दूध के लिए और बकरा मांस के लिए आज भी पाले जाते हैं। वहां के बैल में और भारत के बकरे में मांसाहार की दृष्टि से अंतर नहीं है।

दुनिया के सभी देशों में पहले वस्तु-विनिमय की ही प्रथा थी और एक गाय के बदले में सात भेड़ें मिलती थीं। इसलिए कुर्बानी के लिए सात भेड़ के बदले एक गाय मान्य की गई। इसका यह आशय कदापि नहीं है जैसा कि कुछ अंधविश्वासी मानते हैं कि एक गाय की कुर्बानी से सात भेड़ों की कुर्बानी के बराबर पुण्य मिलेगा।

अरबी भाषा में गाय को ‘बकर’ कहते हैं। इसे आधार बनाकर यह भी प्रचारित किया गया है कि बकरीद पर गाय की कुर्बानी देनी चाहिए। किंतु ऐसा है नहीं। क्योंकि यदि अरबी भाषा में ऐसा कहना होता तो इसे इदे-बकर’ कहते न कि बकरीद।

यद्यपि कुरान-शरीफ में इदुज्जुहा पर कुर्बानी को सम्मति दी गई है लेकिन इसे धार्मिक फर्ज नहीं माना है। इस्लाम में कलमा, जकात, रोजा और हज धार्मिक फर्ज हैं कुर्बानी धार्मिक फर्ज नहीं है और ना ही मांसाहार धार्मिक फर्ज है। कोई भी मुसलमान कुर्बानी न देकर और मांसाहार न करके भी मुसलमान रह सकता है।

भारत में इस्लाम

भारत में आधुनिक इस्लाम का प्रवेश हजार-बारह सौ वर्ष पहले ही हुआ है। प्रारंभ में सांस्कृतिक टकराव हुआ लेकिन जल्दी ही वह बात ध्यान में आ गई कि भारत का सारा सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, ग्रामीण जीवन खेती, ग्रामोद्योग, परिवहन, आहार आदि गाय-बैल पर आधारित है। इसलिए यहां गोमांस और गाय, बैल की कुर्बानी नहीं चलेगी। इस प्रकार भारत में इदुज्जुहा पर बकरे की कुर्बानी प्रचलित हुई और इदुज्जुहा को बकरीद माना गया। भारत में पहले से ही अनेक पंथों में बकरे की बलि देने की प्रथा थी इसलए यहां इसे स्वीकार करने में भी कठिनाई नहीं हुई।

मुस्लिम शासकों की देन

भारत में इस्लाम के प्रवेश से बहुत पहले से परंपरा से ही गोहत्या बंद थी। लेकिन मुस्लिम शासकों को लगा कि मुस्लिम नागरिक कुरान में इजाजत होने से गाय-बैल की कुर्बानी भी दे सकते हैं और मांस के चमड़े के लिए इनका कतल भी कर सकते हैं। इसलिए मुस्लिम शासकों ने गोहत्याबंदी कानून बनाये। इसका बहुत अच्छा विवरण डा.सैयद मसूद ने अपनी पुस्तक ‘काउ प्रोटेक्षन इन इण्डिया अंडर मुस्लिम रूल’ में किया है। बादशाह अकबर से लेकर बहादुरशाह जफर तक संपूर्ण मुगलिया सल्तनतों में गोहत्या प्रतिबंधित रही।

जम्मू-कश्मीर में जेनुअल आबदीन ने गोहत्याबंदी का जो कानून बनाया वह कुछ संशोधनों के साथ वहां आज तक प्रचलित है। शेख अब्दुल्ला ने भी उसे कायम रखा और डॉ.फारुख अब्दुल्ला ने तो राज्य के बाहर से गोमांस मंगाकर बेचना भी प्रतिबंधित किया।

कुरान शरीफ में गाय

कुरान शरीफ में जगह-जगह दूध की महिमा का वर्णन है। खासकर पारा - 14 रुकअ -7 की दूसरी आयत में गाय की नियामतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है।

हजरत मोहम्मद साहब का जीवन सभी के लिए आदर्श अनुकरणीय जीवन है। उन्होंने कुरान शरीफ की हिदायतों के अनुसार जीवन जीकर दिखाया है। इसलिए उनके वचनों का विशेष महत्व है। उनके वचन जो हदीस में प्रकट हैं वे स्पष्टतः गोरक्षा को पुष्ट करने वाले हैं। उनका एक वचन है, “अकरमल बकर काइलहा सैय्युदल बहाइम” अर्थात गाय की इज्जत करो क्योंकि वह चौपायों की सरदार है।” हजरत इमाम आजम अबु अनीफा ने अपनी पुस्तक में हदीस क्रमांक 494.4 में लिखा है “अल्लाह ने नहीं उतारी कोई बीमारी जिसकी उसने दवा नहीं उतारी सिवाय बुढ़ापा और मौत के। तुम गाय का दूध पीने के पाबंद हो जाओ, चूंकि गाय अपने दूध के अंदर सभी तरह के पौधों के सत्व को रखती है।” इसी पुस्तक में दूसरी एक हदीस है, “इब्नेसनी और हाकिम अबू नईम रखायत लाए हैं कि नबी अलैहि सलेल्लाहि वस्सलम, मोहम्मद साहब ने फरमाया है कि “लाजिम कर लो गाय का दूध पीना क्योंकि वह दवा है, गाय का घी शिफा है और बचो गाय के गोश्त से चूंकि वह बीमारी पैदा करता है।”

कुरान शरीफ में मनुष्यों के लिए खाने की चीजों के बारे में लिखा है :

मनुष्य अपने अन्न की ओर देखे

कि हमने उपर से खूब पानी बरसाया,

फिर हमने विशेष प्रकार से जमीन चीरी,

उसमें अनाज उगाया

और अंगूर और सब्जियां

और जैतून और खजूरें

और घने बाग

और फल तथा चारा उगाया

तुम्हारे और पशुओं के लाभ के लिए - कुरान शरीफ 80.24.32

गोहत्या का कारण ब्रिटिश राज :

भारत में अंग्रेजों ने अपनी फौज के लिए गोमांस की आपूर्ति के लिए मुस्लिम कसाइयों को कतल के धंधे में लगाया। चमड़े का निर्यात शुरू किया। इस प्रकार मांस और चमड़े का व्यापार और कतल का धंधा अंग्रेजी राज की देन है। उन्होंने इसका उपयोग हिन्दू-मुस्लिम द्वेष बढ़ाने में भी किया।

अंग्रेजों की इस चाल को नाकाम करने का प्रयास खिलाफत आंदोलन के समय मौलाना मोहम्मद अली और मौलाना शौकत अली ने गोहत्याबंदी के समर्थन में मस्जिदों में जा-जाकर अपनी तकरीरों में किया।

भारतीय संविधान में गोहत्याबंदी :

आजादी के बाद भारत की संविधान सभा में मौलाना अबुलकलाम आजाद,  डॉ.जाकिर हुसैन, शेख अब्दुल्ला सहित अनेक मुस्लिम विद्वान थे। उन्होंने सर्वसम्मति से संविधान की धारा 48 में गोहत्याबंदी को राज्यों का नीति निर्देशक सिद्धांत बनाया। इसके आधार पर जिस किसी राज्य में भी गोहत्याबंदी कानून बने वहां मुस्लिम विधायकों ने उसका समर्थन किया और ऐसे कानून सर्वसम्मति से ही बने।

गोहत्या के जिम्मेदार पूंजीपति उद्योगपति  

भारत में चल रही गोहत्या की जिम्मेदारी पूंजीपतियों, व्यापारियों, उद्योगपतियों और निर्यातकों की है। इसके लिए न मुस्लिम जिम्मेदार हैं और न गरीब कसाई। मुस्लिम कसाई बहुत गरीब बेजुबान मजदूर हैं जो मांस-चमड़े के व्यापारियों और निर्यातकों के लिए मजदूरी के लिए कतल करते हैं। ऐेसे पूंजीपतियों में सभी धर्मों और जातियों के लोग हैं। गोहत्याबंद होने से मजदूर कसाइयों को कोई नुकसान होने वाला नहीं है और न उनका धंधा ही खतम होने वाला है। क्योंकि वे बकरा, बकरी, पाड़ा, भैंसा, भेड़ आदि के कतल से अपनी आजीविका चला ही सकते हैं। कानून से गोहत्या बंद होने से गोमांस और कतली चमड़ा व्यापारियों और उद्योगपतियों को वह नहीं मिलेगा। गाय-बैल की स्वाभाविक मृत्यु के पश्चात मृत चर्म उन्हें मिलेगा लेकिन वह भी उन्हें गांव से खरीदना पड़ेगा क्योंकि तब कतलखानों में गाय-बैल कतल नहीं हो सकेंगे। आज तो शहरों के बड़े-बड़े कतलखानों से उन्हें अपने उद्योगों के लिए चमड़ा आदि मिल जाता है।

इसीलिए ये सारे निहित स्वार्थी संगठित होकर कसाइयों के नाम पर सारी उठापटक करते हैं, अफवाहें फैलाते हैं, दंगा-फिसाद कराते हैं और धार्मिक अंधविश्वास भी फैलाते हैं। ये ही लोग राजनैतिक नेताओं और संचार माध्यमों को पैसा देकर प्रभावित कर ऐसा वातावरण बनाते हैं कि गोहत्याबंदी से मुसलमानों का हित और धर्म प्रभावित होगा और इससे इसलाम ही खतरे में पड़ जाएगा। ऐसे ही प्रचार का यह परिणाम हुआ कि पश्चिम बंगाल सरकार ने कुछ वर्षों पूर्व इदुज्जुहा पर वहां आधा-अधूरा गोहत्याबंदी कानून भी लागू न करने का आदेश जारी किया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहकर खारिज कर दिया कि,  “इस्लाम में गाय-बैल की कुर्बानी देना धार्मिक अनिवार्यता नहीं है।”

हम आशा कर सकते हैं कि भारत में मुसलमान समन्वित भारतीय संस्कृति, संविधान के निर्देश और इस्लाम की भावना के अनुरूप इदुज्जुहा जैसे पवित्र त्यौहार पर गाय-बैल की कुर्बानी से बचेंगे। उनके ऐसा करने से भारत में अन्य धर्मवालों में इस्लाम के प्रति प्रेम और आदर बढ़ेगा जिससे अंततः सभी को लाभ होगा। (गोविभा अक्टूबर 2012)